37 सूरए साफ़्फ़ात -तीसरा रूकू

37 सूरए साफ़्फ़ात -तीसरा रूकू

وَلَقَدْ نَادَانَا نُوحٌ فَلَنِعْمَ الْمُجِيبُونَ
وَنَجَّيْنَاهُ وَأَهْلَهُ مِنَ الْكَرْبِ الْعَظِيمِ
وَجَعَلْنَا ذُرِّيَّتَهُ هُمُ الْبَاقِينَ
وَتَرَكْنَا عَلَيْهِ فِي الْآخِرِينَ
سَلَامٌ عَلَىٰ نُوحٍ فِي الْعَالَمِينَ
إِنَّا كَذَٰلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِنِينَ
إِنَّهُ مِنْ عِبَادِنَا الْمُؤْمِنِينَ
ثُمَّ أَغْرَقْنَا الْآخَرِينَ
۞ وَإِنَّ مِن شِيعَتِهِ لَإِبْرَاهِيمَ
إِذْ جَاءَ رَبَّهُ بِقَلْبٍ سَلِيمٍ
إِذْ قَالَ لِأَبِيهِ وَقَوْمِهِ مَاذَا تَعْبُدُونَ
أَئِفْكًا آلِهَةً دُونَ اللَّهِ تُرِيدُونَ
فَمَا ظَنُّكُم بِرَبِّ الْعَالَمِينَ
فَنَظَرَ نَظْرَةً فِي النُّجُومِ
فَقَالَ إِنِّي سَقِيمٌ
فَتَوَلَّوْا عَنْهُ مُدْبِرِينَ
فَرَاغَ إِلَىٰ آلِهَتِهِمْ فَقَالَ أَلَا تَأْكُلُونَ
مَا لَكُمْ لَا تَنطِقُونَ
فَرَاغَ عَلَيْهِمْ ضَرْبًا بِالْيَمِينِ
فَأَقْبَلُوا إِلَيْهِ يَزِفُّونَ
قَالَ أَتَعْبُدُونَ مَا تَنْحِتُونَ
وَاللَّهُ خَلَقَكُمْ وَمَا تَعْمَلُونَ
قَالُوا ابْنُوا لَهُ بُنْيَانًا فَأَلْقُوهُ فِي الْجَحِيمِ
فَأَرَادُوا بِهِ كَيْدًا فَجَعَلْنَاهُمُ الْأَسْفَلِينَ
وَقَالَ إِنِّي ذَاهِبٌ إِلَىٰ رَبِّي سَيَهْدِينِ
رَبِّ هَبْ لِي مِنَ الصَّالِحِينَ
فَبَشَّرْنَاهُ بِغُلَامٍ حَلِيمٍ
فَلَمَّا بَلَغَ مَعَهُ السَّعْيَ قَالَ يَا بُنَيَّ إِنِّي أَرَىٰ فِي الْمَنَامِ أَنِّي أَذْبَحُكَ فَانظُرْ مَاذَا تَرَىٰ ۚ قَالَ يَا أَبَتِ افْعَلْ مَا تُؤْمَرُ ۖ سَتَجِدُنِي إِن شَاءَ اللَّهُ مِنَ الصَّابِرِينَ
فَلَمَّا أَسْلَمَا وَتَلَّهُ لِلْجَبِينِ
وَنَادَيْنَاهُ أَن يَا إِبْرَاهِيمُ
قَدْ صَدَّقْتَ الرُّؤْيَا ۚ إِنَّا كَذَٰلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِنِينَ
إِنَّ هَٰذَا لَهُوَ الْبَلَاءُ الْمُبِينُ
وَفَدَيْنَاهُ بِذِبْحٍ عَظِيمٍ
وَتَرَكْنَا عَلَيْهِ فِي الْآخِرِينَ
سَلَامٌ عَلَىٰ إِبْرَاهِيمَ
كَذَٰلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِنِينَ
إِنَّهُ مِنْ عِبَادِنَا الْمُؤْمِنِينَ
وَبَشَّرْنَاهُ بِإِسْحَاقَ نَبِيًّا مِّنَ الصَّالِحِينَ
وَبَارَكْنَا عَلَيْهِ وَعَلَىٰ إِسْحَاقَ ۚ وَمِن ذُرِّيَّتِهِمَا مُحْسِنٌ وَظَالِمٌ لِّنَفْسِهِ مُبِينٌ

और बेशक हमें नूह ने पुकारा(1)
(1) और हम से अपनी क़ौम के अज़ाब और हलाकत की दरख़ास्त की.

तो हम क्या ही अच्छे क़ुबूल फ़रमाने वाले(2){75}
(2) कि हम ने उनकी दुआ क़ुबूल की और उनके दुश्मनों के मुक़ाबले में मदद की और उनसे पूरा बदला लिया कि उन्हे डुबो कर हलाक कर दिया.

और हमने उसे और उसके घर वालों को बड़ी तकलीफ़ से निजात दी {76} और हमने उसी की औलाद बाक़ी रखी (3) {77}
(3) तो अब दुनिया में जितने इन्सान हैं सब हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की नस्ल से हैं. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के किश्ती से उतरने के बाद उनके साथियों में जिस क़दर मर्द और औरत थे सभी मर गए सिवा आपकी औलाद और उनकी औरतों के, उन्हीं से दुनिया की नस्लें चलीं. अरब और फ़ारस और रूम आपके बेटे साम की औलाद से हैं और सूदान के लोग आपके बेटे हाम की नस्ल से और तुर्क और याज़ूज़ माजूज वग़ैरह आपके साहिबज़ादे याफ़िस की औलाद से.

और हमने पिछलों में उसकी तारीफ़ बाक़ी रखी (4) {78}
(4) यानी उनके बाद वाले नबी और उनकी उम्मतों में हज़रत नूह अलैहिस्सलाम का ज़िक्रे जमील बाक़ी रखा.

नूह पर सलाम हो जगत वालों में(5){79}
(5) यानी फ़रिश्ते और जिन्न और इन्सान सब उन पर क़यामत तक सलाम भेजा करें.

बेशक हम ऐसा ही सिला देते हैं नेकों को {80} बेशक वह हमारे उत्तम दर्जे के ईमान के पूरे बन्दों में है {81} फिर हमने दूसरों को डुबो दिया (6) {82}
(6) यानी हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की क़ौम के काफ़िरों को.

और बेशक उसी के गिरोह से इब्राहीम है (7){83}
(7) यानी हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के दीनों मिल्लत और उन्हीं के तरीक़े और सुन्नत पर हैं. हज़रत नूह अलैहिस्सलाम और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बीच दो हज़ार छ सौ चालीस साल का अन्तर है और दोनों हज़रात के बीच जो समय गुज़रा उसमें सिर्फ़ दो नबी हुए, हज़रत हूद अलैहिस्सलाम और हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम.

जब कि अपने रब के पास हाज़िर हुआ ग़ैर से सलामत दिल लेकर(8){84}
(8) यानी हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने दिल को अल्लाह तआला के लिये ख़ालिस किया और हर चीज़ से फ़ारिग़ कर लिया.

जब उसने अपने बाप और अपनी क़ौम से फ़रमाया (9)
(9) फटकार के तौर पर.

तुम क्या पूजते हो {85} क्या बोहतान से अल्लाह के सिवा और ख़ुदा चाहते हो {86} तो तुम्हारा क्या गुमान है सारे जगत के रब पर (10){87}
(10) कि जब तुम उसके सिवा दूसरे को पूजोगे तो क्या वह तुम्हें बेअज़ाब छोड़ देगा जबकि तुम जानते हो कि वही नेअमतें देने वाला सही मानी में इबादत का मुस्तहिक़ है. क़ौम ने कहा कि कल को हमारी ईद है, जंगल में मेला लगेगा. हम बढ़िया ख़ाने पकाकर बुतों के पास रख जाएंगे और मेले से वापस होकर तबर्रूक के तौर पर उनको खाएंगे आप भी हमारे साथ चलें और भीड़ और मेले की रौनक देखें. वहाँ से वापस आकर बुतों की ज़ीनत और सजावट और उनका बनाव सिंघार देखें. यह तमाशा देखने के बाद हम समझते हैं कि बुत परस्ती पर हमें मलामत न करेंगे.

फिर उसने एक निगाह सितारों को देखा (11) {88}
(11) जैसे कि सितारा शनास, नुजूम के माहिर सितारों के योग और प्रभाव को देखा करते हैं.

फिर कहा मैं बीमार होने वाला हूँ (12) {89}
(12) क़ोम ज्योतिष को बहुत मानती थी, वह समझी कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने सितारों से अपने बीमार होने का हाल मालूम कर लिया, अब यह किसी छूत की बमारी में मुब्तिला होने वाले हैं और छूत की बीमारी से वो लोग बहुत डरते थे. सितारों का इल्म सच्चा है और सीखने में मश्ग़ूल होना स्थगित हो चुका. शरीअत के अनुसार कोई बीमारी छूत की नहीं होती, यानी एक व्यक्ति की बीमारी उड़कर वैसी ही दूसरे में नहीं पहुंचती. तत्वों की ख़राबी और हवा वग़ैरह की हस्तियों के असर से एक वक़्त में बहुत से लोगों को एक तरह की बीमारी हो सकती है लेकिन बीमारी के कारण हर एक में अलग अलग हैं किसी की बीमारी किसी दूसरे में नहीं पहुंचती.

तो वो उस पर पीठ देकर फिर गए(13){90}
(13) अपनी ईद की तरफ़ और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को छोड़ गए, आप बुतख़ाने में आए.

फिर उनके ख़ुदाओ की तरफ़ छुप कर चला तो कहा क्या तुम नहीं खाते (14) {91}
(14) यानी उस खाने को जो तुम्हारे सामने रखा है, बुतों ने इसका कोई जवाब न दिया और वो जवाब ही क्या देते, तो आपने फ़रमाया.

तुम्हें क्या हुआ कि नहीं बोलते (15) {92}
(15) इसपर भी बुतों की तरफ़ से कुछ जवाब न हुआ वो बेजान पत्थर थे जवाब क्या देते.

तो लोगों की नज़र बचाकर उन्हें दाएं हाथ से मारने लगा (16) {93}
(16) और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने बुतों को मार मार कर टुकड़े टुकड़े कर दिया, जब काफ़िरों को इसकी ख़बर पहुंची.

तो काफ़िर उसकी तरफ़ जल्दी करते आए (17){94}
(17) और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम से कहने लगे कि हम तो इन बुतों को पूजते हैं तुम इन्हें तोड़ते हो.

फ़रमाया क्या अपने अपने हाथ के तराशों को पूजते हो {95} और अल्लाह ने तुम्हें पैदा किया और तुम्हारे अअमाल (कर्मो) को(18) {96}
(18) तो पूजने का मुस्तहिक़ वह है न बुत. इसपर वो हैरान हो गए और उन से कोई जवाब न बन आया.

बोले इसके लिये एक ईमारत चुनो (19)
(19) पत्थर की तीस गज़ लम्बी, बीस गज़ चौड़ी चार दीवारी फिर उसको लकड़ियों से भर दो और उनमें आग लगा दो यहाँ तक कि आग ज़ोर पकड़े.

फिर इसे भड़कती आग में डाल दो {97} तो उन्होंने उसपर दाँव चलना चाहा हमने उन्हें नीचा दिखाया (20){98}
(20) हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को इस आग में सलामत रखकर, चुनांन्चे आग से आप सलामत बरामद हुए.

और कहा मैं अपने रब की तरफ़ जाने वाला हूँ (21)
(21) इस दारूल कुफ़्र से हिजरत करके जहाँ जाने का मेरा रब हुक्म दे.

अब वह मुझे राह देगा(22){99}
(22) चुनांन्चे अल्लाह के हुक्म से आप शाम प्रदेश में अर्ज़े मुक़द्दसा के मक़ाम पर पहुंचे तो आपने अपने रब से दुआ की.

इलाही मुझे लायक़ औलाद दे {100} तो हमने उसे ख़ुशख़बरी सुनाई एक अक़्लमन्द लड़के की {101} फिर जब वह उसके साथ काम के क़ाबिल हो गया कहा ऐ मेरे बेटे मैंने ख़्वाब देखा मैं तुझे ज़िब्ह करता हूँ (23)
(23) यानी तेरे ज़िब्ह का इन्तिज़ाम कर रहा हूँ और नबीयों का ख़्वाब सच्चा होता है और उनके काम अल्लाह के हुक्म से हुआ करते हैं.

अब तू देख तेरी क्या राय है(24)
(24) यह आपने इसलिये कहा था कि बेटे को ज़िब्ह से वहशत न हो और अल्लाह के हुक्म की इताअत के लिये वह दिल से तैयार हों चुनांन्चे इस सुपुत्र ने अल्लाह की रज़ा पर फ़िदा होने का भरपूर शौक़ से इज़हार किया.

कहा ऐ मेरे बाप कीजिये जिस बात का आपको हुक्म होता है, ख़ुदा ने चाहा तो क़रीब है कि आप मुझे साबिर पाएंगे {102} तो जब उन दोनों ने हमारे हुक्म पर गर्दन रखी और बाप ने बेटे को माथे के बल लिटाया, उस वक़्त का हाल न पूछ (25) {103}
(25) ये वाक़िआ मिना में वाक़े हुआ और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने बेटे के गले पर छुरी चलाई. अल्लाह की क़ुदरत की छुरी ने कुछ भी काम न किया.

और हमने उसे निदा फ़रमाई कि ऐ इब्राहीम {104} बेशक तूने ख़्वाब सच कर दिखाया (26)
(26) इताअत व फ़रमाँबरदारी चरम सीमा पर पहुंचा दी. बेटे को ज़िब्ह के लिये बिना हिचकिचाए पेश कर दिया. बस अब इतना काफ़ी है.

हम ऐसा ही सिला देते हैं नेकों को {105} बेशक यह रौशन जांच थी {106} और हमने एक बड़ा ज़बीहा उसके फ़िदये (बदले) में देकर उसे बचा लिया (27) {107}
(27) इसमें इख़्तिलाफ़ है कि यह बेटे हज़रत इस्माईल हैं या हज़रत इस्हाक़. लेकिन प्रमाणों की शक्ति यही बताती है कि ज़िब्ह होने वाले हज़रत इस्माईल ही हैं और फ़िदिये में जन्नत से बकरी भेजी गई थी जिसको हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने ज़िब्ह फ़रमाया.

और हमने पिछलों में उसकी तारीफ़ बाक़ी रखी {108} सलाम हो इब्राहीम पर(28) {109}
(28) हमारी तरफ़ से.

हम ऐसा ही सिला देते हैं नेको को {110} बेशक वो हमारे उत्तम दर्जे के ईमान के पूरे बन्दों में हैं {111} और हमने उसे ख़ुशख़बरी दी इस्हाक़ की कि ग़ैब की ख़बरें बताने वाला नबी हमारे ख़ास क़ुर्ब (समीपता) के सज़ावारों में (29) {112}
(29) ज़िब्ह के वाक़ए के बाद हज़रत इस्हाक़ की ख़ुशख़बरी इस की दलील है कि हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की ज़बीह है.

और हमने बरकत उतारी उसपर और इस्हाक़ पर(30)
(30) हर तरह की बरकत, दीनी भी और दुनियावी भी और ज़ाहिरी बरकत यह है कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की औलाद में बहुतात की और हज़रत इस्हाक़ अलैहिस्सलाम की नस्ल से बहुत से नबी किये. हज़रत यअक़ूब से लेकर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम तक.

और उनकी औलाद में कोई अच्छा काम करने वाला (31)
(31) यानी ईमान वाला.

और कोई अपनी जान पर खुला ज़ुल्म करने वाला (32) {113}
(32) यानी काफ़िर. इससे मालूम हुआ कि किसी बाप के बहुत सी फ़ज़ीलतों के मालिक होने से औलाद का भी वैसा ही होना लाज़िम नहीं. यह अल्लाह तआला की शानें हैं, कभी नेक से नेक पैदा करता है, कभी बद से बद, कभी बद से नेक. न औलाद का बद होना बापों के लिये ऐब हो, न बापों की बदी औलाद के लिये.

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