38 सूरए सॉद -चौथा रूकू

38 सूरए सॉद -चौथा रूकू

وَاذْكُرْ عَبْدَنَا أَيُّوبَ إِذْ نَادَىٰ رَبَّهُ أَنِّي مَسَّنِيَ الشَّيْطَانُ بِنُصْبٍ وَعَذَابٍ
ارْكُضْ بِرِجْلِكَ ۖ هَٰذَا مُغْتَسَلٌ بَارِدٌ وَشَرَابٌ
وَوَهَبْنَا لَهُ أَهْلَهُ وَمِثْلَهُم مَّعَهُمْ رَحْمَةً مِّنَّا وَذِكْرَىٰ لِأُولِي الْأَلْبَابِ
وَخُذْ بِيَدِكَ ضِغْثًا فَاضْرِب بِّهِ وَلَا تَحْنَثْ ۗ إِنَّا وَجَدْنَاهُ صَابِرًا ۚ نِّعْمَ الْعَبْدُ ۖ إِنَّهُ أَوَّابٌ
وَاذْكُرْ عِبَادَنَا إِبْرَاهِيمَ وَإِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ أُولِي الْأَيْدِي وَالْأَبْصَارِ
إِنَّا أَخْلَصْنَاهُم بِخَالِصَةٍ ذِكْرَى الدَّارِ
وَإِنَّهُمْ عِندَنَا لَمِنَ الْمُصْطَفَيْنَ الْأَخْيَارِ
وَاذْكُرْ إِسْمَاعِيلَ وَالْيَسَعَ وَذَا الْكِفْلِ ۖ وَكُلٌّ مِّنَ الْأَخْيَارِ
هَٰذَا ذِكْرٌ ۚ وَإِنَّ لِلْمُتَّقِينَ لَحُسْنَ مَآبٍ
جَنَّاتِ عَدْنٍ مُّفَتَّحَةً لَّهُمُ الْأَبْوَابُ
مُتَّكِئِينَ فِيهَا يَدْعُونَ فِيهَا بِفَاكِهَةٍ كَثِيرَةٍ وَشَرَابٍ
۞ وَعِندَهُمْ قَاصِرَاتُ الطَّرْفِ أَتْرَابٌ
هَٰذَا مَا تُوعَدُونَ لِيَوْمِ الْحِسَابِ
إِنَّ هَٰذَا لَرِزْقُنَا مَا لَهُ مِن نَّفَادٍ
هَٰذَا ۚ وَإِنَّ لِلطَّاغِينَ لَشَرَّ مَآبٍ
جَهَنَّمَ يَصْلَوْنَهَا فَبِئْسَ الْمِهَادُ
هَٰذَا فَلْيَذُوقُوهُ حَمِيمٌ وَغَسَّاقٌ
وَآخَرُ مِن شَكْلِهِ أَزْوَاجٌ
هَٰذَا فَوْجٌ مُّقْتَحِمٌ مَّعَكُمْ ۖ لَا مَرْحَبًا بِهِمْ ۚ إِنَّهُمْ صَالُو النَّارِ
قَالُوا بَلْ أَنتُمْ لَا مَرْحَبًا بِكُمْ ۖ أَنتُمْ قَدَّمْتُمُوهُ لَنَا ۖ فَبِئْسَ الْقَرَارُ
قَالُوا رَبَّنَا مَن قَدَّمَ لَنَا هَٰذَا فَزِدْهُ عَذَابًا ضِعْفًا فِي النَّارِ
وَقَالُوا مَا لَنَا لَا نَرَىٰ رِجَالًا كُنَّا نَعُدُّهُم مِّنَ الْأَشْرَارِ
أَتَّخَذْنَاهُمْ سِخْرِيًّا أَمْ زَاغَتْ عَنْهُمُ الْأَبْصَارُ
إِنَّ ذَٰلِكَ لَحَقٌّ تَخَاصُمُ أَهْلِ النَّارِ

और याद करो हमारे बन्दे अय्यूब को जब उसने अपने रब को पुकारा कि मुझे शैतान ने तकलीफ़ और ईज़ा लगा दी (1) {41}
(1) जिस्म और माल में, इस से आप की बीमारी और इसकी सख़्तियाँ मुराद हैं. इस वाक़्ए का तफ़सीली बयान सूरए अम्बिया के छटे रूकू में गुज़र चुका हैं.

हमने फ़रमाया ज़मीन पर अपना पाँव मार(2)
(2) चुनांन्वे आपने जमीन में पावँ मारा और उससे मीठे पानी का एक चश्मा ज़ाहिर हुआ और आप से कहा गया.

यह है ठण्डा चश्मा नहाने और पीने को(3) {42}
(3) चुनांन्चे आप ने उससे पिया और ग़ुस्ल किया और तमाम ज़ाहिरी और बातिनी बीमारियाँ और तकलीफ़े दूर हो गई.

और हमने उसे उसके घर वाले और उनके बराबर और अता फ़रमा दिये अपनी रहमत करने(4)
(4) चुनांन्चे रिवायत है कि जो औलाद आप की मर चुकी थी अल्लाह तआला ने उसको ज़िन्दा किया और अपने फ़ज़्ल और रहमत से उतने ही और अता फ़रमाए.

और अक़्लमन्दों की नसीहत को {43} और फ़रमाया कि अपने हाथ में एक झाड़ू लेकर उससे मार दे(5)
(5) अपनी बीबी को जिसकी सौ ज़रबें मारने की क़स्म खाई थी, देर से हाज़िर होने के कारण.

और क़सम न तोड़, बेशक हमने उसे साबिर पाया, क्या अच्छा बन्दा(6)
(6) यानी अय्यूब अलैहिस्सलाम.

बेशक वह बहुत रूजू लाने वाला है {44} और याद करो हमारे बन्दों इब्राहीम और इस्हाक़ और यअक़ूब क़ुदरत और इल्म वालों को(7){45}
(7) जिन्हें अल्लाह तआला ने इल्म और अमल की हिकमत अता फ़रमाई और अपनी पहचान और फ़रमाँबरदारी पर दृढ़ता अता की.

बेशक हमने उन्हें एक खरी बात से इम्तियाज़ (विशेषता) बख़्शा कि वह उस घर की याद है(8){46}
(8) यानी आख़िरत की कि वह लोगो को उसी की चाह दिलाते हैं और बहुतात से उसका ज़िक्र करते हैं. दुनिया की महब्बत ने उनके दिलों में जगह नहीं पाई.

और बेशक वो हमारे नज़्दीक़ चुने हुए पसन्दीदा हैं {47} और याद करो इस्माईल और यसआ और ज़ुलकिफ़्ल को(9)
(9) यानी उनके फ़जाइल और उनके सब्र को, ताकि उनकी पाक ख़सलतों से लोग नेकियों का ज़ौक़ व शौक़ हासिल करें और ज़ुलकिफ़्ल की नबुव्वत में मतभेद है.

और सब अच्छे हैं {48} यह नसीहत है, और बेशक(10)
(10) आख़िरत में.

परहेज़गारों का ठिकाना भला {49} बसने के बाग़ उनके लिये सब दरवाज़ें खुले हुए {50} उसमें तकिया लगाए (11)
(11) सजे हुए तख़्तों पर.

उनमें बहुत से मेवे और शराब मांगते हैं {51} और उनके पास वो बीबियाँ हैं कि अपने शौहर के सिवा और की तरफ़ आंख नहीं उठातीं एक उम्र की (12) {52}
(12) यानी सब उम्र में बराबर, ऐसे ही हुस्न व जवानी में आपस में महब्बत रखने वाले, न एक को दूसरे से बुगज़, न रश्क, न हसद.

यह है जिसका वादा दिया जाता है हिसाब के दिन {53} बेशक यह हमारा रिज़्क़ है कि कभी ख़त्म न होगा (13){54}
(13) हमेशा बाक़ी रहेगा. वहाँ जो चीज़ ली जाएगी और ख़र्च की जाएगी वह अपनी जगह वैसी ही हो जाएगी. दुनिया की चीज़ों की तरह फ़ना और नेस्त नाबूद न होगी.

उनको तो यह है(14)
(14) यानी ईमान वालों को.

और बेशक सरकशों का बुरा ठिकाना {55} जहन्नम कि उसमें जाएंगे तो क्या ही बुरा बिछौना(15) {56}
(15) भड़कने वाली आग कि वही फ़र्श होगी.

उनको यह है तो इसे चखें खौलता पानी और पीप (16){57}
(16) जो जहन्निमयों के जिस्मों और उनके सड़े हुए ज़ख़्मों और नापाकी की जगहों से बहेगी जलती बदबूदार.

और इसी शक्ल के और जोड़े (17){58}
(17) तरह तरह के अज़ाब.

उनसे कहा जाएगा यह एक और फ़ौज़ तुम्हारे साथ धंसी पड़ती है जो तुम्हारी थी(18){59}
(18) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि जब काफ़िरों के सरदार जहन्नम में दाख़िल होंगे और उनके पीछे पीछे उनके मानने वाले तो जहन्नम के ख़ाज़िन उन सरदारों से कहेंगे ये तुम्हारे अनुयाइयों की फ़ौज़ है जो तुम्हारी तरह तुम्हारे साथ जहन्नम में धंसी पड़ती है.

वो कहेंगे उनको खुली जगह न मिलियो, आग में तो उनको जाना ही है. वहाँ भी तंग जगह रहें, ताबे (फ़रमाँबरदार) बोले बल्कि तुम्हीं खुली जगह न मिलियो, यह मुसीबत तुम हमारे आगे लाए(19)
(19) कि तुम ने पहले कुफ़्र इख़्तियार किया और हमें उस राह पर चलाया.

तो क्या ही बुरा ठिकाना(20){60}
(20) यानी जहन्नम अत्यन्त बुरा ठिकाना है.

वो बोले ऐ हमारे रब जो यह मुसीबत हमारे आगे लाया उसे आग में दूना अज़ाब बढ़ा {61} और (21)
(21) काफ़िरों के बड़े और सरदार.

बोले हमें क्या हुआ हम उन मर्दों को नहीं देखते जिन्हें बुरा समझते थे(22){62}
(22) यानी ग़रीब मुसलमानों को और उन्हें वो अपने दीन का मुख़ालिफ़ होने के कारण शरीर कहते थे और ग़रीब होने के कारण तुच्छ समझते थे. जब काफ़िर जहन्नम में उन्हें न देखेंगे तो कहेंगे वो हमें नज़र क्यों नहीं आते.

क्या हमने उन्हें हंसी बना लिया(23)
(23) और वास्तव में वो ऐसे न थे. दोज़ख़ में आए ही नहीं. हमारा उनके साथ ठठ्ठा करना और उनकी हंसी बनाना बातिल था.

या आँखें उनकी तरफ़ फिर गईं(24) {63}
(24) इसलिये वो हमें नज़र न आए या ये मानी हैं कि उनकी तरफ़ से आँख़ें फिर गई और दुनिया में हम उनके रूत्बे और बुज़ुर्गी को न देख सकें.
बेशक यह ज़रूर हक़ है दोज़ख़ियों का आपसी झगड़ा {64}

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