37 सूरए साफ़्फ़ात -दूसरा रूकू

37 सूरए साफ़्फ़ात -दूसरा रूकू

۞ احْشُرُوا الَّذِينَ ظَلَمُوا وَأَزْوَاجَهُمْ وَمَا كَانُوا يَعْبُدُونَ
مِن دُونِ اللَّهِ فَاهْدُوهُمْ إِلَىٰ صِرَاطِ الْجَحِيمِ
وَقِفُوهُمْ ۖ إِنَّهُم مَّسْئُولُونَ
مَا لَكُمْ لَا تَنَاصَرُونَ
بَلْ هُمُ الْيَوْمَ مُسْتَسْلِمُونَ
وَأَقْبَلَ بَعْضُهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ يَتَسَاءَلُونَ
قَالُوا إِنَّكُمْ كُنتُمْ تَأْتُونَنَا عَنِ الْيَمِينِ
قَالُوا بَل لَّمْ تَكُونُوا مُؤْمِنِينَ
وَمَا كَانَ لَنَا عَلَيْكُم مِّن سُلْطَانٍ ۖ بَلْ كُنتُمْ قَوْمًا طَاغِينَ
فَحَقَّ عَلَيْنَا قَوْلُ رَبِّنَا ۖ إِنَّا لَذَائِقُونَ
فَأَغْوَيْنَاكُمْ إِنَّا كُنَّا غَاوِينَ
فَإِنَّهُمْ يَوْمَئِذٍ فِي الْعَذَابِ مُشْتَرِكُونَ
إِنَّا كَذَٰلِكَ نَفْعَلُ بِالْمُجْرِمِينَ
إِنَّهُمْ كَانُوا إِذَا قِيلَ لَهُمْ لَا إِلَٰهَ إِلَّا اللَّهُ يَسْتَكْبِرُونَ
وَيَقُولُونَ أَئِنَّا لَتَارِكُو آلِهَتِنَا لِشَاعِرٍ مَّجْنُونٍ
بَلْ جَاءَ بِالْحَقِّ وَصَدَّقَ الْمُرْسَلِينَ
إِنَّكُمْ لَذَائِقُو الْعَذَابِ الْأَلِيمِ
وَمَا تُجْزَوْنَ إِلَّا مَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
إِلَّا عِبَادَ اللَّهِ الْمُخْلَصِينَ
أُولَٰئِكَ لَهُمْ رِزْقٌ مَّعْلُومٌ
فَوَاكِهُ ۖ وَهُم مُّكْرَمُونَ
فِي جَنَّاتِ النَّعِيمِ
عَلَىٰ سُرُرٍ مُّتَقَابِلِينَ
يُطَافُ عَلَيْهِم بِكَأْسٍ مِّن مَّعِينٍ
بَيْضَاءَ لَذَّةٍ لِّلشَّارِبِينَ
لَا فِيهَا غَوْلٌ وَلَا هُمْ عَنْهَا يُنزَفُونَ
وَعِندَهُمْ قَاصِرَاتُ الطَّرْفِ عِينٌ
كَأَنَّهُنَّ بَيْضٌ مَّكْنُونٌ
فَأَقْبَلَ بَعْضُهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ يَتَسَاءَلُونَ
قَالَ قَائِلٌ مِّنْهُمْ إِنِّي كَانَ لِي قَرِينٌ
يَقُولُ أَإِنَّكَ لَمِنَ الْمُصَدِّقِينَ
أَإِذَا مِتْنَا وَكُنَّا تُرَابًا وَعِظَامًا أَإِنَّا لَمَدِينُونَ
قَالَ هَلْ أَنتُم مُّطَّلِعُونَ
فَاطَّلَعَ فَرَآهُ فِي سَوَاءِ الْجَحِيمِ
قَالَ تَاللَّهِ إِن كِدتَّ لَتُرْدِينِ
وَلَوْلَا نِعْمَةُ رَبِّي لَكُنتُ مِنَ الْمُحْضَرِينَ
أَفَمَا نَحْنُ بِمَيِّتِينَ
إِلَّا مَوْتَتَنَا الْأُولَىٰ وَمَا نَحْنُ بِمُعَذَّبِينَ
إِنَّ هَٰذَا لَهُوَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ
لِمِثْلِ هَٰذَا فَلْيَعْمَلِ الْعَامِلُونَ
أَذَٰلِكَ خَيْرٌ نُّزُلًا أَمْ شَجَرَةُ الزَّقُّومِ
إِنَّا جَعَلْنَاهَا فِتْنَةً لِّلظَّالِمِينَ
إِنَّهَا شَجَرَةٌ تَخْرُجُ فِي أَصْلِ الْجَحِيمِ
طَلْعُهَا كَأَنَّهُ رُءُوسُ الشَّيَاطِينِ
فَإِنَّهُمْ لَآكِلُونَ مِنْهَا فَمَالِئُونَ مِنْهَا الْبُطُونَ
ثُمَّ إِنَّ لَهُمْ عَلَيْهَا لَشَوْبًا مِّنْ حَمِيمٍ
ثُمَّ إِنَّ مَرْجِعَهُمْ لَإِلَى الْجَحِيمِ
إِنَّهُمْ أَلْفَوْا آبَاءَهُمْ ضَالِّينَ
فَهُمْ عَلَىٰ آثَارِهِمْ يُهْرَعُونَ
وَلَقَدْ ضَلَّ قَبْلَهُمْ أَكْثَرُ الْأَوَّلِينَ
وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا فِيهِم مُّنذِرِينَ
فَانظُرْ كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُنذَرِينَ
إِلَّا عِبَادَ اللَّهِ الْمُخْلَصِينَ

हांको ज़ालिमों और उनके जोड़ों को (1)
(1) ज़ालिमों से मुराद काफ़िर है और उनके जोड़ों से मुराद उनके शैतान जो दुनिया में उनके साथी और क़रीब रहते थे. हर एक काफ़िर अपने शैतान के साथ एक ही ज़ंजी़र में जकड़ दिया जाएगा. और हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि जोड़ों से मुराद अशबाह और इमसाल हैं यानी हर काफ़िर अपने ही क़िस्म के साथ काफ़िरों के साथ हाँका जाएगा, बुतों को पूजने वाले मुर्ति-पूजकों के साथ, आग के पुजारी आग के पुजारियों के साथ, इसी तरह दूसरे.

और जो कुछ वो पूजते थे {22} अल्लाह के सिवा, उन सबको हांको दोज़ख़ की राह की तरफ़{23} और उन्हें ठहराओ (2)
(2) सिरात के पास.

उनसे पूछना है(3) {24}
(3) हदीस शरीफ़ में है कि क़यामत के दिन बन्दा जगह से हिल न सकेगा जब तक चार बातें उससे न पूछ ली जाएं. एक उसकी उम्र कि किस काम में गुज़री, दूसरे उसका इल्म कि उसपर क्या अमल किया, तीसरे उसका माल कि कहाँ से कमाया कहाँ ख़्रर्च किया, चौथा उसका जिस्म कि उसको किस काम में लाया.

तुम्हें क्या हुआ एक दूसरे की मदद क्यों नहीं करते (4) {25}
(4) यह उनसे जहन्नम के ख़ाज़िन फटकार के तौर पर कहेंगे कि दुनिया में तो एक दूसरे की सहायता पर बहुत घमण्ड रखते थे आज देखो कैसे मजबूर हो, तुम में से कोई किसी की मदद नहीं कर सकता.

बल्कि वो आज गर्दन डाले हैं (5){26}
(5) मजबूर और ज़लील होकर.

और उनमें एक ने दूसरे की तरफ़ मुंह किया आपस में पूछते हुए बोले (6) {27}
(6) अपने सरदारों से जो दुनिया में बहकाते थे.

तुम हमारी दाईं तरफ़ से बहकाने आते थे (7){28}
(7) यानी क़ुव्वत के ज़ोर से हमें गुमराही पर आमादा करते थे, इसपर काफ़िरों के सरदार कहेंगे और—

जवाब देंगे तुम ख़ुद ही ईमान न रखते थे(8){29}
(8) पहले ही से काफ़िर थे और ईमान से अपनी मर्ज़ी से मुंह फेरते थे.

और हमारा तुम पर कुछ क़ाबू न था (9)
(9) कि हम तुम्हें अपने अनुकरण पर मजबूर करते.

बल्कि तुम सरकश लोग थे {30} तो साबित हो गई हम पर हमारे रब की बात (10)
(10) जो उसने फ़रमाई कि मैं ज़रूर जहन्नम को जिन्नों और इन्सानों से भरूंगा, लिहाज़ा—

हमें ज़रूर चखना है(11) {31}
(11) उसका अज़ाब, गुमराहों को भी और गुमराह करने वालों को भी.

तो हमने तुम्हें गुमराह किया कि हम ख़ुद गुमराह थे {32} तो उस दिन (12)
(12) यानी क़यामत के दिन.

वो सबके सब अज़ाब में शरीक हैं(13){33}
(13) गुमराह भी और उनके गुमराह करने वाले सरदार भी, क्योंकि ये सब दुनिया में गुमराही में शरीक थे.

मुजरिमों के साथ हम ऐसा ही करते हैं {34} बेशक जब उनसे कहा जाता था कि अल्लाह के सिवा किसी की बन्दगी नहीं तो ऊंची खींचते (घमन्ड करते) थे (14) {35}
(14)और तौहीद क़ुबूल न करते थे, शिर्क से न रूकते थे.

और कहते थे क्या हम अपने ख़ुदाओं को छोड़ दें एक दीवाने शायर के कहने से(15) {36}
(15)यानी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के फ़रमाने से.

बल्कि वो तो हक़ (सत्य) लाए हैं और उन्हों ने रसूलों की तस्दीक़ फ़रमाई (16) {37}
(16) दीन व तौहीद में, और शिर्क के इन्कार में.

बेशक तुम्हें ज़रूर दुख की मार चखनी है {38} तो तुम्हें बदला न मिलेगा मगर अपने किये का (17){39}
(17)उस शिर्क और झुटलाने का, जो दुनिया में कर आए हो.

मगर जो अल्लाह के चुने हुए बन्दे हैं (18) {40}
(18) ईमान और ख़ूलूस वाले.

उनके लिये वह रोज़ी है जो हमारे इल्म में है {41} मेवे (19)
(19) और बढिया और मज़ेदार नेअमतें, स्वादिष्ट, सुगंधित और सुन्दर.

और उनकी इज़्ज़त होगी {42} चैन के बाग़ों में {43} तख़्तों पर होंगे आमने सामने(20){44}
(20)एक दूसरे से मानूस और ख़ुश.

उन पर दौरा होगा निगाह के सामने बहती शराब के जाम का(21){45}
(21) जिसकी पाकीज़ा नेहरें निगाहों के सामने जारी होंगी.

सफ़ेद रंग(22)
(22) दूध से भी ज़्यादा सफ़ेद.

पीने वालों के लिये लज़्ज़त (23) {46}
(23) दुनिया की शराब के विपरीत जो बदबूदार और बुरे मज़े की होती है और पीने वाला उसको पीते वक़्त मुंह बिगाड़ बिगाड़ लेता है.

न उसमें ख़ुमार है(24)
(24) जिससे अक़्ल में ख़लल आए.

और न उससे उनका सर फिरे (25) {47}
(25) दुनिया की शराब के विपरीत जिसमें बहुत सी ख़राबियां और ऐब हैं. उससे पेट में भी दर्द होता है सर में भी, पेशाब में भी तकलीफ़ होती है, तबिअत में उल्टी जैसी महसूस होती है, सर चकराता है, अक़्ल ठिकाने नहीं रहती.

और उनके पास हैं जो शौहरों के सिवा दूसरी तरफ़ आँख उठा कर न देखेंगी (26) {48}
(26) कि उसके नज़्दीक़ उसका शौहर ही सबसे सुन्दर और प्यारा है.

बड़ी आँखों वालियाँ, मानो वो अन्डे है छुपे रखे हुए (27) {49}
(27) धूल मिट्टी से पाक साफ़ और दिलकश रंग.

तो उनमें(28)
(28) यानी एहले जन्नत में से.

एक ने दूसरे की तरफ़ मुंह किया पूछते हुए(29) {50}
(29) कि दुनिया में क्या हालात और वाक़आत पेश आए.

उनमें से कहने वाला बोला मेरा एक हमनशीन था (30) {51}
(30) दुनिया में जो मरने के बाद उठने का इन्कारी था और उसकी निस्बत व्यंग्य के तरीक़े पर.

मुझ से कहा करता क्या तुम इसे सच मानते हो (31) {52}
(31) यानी मरने के बाद उठने को.

क्या जब हम मर कर मिट्टी और हड्डियां हो जाएंगे तो क्या हमें जज़ा सज़ा दी जाएगी(32) {53}
(32) और हम से हिसाब लिया जाएगा. यह बयान करके उस जन्नती ने अपने जन्नती दोस्तों से.

कहा क्या तुम झांक कर देखोगे (33) {54}
(33) कि मेरे उस हमनशीन का जहन्नम में क्या हाल है.

फिर झांका तो उसे बीच भड़कती आग में देखा(34) {55}
(34) कि अज़ाब के अन्दर गिरफ़्तार है, तो उस जन्नती ने उस से.

कहा ख़ुदा की क़सम क़रीब था कि तू मुझे हलाक कर दे(35) {56}
(35) सीधी राह से बहका कर.

और मेरा रब फ़ज़्ल (कृपा) न करे (36)
(36) और अपनी रहमत और करम से मुझे तेरे बहकावे से मेहफ़ूज़ न रखता और इस्लाम पर क़ायम रहने की तौफ़ीक़ न देता.

तो ज़रूर मैं भी पकड़ कर हाज़िर किया जाता (37) {57}
(37) तेरे साथ जहन्नम में, और जब मौत ज़िब्ह कर दी जाएगी तो जन्नत वाले फ़रिश्तों से कहेंगे.

तो क्या हमें मरना नहीं {58} मगर हमारी पहली मौत (38)
(38) वही जो दुनिया मे हो चुकी.

और हम पर अज़ाब न होगा (39) {59}
(39) फ़रिश्ते कहेंगे नहीं, और जन्नत वालों का यह पूछना अल्लाह तआला की रहमत के साथ लज़्ज़त उठाना और हमेशा की ज़िन्दगी की नेअमत और अज़ाब से मेहफ़ूज़ होने के ऐहसान पर उसकी नेअमत का ज़िक्र करने के लिये है. और ज़िक्र से उन्हें सुरूर हासिल होगा.

बेशक यही बड़ी कामयाबी है {60} ऐसी ही बात के लिये कामियों को काम करना चाहिये {61} तो यह मेहमानी भली(40)
(40) यानी जन्नती नेअमतें और लज़्ज़तें और वहाँ के नफ़ीस और लतीफ़ खाने पीने और हमेशा के ऐश बेहद राहत और सुरूर.

या थूहड़ का पेड? (41) {62}
(41) निहायत कड़वा, अत्यन्त बदबूदार हद दर्जा का बदमज़ा सख़्त नागवार जिससे जहन्नमियों की मे़ज़बानी की जाएगी और उन को उसके खाने पर मजबूर किया जाएगा.

बेशक हमने उसे ज़ालिमों की जांच किया है(42) {63}
(42) कि दुनिया में काफ़िर उसका इन्कार करते हैं और कहते हैं कि आग दरख़्तों को जला डालती है तो आग में दरख़्त कैसे होगा.

बेशक वह एक पेड़ है कि जहन्नम की जड़ में निकलता है (43) {64}
(43) और उसकी शाख़ें जहन्नम के गढों में पहुंचती हैं.

उसका शग़ूफ़ा जैसे देवों के सर (44) {65}
(44) यानी बदसूरत और बुरा दिखने वाला.

फिर बेशक वो उसमें से खाएंगे (45)
(45) सख़्त भूख से मजबूर होकर.

फिर उससे पेट भरेंगे {66} फिर बेशक उनके लिये उस पर खौलते पानी की मिलौनी (मिलावट) है (46) {67}
(46) यानी जहन्नमी थूहड़ से उनके पेट भरेंगे, वह जलता होगा, पेटों को जलाएगा, उसकी जलन से प्यास का ग़लबा होगा और मुद्दत तक वो प्यास की तकलीफ़ में रखे जाएंगे फिर जब पीने को दिया जाएगा तो गर्म खौलता पानी उस गर्मी और जलन, उस थूहड़ की गर्मी और जलन से मिलकर और तकलीफ़ और बेचैनी बढ़ाएगी.

फिर उनकी बाज़गश्त (पलटना) ज़रूर भड़कती आग की तरफ़ है (47) {68}
(47) क्योंकि ज़क्क़ूम खिलाने और गर्म पानी पिलाने के लिये उनको अपने गढ़ों से दूसरे गढ़ों में ले जाया जाएगा. इसके बाद फिर अपने गढों की तरफ़ लौटाए जाएंगे. इसके बाद उनके अज़ाब का मुस्तहिक़ होने की इल्लत इरशाद फ़रमाई जाती है.

बेशक उन्होंने अपने बाप दादा गुमराह पाए{69} तो वो उन्हीं के क़दमों के निशान पर दौड़े जाते हैं (48) {70}
(48) और गुमराही में उनका अनुकरण करते हैं और सच्चाई के खुले सुबूतों से आँखें बन्द कर लेते हैं.

और बेशक उनसे पहले बहुत से अगले गुमराह हुए (49) {71}
(49) इसी वजह से कि उन्हों ने अपने बाप दादा की ग़लत राह न छोड़ी और हुज्जत और दलील से फ़ायदा न उठाया.

और बेशक हमने उनमें डर सुनाने वाले भेजे (50) {72}
(50) यानी नबी जिन्होंने उनको गुमराही और बदअमली के बुरे अंजाम का ख़ौफ़ दिलाया.

तो देखो डराए गयों का कैसा अंजाम हुआ (51) {73}
(51) कि वो अज़ाब से हलाक किये गए.

मगर अल्लाह के चुने हुए बन्दे (52) {74}
(52) ईमानदार जिन्हों ने अपने इख़लास के कारण निजात पाई.

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