40 सूरए मूमिन -सातवाँ रूकू

40 सूरए मूमिन -सातवाँ रूकू

اللَّهُ الَّذِي جَعَلَ لَكُمُ اللَّيْلَ لِتَسْكُنُوا فِيهِ وَالنَّهَارَ مُبْصِرًا ۚ إِنَّ اللَّهَ لَذُو فَضْلٍ عَلَى النَّاسِ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَشْكُرُونَ
ذَٰلِكُمُ اللَّهُ رَبُّكُمْ خَالِقُ كُلِّ شَيْءٍ لَّا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ فَأَنَّىٰ تُؤْفَكُونَ
كَذَٰلِكَ يُؤْفَكُ الَّذِينَ كَانُوا بِآيَاتِ اللَّهِ يَجْحَدُونَ
اللَّهُ الَّذِي جَعَلَ لَكُمُ الْأَرْضَ قَرَارًا وَالسَّمَاءَ بِنَاءً وَصَوَّرَكُمْ فَأَحْسَنَ صُوَرَكُمْ وَرَزَقَكُم مِّنَ الطَّيِّبَاتِ ۚ ذَٰلِكُمُ اللَّهُ رَبُّكُمْ ۖ فَتَبَارَكَ اللَّهُ رَبُّ الْعَالَمِينَ
هُوَ الْحَيُّ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ فَادْعُوهُ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ ۗ الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ
۞ قُلْ إِنِّي نُهِيتُ أَنْ أَعْبُدَ الَّذِينَ تَدْعُونَ مِن دُونِ اللَّهِ لَمَّا جَاءَنِيَ الْبَيِّنَاتُ مِن رَّبِّي وَأُمِرْتُ أَنْ أُسْلِمَ لِرَبِّ الْعَالَمِينَ
هُوَ الَّذِي خَلَقَكُم مِّن تُرَابٍ ثُمَّ مِن نُّطْفَةٍ ثُمَّ مِنْ عَلَقَةٍ ثُمَّ يُخْرِجُكُمْ طِفْلًا ثُمَّ لِتَبْلُغُوا أَشُدَّكُمْ ثُمَّ لِتَكُونُوا شُيُوخًا ۚ وَمِنكُم مَّن يُتَوَفَّىٰ مِن قَبْلُ ۖ وَلِتَبْلُغُوا أَجَلًا مُّسَمًّى وَلَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ
هُوَ الَّذِي يُحْيِي وَيُمِيتُ ۖ فَإِذَا قَضَىٰ أَمْرًا فَإِنَّمَا يَقُولُ لَهُ كُن فَيَكُونُ

अल्लाह है जिसने तुम्हारे लिये रात बनाई कि उसमें आराम पाओ और दिन बनाया आँखे खोलता(1)
(1) कि उसमें अपना काम इत्मीनान के साथ करो.

बेशक अल्लाह लोगों पर फ़ज़्ल (कृपा) वाला है लेकिन बहुत आदमी शुक्र नहीं करते {61} वह है अल्लाह तुम्हारा रब हर चीज़ का बनाने वाला, उसके सिवा किसी की बन्दगी नहीं तो कहां औंधे जाते हो(2){62}
(2) कि उसको छोड़कर बुतों को पूजते हो और उसपर ईमान नहीं लाते जबकि दलीलें क़ायम हैं.

यूंही औंधे होते हैं(3)
(3) और हक़ से फिरते हैं, दलीलें क़ायम होने के बावुजूद.

वो जो अल्लाह की आयतों का इन्कार करते हैं(4) {63}
(4) और उनमें सच्चाई जानने के लिये नज़र और ग़ौर नहीं करते.

अल्लाह है जिसने तुम्हारे लिये ज़मीन ठहराव बनाई (5)
(5) कि वह तुम्हारी क़रारगाह हो, ज़िन्दगी में भी और मौत के बाद भी.

और आसमान छत(6)
(6) कि उसको क़ुब्बे की तरह बलन्द फ़रमाया.

और तुम्हारी तस्वीर की, तो तुम्हारी सूरतें अच्छी बनाई (7)
(7) कि तुम्हें अच्छे डील डौल, नूरानी चेहरे और सुडौल किया, जानवरों की तरह न बनाया कि औंधे चलते.

और तुम्हें सुथरी चीज़ें(8)
(8) नफ़ीस खाने पीने की चीज़े.

रोज़ी दीं, यह है अल्लाह तुम्हारा रब, तो बड़ी बरकत वाला है अल्लाह रब सारे जगत का {64} वही ज़िन्दा है (9)
(9) कि उसकी फ़ना मुहाल है, असंभव है.

उसके सिवा किसी की बन्दगी नहीं तो उसे पूजो निरे उसी के बन्दे होकर, सब ख़ूबियां अल्लाह को जो सारे जगत का रब {65} तुम फ़रमाओ मैं मना किया गया हूँ कि उन्हें पूजूं जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पूजते हो (10)
(10) शरीर काफ़िरों ने जिहालत और गुमराही के तौर पर अपने झूठे दीन की तरफ़ हुज़ूर पुरनूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को दावत दी थी और आपसे बुत परस्ती की दरख़्वास्त की थी. इसपर यह आयत उतरी.

जब कि मेरे पास रौशन दलीलें (11)
(11) अक़्ल व वही की तौहीद पर दलालत करने वाली.

मेरे रब की तरफ़ से आईं और मुझे हुक्म हुआ है कि जगत के रब के हुज़ूर (समक्ष) गर्दन रखूं{66} वही है जिसने तुम्हें(12)
(12) यानी तुम्हारे अस्ल और तुम्हारे पितामह हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को.

मिट्टी से बनाया फिर (13)
(13)हज़रत आदम के बाद उनकी नस्ल को.

पानी की बूंद से(14)
(14) यानी मनी के क़तरे से.

फिर ख़ून की फुटक से फिर तुम्हें निकालता है बच्चा फिर तुम्हें बाक़ी रखता है कि अपनी जवानी को पहुंचो(15)
(15)और क़ुव्वत समपूर्ण हो.

फिर इसलिये कि बूढ़े हो और तुम में कोई पहले ही उठा लिया जाता है(16)
(16) यानी बुढ़ापे या जवानी के पहुंचने से पहले, यह इसलिये किया कि तुम ज़िन्दगानी करो.

और इसलिये कि तुम एक मुक़र्रर वादे तक पहुंचे (17)
(17)ज़िन्दगी के सीमित समय तक.

और इसलिये कि समझो(18){67}
(18) तौहीद की दलीलों को, और ईमान लाओ.

वही है कि जिलाता है और मारता है, फिर जब कोई हुक्म फ़रमाता है तो उससे यही कहता है कि होजा जभी वह हो जाता है (19){68}
(19)यानी चीज़ों का वुजूद उसके इरादे के आधीन है कि उसने इरादा फ़रमाया और चीज़ मौजूद हुई. न कोई कुलफ़त है न मशक़्क़त है न किसी सामान की हाजत, यह उसकी भरपूर क़ुदरत का बयान है.

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