40 सूरए मूमिन -चौथा रूकू

40 सूरए मूमिन -चौथा रूकू

وَقَالَ رَجُلٌ مُّؤْمِنٌ مِّنْ آلِ فِرْعَوْنَ يَكْتُمُ إِيمَانَهُ أَتَقْتُلُونَ رَجُلًا أَن يَقُولَ رَبِّيَ اللَّهُ وَقَدْ جَاءَكُم بِالْبَيِّنَاتِ مِن رَّبِّكُمْ ۖ وَإِن يَكُ كَاذِبًا فَعَلَيْهِ كَذِبُهُ ۖ وَإِن يَكُ صَادِقًا يُصِبْكُم بَعْضُ الَّذِي يَعِدُكُمْ ۖ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي مَنْ هُوَ مُسْرِفٌ كَذَّابٌ
يَا قَوْمِ لَكُمُ الْمُلْكُ الْيَوْمَ ظَاهِرِينَ فِي الْأَرْضِ فَمَن يَنصُرُنَا مِن بَأْسِ اللَّهِ إِن جَاءَنَا ۚ قَالَ فِرْعَوْنُ مَا أُرِيكُمْ إِلَّا مَا أَرَىٰ وَمَا أَهْدِيكُمْ إِلَّا سَبِيلَ الرَّشَادِ
وَقَالَ الَّذِي آمَنَ يَا قَوْمِ إِنِّي أَخَافُ عَلَيْكُم مِّثْلَ يَوْمِ الْأَحْزَابِ
مِثْلَ دَأْبِ قَوْمِ نُوحٍ وَعَادٍ وَثَمُودَ وَالَّذِينَ مِن بَعْدِهِمْ ۚ وَمَا اللَّهُ يُرِيدُ ظُلْمًا لِّلْعِبَادِ
وَيَا قَوْمِ إِنِّي أَخَافُ عَلَيْكُمْ يَوْمَ التَّنَادِ
يَوْمَ تُوَلُّونَ مُدْبِرِينَ مَا لَكُم مِّنَ اللَّهِ مِنْ عَاصِمٍ ۗ وَمَن يُضْلِلِ اللَّهُ فَمَا لَهُ مِنْ هَادٍ
وَلَقَدْ جَاءَكُمْ يُوسُفُ مِن قَبْلُ بِالْبَيِّنَاتِ فَمَا زِلْتُمْ فِي شَكٍّ مِّمَّا جَاءَكُم بِهِ ۖ حَتَّىٰ إِذَا هَلَكَ قُلْتُمْ لَن يَبْعَثَ اللَّهُ مِن بَعْدِهِ رَسُولًا ۚ كَذَٰلِكَ يُضِلُّ اللَّهُ مَنْ هُوَ مُسْرِفٌ مُّرْتَابٌ
الَّذِينَ يُجَادِلُونَ فِي آيَاتِ اللَّهِ بِغَيْرِ سُلْطَانٍ أَتَاهُمْ ۖ كَبُرَ مَقْتًا عِندَ اللَّهِ وَعِندَ الَّذِينَ آمَنُوا ۚ كَذَٰلِكَ يَطْبَعُ اللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ قَلْبِ مُتَكَبِّرٍ جَبَّارٍ
وَقَالَ فِرْعَوْنُ يَا هَامَانُ ابْنِ لِي صَرْحًا لَّعَلِّي أَبْلُغُ الْأَسْبَابَ
أَسْبَابَ السَّمَاوَاتِ فَأَطَّلِعَ إِلَىٰ إِلَٰهِ مُوسَىٰ وَإِنِّي لَأَظُنُّهُ كَاذِبًا ۚ وَكَذَٰلِكَ زُيِّنَ لِفِرْعَوْنَ سُوءُ عَمَلِهِ وَصُدَّ عَنِ السَّبِيلِ ۚ وَمَا كَيْدُ فِرْعَوْنَ إِلَّا فِي تَبَابٍ

और बोला फ़िरऔन वालों में से एक मर्द मुसलमान कि अपने ईमान को छुपाता था क्या एक मर्द को इसपर मारे डालते हो कि वह कहता है मेरा रब अल्लाह है और बेशक वह रौशन निशानियाँ तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से लाए(1)
(1) जिनसे उनकी सच्चाई ज़ाहिर हो गई यानी नबुव्वत साबित हो गई.

और अगर फ़र्ज़ करो वो ग़लत कहते हैं तो उनकी ग़लत गोई का वबाल उनपर, और अगर वो सच्चे हैं, तो तुम्हें पहुंच जाएगा कुछ वह जिसका तुम्हें वादा देते हैं(2)
(2) मतलब यह है कि दो हाल से ख़ाली नहीं या ये सच्चे होंगे या झूठे. अगर झूठे हों तो ऐसे मामले में झूट बोलकर उसके वबाल से बच नहीं सकते, हलाक हो जाएंगे. और अगर सच्चे हैं तो जिस अज़ाब का तुम्हें वादा देते हैं उसमें से बिल-फ़ेअल कुछ तुम्हें पहुंच ही जाएगा. कुछ पहुंचना इसलिये कहा कि आपका अज़ाब का वादा दुनिया और आख़िरत दोनों को आम था उसमें से बिलफ़ेअल दुनिया का अज़ाब ही पेश आना था.

बेशक अल्लाह राह नहीं देता उसे जो हद से बढ़ने वाला बड़ा झुटा हो(3) {28}
(3) कि ख़ुदा पर झूठ बांधे.

ऐ मेरी क़ौम आज बादशाही तुम्हारी है इस ज़मीन में ग़लबा रखते हो, (4)
(4) यानी मिस्र में तो ऐसा काम न करो कि अल्लाह का अज़ाब आए. अगर अल्लाह का अज़ाब आया.

तो अल्लाह के अज़ाब से हमें कौन बचा लेगा अगर हम पर आए, फ़िरऔन बोला मैं तो तुम्हें वही समझाता हूँ जो मेरी सूझ है  (5)
(5) यानी हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को क़त्ल कर देना.

और मैं तो तुम्हें वही बताता हूँ जो भलाई की राह है {29} और वह ईमान वाला बोला ऐ मेरी क़ौम मुझे तुम पर(6)
(6) हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को झुटलाने और उनके पीछे पड़ने से.

अगले गिरोहों के दिन का सा डर है(7) {30}
(7) जिन्होंने रसूलों को झुटलाया.

जैसा दस्तूर गुज़रा नूह की क़ौम और आद और समूद और उनके बाद औरों का,(8)
(8) कि नबियों को झुटलाते रहे और हर एक को अल्लाह के अज़ाब ने हलाक किया.

और अल्लाह बन्दों पर ज़ुल्म नहीं चाहता(9){31}
(9) बग़ैर गुनाह के उनपर अज़ाब नहीं फ़रमाता और बिना हुज्जत क़ायम किये उनको हलाक नहीं करता.

और ऐ मेरी क़ौम मैं तुम पर उस दिन से डरता हूँ जिस दिन पुकार मचेगी (10){32}
(10) वह क़यामत का दिन होगा. क़यामत के दिन को यौमुत-तनाद यानी पुकार का दिन इसलिये कहा जाता है कि इस रोज़ तरह तरह की पुकारें मची होंगी, हर व्यक्ति अपने सरदार के साथ और हर जमाअत अपने इमाम के साथ बुलाई जाएगी. जन्नती दोज़ख़ियों को और दोज़ख़ी जन्नतियों को पुकारेंगे, सआदत और शक़ावत की निदाएं की जाएंगी कि अमुक ख़ुशनसीब हुआ अब कभी बदनसीब न होगा और अमुक व्यक्ति बदनसीब हो गया अब कभी सईद न होगा और जिस वक़्त मौत ज़िब्ह की जाएगी उस वक़्त निदा की जाएगी कि ऐ जन्नत वालो अब हमेशगी है, मौत नहीं और ऐ जहन्नम वालो, अब हमेशगी है, मौत नहीं.

जिस दिन पीठ देकर भागोगे,(11)
(11) हिसाब के मैदान से दोज़ख़ की तरफ़.

अल्लाह से(12)
(12) यानी उसके अज़ाब से.

तुम्हें कोई बचाने वाला नहीं, और जिसे अल्लाह गुमराह करे उसका कोई राह दिखाने वाला नहीं{33}और बेशक इससे पहले(13)
(13) यानी हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से पहले.

तुम्हारे पास यूसुफ़ रौशन निशानियां लेकर आए तो तुम उनके लाए हुए से शक ही में रहे, यहां तक कि जब उन्होंने इन्तिक़ाल फ़रमाया तुम बोले हरगिज़ अब अल्लाह कोई रसूल न भेजेगा(14),
(14) यह बेदलील बात तुम ने यानी तुम्हारे पहलों ने ख़ुद गढ़ी ताकि हज़रत युसुफ़ अलैहिस्सलाम के बाद आने वाले नबियों को झुटलाओ और उनका इन्कार करो तो तुम कुफ्र पर क़ायम रहे, हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की नबुव्वत में शक करते रहे और बाद वालों की नबुव्वत के इन्कार के लिये तुम ने यह योजना बना ली कि अब अल्लाह तआला कोई रसूल ही न भेजेगा.

अल्लाह यूं ही गुमराह करता है उसे जो हद से बढ़ने वाला शक लाने वाला है(15) {34}
(15) उन चीज़ों में जिन पर रौशन दलीलें गवाह हैं.

वो जो अल्लाह की आयतों में झगड़ा करते हैं(16)
(16) उन्हें झुटला कर.

बे किसी सनद के कि उन्हें मिली हो, किस क़द्र सख़्त बेज़ारी की बात है अल्लाह के नज़्दीक और ईमान वालों के नज़्दीक, अल्लाह यूंही मुहर कर देता है मुतकब्बिर सरकश के सारे दिल पर(17){35}
(17) कि उसमें हिदायत क़ुबूल करने का कोई महल बाक़ी नहीं रहता.

और फ़िरऔन बोला(18)
(18)जिहालत और धोखे के तौर पर अपने वज़ीर से.

ऐ हामान मेरे लिये ऊंचा महल बना शायद मैं पहुंच जाऊं रास्तों तक {36} काहे के रास्ते आसमानों के तो मूसा के ख़ुदा को झाँक कर देखूं और बेशक मेरे गुमान में तो वह झूटा है(19)
(19) यानी मूसा मेरे सिवा और ख़ुदा बताने में और यह बात फ़िरऔन ने अपनी क़ौम को धोख़ा देने के लिये कही क्यों कि वह जानता था कि सच्चा मअबूद सिर्फ़ अल्लाह तआला है और फ़िरऔन अपने आपको धोख़ा धड़ी के लिये ख़ुदा कहलवाता है. (इस घटना का बयान सूरए क़सस में गुज़रा)

और यूंही फ़िरऔन की निगाह में उसका बुरा काम(20)
(20) यानी अल्लाह तआला के साथ शरीक करना और उसके रसूल को झुटलाना.

भला कर दिखाया गया(21)
(21) यानी शैतानों ने वसवसे डाल कर उसकी  बुराइयाँ उसकी नज़र में भली कर दिखाई.

और वह रास्ते से रोका गया, और फ़िरऔन का दाँव(22)हलाक होने ही को था {37}
(22) जो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की निशानियों को झूठा ठहराने के लिये उसने इख़्तियार किया.

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