38 सूरए सॉद -तीसरा रूकू

38 सूरए सॉद -तीसरा रूकू

وَمَا خَلَقْنَا السَّمَاءَ وَالْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا بَاطِلًا ۚ ذَٰلِكَ ظَنُّ الَّذِينَ كَفَرُوا ۚ فَوَيْلٌ لِّلَّذِينَ كَفَرُوا مِنَ النَّارِ
أَمْ نَجْعَلُ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ كَالْمُفْسِدِينَ فِي الْأَرْضِ أَمْ نَجْعَلُ الْمُتَّقِينَ كَالْفُجَّارِ
كِتَابٌ أَنزَلْنَاهُ إِلَيْكَ مُبَارَكٌ لِّيَدَّبَّرُوا آيَاتِهِ وَلِيَتَذَكَّرَ أُولُو الْأَلْبَابِ
وَوَهَبْنَا لِدَاوُودَ سُلَيْمَانَ ۚ نِعْمَ الْعَبْدُ ۖ إِنَّهُ أَوَّابٌ
إِذْ عُرِضَ عَلَيْهِ بِالْعَشِيِّ الصَّافِنَاتُ الْجِيَادُ
فَقَالَ إِنِّي أَحْبَبْتُ حُبَّ الْخَيْرِ عَن ذِكْرِ رَبِّي حَتَّىٰ تَوَارَتْ بِالْحِجَابِ
رُدُّوهَا عَلَيَّ ۖ فَطَفِقَ مَسْحًا بِالسُّوقِ وَالْأَعْنَاقِ
وَلَقَدْ فَتَنَّا سُلَيْمَانَ وَأَلْقَيْنَا عَلَىٰ كُرْسِيِّهِ جَسَدًا ثُمَّ أَنَابَ
قَالَ رَبِّ اغْفِرْ لِي وَهَبْ لِي مُلْكًا لَّا يَنبَغِي لِأَحَدٍ مِّن بَعْدِي ۖ إِنَّكَ أَنتَ الْوَهَّابُ
فَسَخَّرْنَا لَهُ الرِّيحَ تَجْرِي بِأَمْرِهِ رُخَاءً حَيْثُ أَصَابَ
وَالشَّيَاطِينَ كُلَّ بَنَّاءٍ وَغَوَّاصٍ
وَآخَرِينَ مُقَرَّنِينَ فِي الْأَصْفَادِ
هَٰذَا عَطَاؤُنَا فَامْنُنْ أَوْ أَمْسِكْ بِغَيْرِ حِسَابٍ
وَإِنَّ لَهُ عِندَنَا لَزُلْفَىٰ وَحُسْنَ مَآبٍ

और हमने आसमान और ज़मीन और जो कुछ उनके बीच है बेकार न बनाए, यह काफ़िरों का गुमान है(1)
(1)  अगरचे वो साफ़ यह न कहें कि आसमान और ज़मीन और तमाम दुनिया बेकार पैदा की गई लेकिन जब कि दोबारा उठाए जाने और जज़ा के इन्कारी हैं तो नतीजा यही है कि जगत की सृष्टि को बेकार और बे फ़ायदा मानें.

तो काफ़िरों की ख़राबी है आग से {27} क्या हम उन्हें जो ईमान लाए और अच्छे काम किये उन जैसा करदें जो ज़मीन में फ़साद फैलाते हैं या हम परहेज़गारों को शरीर बेहुक्मों के बराबर ठहराएं (2){28}
(2) यह बात बिल्कुल हिकमत के ख़िलाफ़. और जो व्यक्ति जज़ा का क़ायल नहीं वह फ़सादी और इस्लाह करने वाले और बदकार और परहेज़गार को बरबार क़रार देगा और उन में फ़र्क़ न करेगा. काफ़िर इस जिहालत में गिरफ़तार हैं. क़ुरैश के काफ़िरों ने मुसलमानों से कहा था कि आख़िरत में जो नेअमतें तुम्हें मिलेंगी वही हमें भी मिलेंगी. इसपर यह आयत उतरी और इरशाद फ़रमाया गया कि अच्छे बुरे. मूमिन और काफ़िर को बराबर कर देना हिकमत का तक़ाज़ा नहीं, काफ़िरों का ख़याल ग़लत है.

यह एक किताब है कि हमने तुम्हारी तरफ़ उतारी(3)
(3) यानी क़ुरआन शरीफ़.

बरकत वाली ताकि इसकी आयतों को सोचें और अक़्लमन्द नसीहत मानें {29} और हमने दाऊद को(4)
(4) लायक़ बेटा.

सुलैमान अता फ़रमाया, क्या अच्छा बन्दा, बेशक वह बहुत रूजू लाने वाला(5){30}
(5) अल्लाह तआला की तरफ़ और सारे वक़्त तस्बीह और ज़िक्र में मश्ग़ूल रहने वाला.

जब कि उसपर पेश किये गए तीसरे पहर को(6)
(6) ज़ोहर के बाद ऐसे घोड़े.

कि रोकिये तो तीन पाँव पर खड़े हों चौथे सुम का किनारा ज़मीन पर लगाए हुए और चलाइये तो हवा हो जाएं(7){31}
(7) ये हज़ार घोड़े थे जो जिहाद के लिये हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में ज़ोहर के बाद पेश किये गए.

तो सुलैमान ने कहा मुझे उन घोड़ों की महब्बत पसन्द आई है अपने रब की याद के लिये(8)
(8) यानी मैं उनसे अल्लाह की रज़ा और दीन की क़ुव्वत और ताईद के लिये महब्बत करता हूँ, मेरी महब्बत उनके साथ दुनिया की ग़रज़ से नहीं है. (तफ़सीरे कबीर)

फिर उन्हें चलाने का हुक्म दिया यहाँ तक कि निगाह से पर्दे में छुप गए (9){32}
(9) यानी नज़र से ग़ायब हो गए.

फिर हुक्म दिया कि उन्हें मेरे पास वापस लाओ तो उनकी पिंडलियों और गर्दनों पर हाथ फेरने लगा (10){33}
(10) और इस हाथ फ़ेरने के कुछ कारण थे, एक तो घोड़ो की इज़्ज़त और बुज़ुर्गी का इज़हार कि वो दुश्मन के मुक़ाबले में बेहतरीन मददगार हैं, दूसरे सल्तनत के कामों की ख़ुद निगरानी फ़रमाना कि तमाम काम करने वाले मुस्तइद रहें, तीसरे यह कि आप घोड़ों के अहवाल और उनके रोगों और दोषों के ऊंचे माहिर थे. उन पर हाथ फैर कर उनकी हालत का इम्तिहान फ़रमाते थे. कुछ मुफ़स्सिरों ने इन आयतों की तफ़सीर में बहुत से ऐसे वैसे क़ौल लिख दिये जिन की सच्चाई पर कोई प्रमाण नहीं और वो केवल हिकायतें है जो मज़बूत प्रमाणों के सामने किसी तरह क़ुबूल करने के योग्य नहीं और यह तफ़सीर जो ज़िक्र की गई, यह इबारत क़ुरआन से बिल्कुल मुताबिक़ है. (तफ़सीरे कबीर)

और बेशक हमने सुलैमान को जांचा(11)
(11) बुख़ारी व मुस्लिम शरीफ़ में हज़रत अबू हुरैरा रदियल्लाहो अन्हो की हदीस है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया था कि मैं आज रात में अपनी नव्वे बीबियों पर दौरा करूंगा. हर एक हामिला होगी और हर एक से ख़ुदा की राह में जिहाद करने वाला सवार पैदा होगा. मगर यह फ़रमाते वक़्त ज़बाने मुबारक से इन्शाअल्लाह न फ़रमाया (शायद हज़रत किसी ऐसे शग़्ल में थे कि इसका ख़याल न रहा) तो कोई भी औरत गर्भवती न हुई सिवाए एक के और उसके भी अधूरा बच्चा पैदा हुआ. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि अगर हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम ने इन्शाअल्लाह फ़रमाया होता तो उन सब औरतों के लड़के ही पैदा होते और वो ख़ुदा की राह में जिहाद करते. (बुख़ारी पारा तेरह, किताबुल अम्बिया)

और उसके तख़्त पर एक बेजान बदन डाल दिया(12) {34}
(12) यानी अधूरा बच्चा.

फिर रूजू लाया(13)
(13) अल्लाह तआला की तरफ़ इस्तिग़फ़ार करके इन्शाअल्लाह कहने की भूल पर और हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम ने अल्लाह की बारगाह में.

अर्ज़ की ऐ मेरे रब मुझे बख़्श दे और मुझे ऐसी सल्तनत अता कर कि मेरे बाद किसी को लायक़ न हो(14)
(14) इससे यह मक़सूद था कि ऐसा मुल्क आपके लिये चमत्कार हो.

बेशक तू ही है बड़ी दैन वाला {35} तो हमने हवा उसके बस में कर दी कि उसके हुक्म से नर्म नर्म चलती(15)
(15) फ़रमाँबरदारी के तरीक़े से.

जहाँ वह चाहता {36} और देव बस में कर दिये हर मेमार(16)
(16) जो आपके हुक्म और मर्ज़ी के अनुसार अजीब इमारते तामीर करता.

और गौताख़ोर (17){37}
(17) जो आपके लिये समन्दर के मोती निकालता. दुनिया में सब से पहले समन्दर से मोती निकालने वाले आप ही हैं.

और दूसरे और बेड़ियों में जकड़े हुए(18) {38}
(18) सरकश शैतान भी आपके बस में कर दिये गए जिनको आप फ़साद से रोकने के लिये बेड़ियों और ज़ंजीरों में जकड़वा कर कै़द करते थे.

यह हमारी अता है अब तू चाहे तो एहसान कर(19)
(19) जिस पर चाहे.

या रोक रख(20)
(20) जिस किसी से चाहे यानी आप को देने और न देने का इख़्तियार दिया गया जैसी मर्ज़ी हो करें.

तुझ पर कुछ हिसाब नहीं {39} और बेशक उसके लिये हमारी बारगाह में ज़रूर नज़्दीकी और अच्छा ठिकाना है{40}

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