36 सूरए यासीन- पाँचवां रूकू

36  सूरए यासीन- पाँचवां रूकू

وَمَن نُّعَمِّرْهُ نُنَكِّسْهُ فِى ٱلْخَلْقِ ۖ أَفَلَا يَعْقِلُونَ
وَمَا عَلَّمْنَٰهُ ٱلشِّعْرَ وَمَا يَنۢبَغِى لَهُۥٓ ۚ إِنْ هُوَ إِلَّا ذِكْرٌۭ وَقُرْءَانٌۭ مُّبِينٌۭ
لِّيُنذِرَ مَن كَانَ حَيًّۭا وَيَحِقَّ ٱلْقَوْلُ عَلَى ٱلْكَٰفِرِينَ
أَوَلَمْ يَرَوْا۟ أَنَّا خَلَقْنَا لَهُم مِّمَّا عَمِلَتْ أَيْدِينَآ أَنْعَٰمًۭا فَهُمْ لَهَا مَٰلِكُونَ
وَذَلَّلْنَٰهَا لَهُمْ فَمِنْهَا رَكُوبُهُمْ وَمِنْهَا يَأْكُلُونَ
وَلَهُمْ فِيهَا مَنَٰفِعُ وَمَشَارِبُ ۖ أَفَلَا يَشْكُرُونَ
وَٱتَّخَذُوا۟ مِن دُونِ ٱللَّهِ ءَالِهَةًۭ لَّعَلَّهُمْ يُنصَرُونَ
لَا يَسْتَطِيعُونَ نَصْرَهُمْ وَهُمْ لَهُمْ جُندٌۭ مُّحْضَرُونَ
فَلَا يَحْزُنكَ قَوْلُهُمْ ۘ إِنَّا نَعْلَمُ مَا يُسِرُّونَ وَمَا يُعْلِنُونَ
أَوَلَمْ يَرَ ٱلْإِنسَٰنُ أَنَّا خَلَقْنَٰهُ مِن نُّطْفَةٍۢ فَإِذَا هُوَ خَصِيمٌۭ مُّبِينٌۭ
وَضَرَبَ لَنَا مَثَلًۭا وَنَسِىَ خَلْقَهُۥ ۖ قَالَ مَن يُحْىِ ٱلْعِظَٰمَ وَهِىَ رَمِيمٌۭ
قُلْ يُحْيِيهَا ٱلَّذِىٓ أَنشَأَهَآ أَوَّلَ مَرَّةٍۢ ۖ وَهُوَ بِكُلِّ خَلْقٍ عَلِيمٌ
ٱلَّذِى جَعَلَ لَكُم مِّنَ ٱلشَّجَرِ ٱلْأَخْضَرِ نَارًۭا فَإِذَآ أَنتُم مِّنْهُ تُوقِدُونَ
أَوَلَيْسَ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ بِقَٰدِرٍ عَلَىٰٓ أَن يَخْلُقَ مِثْلَهُم ۚ بَلَىٰ وَهُوَ ٱلْخَلَّٰقُ ٱلْعَلِيمُ
إِنَّمَآ أَمْرُهُۥٓ إِذَآ أَرَادَ شَيْـًٔا أَن يَقُولَ لَهُۥ كُن فَيَكُونُ
فَسُبْحَٰنَ ٱلَّذِى بِيَدِهِۦ مَلَكُوتُ كُلِّ شَىْءٍۢ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ

और जिसे हम बड़ी उम्र का करें उसे पैदाइश से उलटा फेरें(1),
(1) कि वो बचपन की सी कमज़ोरी की तरफ़ वापस आने लगे और दम बदम उसकी ताक़तें, क़ुव्वतें और ज़िस्म और अक़्लें घटने लगीं.

तो क्या समझते नहीं(2){68}
(2) कि जो हालतों के बदलने पर ऐसा क़ादिर हो कि बचपन की कमज़ोरी और शरीर के छोटे अंगों और नादानी के बाद शबाब की क़ुव्वतें और शक्ति और मज़बूत बदन और समझ अता फ़रमाता है और फिर बड़ी उम्र और आख़िरी उम्र में उसी मज़बूत बदन वाले जवान को दुबला और कमज़ोर कर देता है, अब न वह बदन बाक़ी है, न क़ुव्वत, उठने बैठने में मजबूरियाँ दरपेश हैं, अक़्ल काम नहीं करती, बात याद नहीं रहती, अज़ीज़ रिश्तेदार को पहचान नहीं सकता. जिस परवर्दिगार ने यह तबदीली की वह क़ादिर है कि आँखें देने के बाद मिटा दे और अच्छी सूरतें अता फ़रमाने के बाद उन्हें बिगाड़ दे और मौत देने के बाद फिर ज़िन्दा कर दे.

और हमने उनको शेअर (कविता) कहना न सिखाया(3)
(3) मानी ये हैं कि हम ने आपको शेअर कहने की महारत न दी, या यह कि क़ुरआन शायरी की तालीम नहीं है और शेअर से झूटे का कलाम मुराद है, चाहे मौजूं हो या ग़ैर मौजूं. इस आयत में इरशाद है कि हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को अल्लाह तआला की तरफ़ से अव्वल आख़िर का इल्म तालीम फ़रमाया गया जिनसे हक़ीक़तें खुलती हैं और आप की मालूमात वाक़ई और हक़ीक़ी हैं. शेअर का  झूट नहीं, जो हक़ीक़त में जिहालत है, वह आपकी शान के लायक़ नहीं और आपका दामने अक़दस इससे पाक है. इसमें मौजूं कलाम के अर्थ वाले शेअर के जानने और उसके सही या ख़राब को पहचानने का इन्कार नहीं. नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के इल्म में तअने देने वालों के लिये यह आयत किसी तरह सनद नहीं हो सकती. अल्लाह तआला ने हुज़ूर को सारे जगत के उलूम अता फ़रमाए, इसके इन्कार में इस आयत को पेश करना मात्र ग़लत है. क़ुरैश के काफ़िरों ने कहा था कि मुहम्मद शायर है और जो वो फ़रमाते हैं, यानी क़ुरआन शरीफ़, वह शेअर है. इससे उनकी मुराद यह थी कि मआज़ल्लाह यह कलाम झूटा है जैसा कि क़ुरआन शरीफ़ में उनका कहना नक़्ल फ़रमाया गया है “बलिफ़्तराहो बल हुवा शाइरून” यानी बल्कि उनकी मनघड़त है बल्कि ये शायर हैं, (सूरए अंबिया, आयत 5) उसी का इसमें रद फ़रमाया गया कि हमने अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को ऐसी बातिल-गोई की महारत ही नहीं दी और यह किताब शेअरों यानी झूटों पर आधारित नहीं. क़ुरैश के काफ़िर ज़बान से ऐसे बदज़ौक़ और नज़्में उरूज़ी से ऐसे अन्जान न थे कि नस्र यानी गद्य को नज़्म यानी पद्य कह देते और कलामे पाक को शेअरे उरूज़ी बता बैठते और कलाम का मात्र उरूज़ के वज़न पर होना ऐसा भी न था कि उस पर ऐतिराज़ किया जा सके. इससे साबित हो गया कि उन बेदीनों की मुराद शेअर से झूटे कलाम की थी (मदारिक, जुमल व रूहुल बयान) और हज़रत शैख़े अकबर ने इस आयत के मानी में फ़रमाया है कि मानी ये हैं कि हमने अपने नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से मुअम्मे और इजमाल के साथ यानी घुमा फिराकर ख़िताब नहीं फ़रमाया जिसमें मानी या मतलब के छुपे रहने का संदेह हो बल्कि साफ़ और खुला कलाम फ़रमाया है जिसे सारे पर्दे उठ जाएं और उलूम रौशन हो जाएं.

और न वह उनकी शान के लायक़ है, वह तो नहीं मगर नसीहत और रौशन क़ुरआन(4){69}
(4) साफ़ ख़ुला हक़ व हिदायत, कहाँ वह पाक आसमानी किताब, सारे उलूम की जामेअ, और कहाँ शेअर जैसा झूटा कलाम. (अल किबरियते अहमर लेखक शैख़े अक़बर)

कि उसे डराए जो ज़िन्दा हो (5)
(5) दिले ज़िन्दा रखता हो, कलाम और ख़िताब को समझे और यह शान ईमान वाले की है.

और काफ़िरों पर बात साबित हो जाए(6) {70}
(6) यानी अज़ाब की हुज्जत क़ायम हो जाए.

और क्या उन्होंने न देखा कि हम ने अपने हाथ के बनाए हुए चौपाए उनके लिये पैदा किये तो ये उनके मालिक हैं {71} और उन्हें उनके लिये नर्म कर दिया(7)
(7) यानी मुसख़्खर और हुक्म के अन्तर्गत कर दिया.

तो किसी पर सवार होते हैं और किसी को खाते हैं {72} और उनके लिये उनमें कई तरह के नफ़े(8)
(8) और फ़ायदे हैं कि उनकी खालों, बालों और ऊन वग़ैरह काम में लाते हैं.

और पीने की चीज़ें हैं(9)
(9) दूध और दूध से बनने वाली चीज़ें, दही मट्ठा वग़ैरह.

तो क्या शुक्र न करेंगे (10){73}
(10) अल्लाह तआला की इन नेअमतों का.

और उन्होंने अल्लाह के सिवा और खुदा ठहरा लिये(11)
(11)  यानी बुतों को पुजने लगे.

कि शायद उनकी मदद हो (12) {74}
(12) और मुसीबत के वक़्त काम आएं और अज़ाब से बचाएं, और ऐसा संभव नहीं.

वो उनकी मदद नहीं कर सकते(13)
(13) क्योंकि पत्थर बेजान और बेक़ुदरत और बेशऊर है.

और वो उनके लश्कर सब गिरफ़्तार हाज़िर आएंगे(14) {75}
(14) यानी काफ़िरों के साथ उनके बुत भी गिरफ़्तार करके हाज़िर किये जाएंगे और सब जहन्नम में दाख़िल होंगे, बुत भी और उनके पुजारी भी.

तो तुम उनकी बात का ग़म न करो(15)
(15) यह ख़िताब है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को. अल्लाह तआला अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तसल्ली फ़रमाता है कि काफ़िरों के झुटलाने और इन्कार से और उनकी यातनाओं और अत्याचारों से आप दुखी न हों.

बेशक हम जानते हैं जो वो छुपाते हैं और ज़ाहिर करते हैं (16) {76}
(16) हम उन्हे उनके किरदार की जज़ा देंगे.

और क्या आदमी ने न देखा कि हमने उसे पानी की बूंद से बनाया जभी वह खुला झगड़ालू है(17){77}
(17) यह आयत आस बिन वाईल या अबू जहल और मशहूर यह है कि उबई बिन ख़लफ़ जमही के बारे मे उतरी जो मरने के बाद उठने के इन्कार में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से बहस और तक़रार करने आया था. उसके हाथ में एक गली हुई हड्डी थी, उसको तोड़ता जाता था और हुज़ूर से कहता जाता था कि क्या आपका ख़याल है कि इस हड्डी को गल जाने और टुकड़े टुकड़े हो जाने के बाद भी अल्लाह ज़िन्दा कर देगा. हु़ज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, हाँ और तुझे भी मरने के बाद उठाएगा और जहन्नम में दाख़िल फ़रमाएगा. इसपर यह आयत उतरी और उसकी जिहालत का इज़हार फ़रमाया कि गली हुई हड्डी का बिख़रने के बाद अल्लाह तआला की क़ुदरत से ज़िन्दगी क़ुबूल करना अपनी नादानी से असंभव समझता है कितना मुर्ख है. अपने आपको नहीं देखता कि शुरू में एक गन्दा नुत्फ़ा था, गली हुई हड्डी से भी तुच्छ. अल्लाह तआला की भरपूर क़ुदरत ने उसमें जान डाल दी, इन्सान बनाया तो ऐसा घमण्डी इन्सान हुआ कि उसकी क़ुदरत ही का इन्कारी होकर झगड़ने आ गया. इतना नहीं देखता कि जो सच्ची क़ुदरत वाला पानी की बूंद को मज़बूत इन्सान बना देता है, उसकी क़ुदरत से गली हुई हड्डी को दोबारा ज़िन्दगी बख़्श देना क्या दूर है, और इसको संभव समझना कितनी खुली हुई जिहालत है.

और हमारे लिये कहावत कहता है(18)
(18) यानी गली हुई हड्डी को हाथ से मलकर मसल बनाता है कि यह तो ऐसी बिखर गई, कैसे ज़िन्दा होगी.

और अपनी पैदाइश भूल गया(19)
(19)कि वीर्य की बूंद से पैदा किया गया है.

बोला ऐसा कौन हे कि हड्डियों को ज़िन्दा करे जब वो बिल्कुल गल गई {78} तुम फ़रमाओ उन्हे वह ज़िन्दा करेगा जिसने पहली बार उन्हें बनाया, और उसे हर पैदाइश की जानकारी है(20){79}
(20) पहली का भी और मौत के बाद वाली का भी.

जिसने तुम्हारे लिये हरे पेड़ में आग पैदा की जभी तुम उससे सुलगाते हो (21) {80}
(21)अरब में दो दरख़्त होते हैं जो वहाँ के जंगलों में बहुत पाए जाते हैं. एक का नाम मर्ख़ है, दूसरे का अफ़ार. उनकी ख़ासियत यह है कि जब उनकी हरी टहनियाँ काट कर एक दूसरे पर रगड़ी जाएं तो उनसे आग निकलती है. जब कि वह इतनी गीली होती है कि उनसे पानी टपकता होता है. इसमें क़ुदरत की कैसी अनोखी निशानी है कि आग और पानी दोनो एक दूसरे की ज़िद. हर एक एक जगह एक लकड़ी में मौजूद, न पानी आग को बुझाए न आग लकड़ी को जलाए. जिस क़ादिरे मुतलक की यह हिकमत है वह अगर एक बदन पर मौत के बाद ज़िन्दगी लाए तो उसकी क़ुदरत से क्या अज़ीब और उसको नामुमकिन कहना आसारे क़ुदरत देखकर जिहालत और दुश्मनी से इन्कार करना है.

और क्या वह जिसने आसमान और ज़मीन बनाए उन जैसे और नहीं बना सकता(22)
(22)  या उन्हीं को मौत के बाद ज़िन्दा नहीं कर सकता.

क्यों नहीं(23)
(23) बेशक वह इसपर क़ादिर है.

और वही है बड़ा पैदा करने वाला, सब कुछ जानता {81} उसका काम तो यही है कि जब किसी चीज़ को चाहे(24)
(24) कि पैदा करे.

तो उससे फ़रमाए हो जा, वह फ़ौरन हो जाती है(25) {82}
(25) यानी मख़लूक़ात का वुजूद उसके हुक्म के ताबे है.

तो पाकी है उसे जिसके हाथ हर चीज़ का क़ब्ज़ा है और उसी की तरफ़ फेरे जाओ(26){83}
(26) आख़िरत में.

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One Response

  1. Sunhan Allah, Masha Allah, Good Work.
    Surah-e-Yasin, Rooku-2 Ayat-24, you have a mistake there. Please correct. (should be “Alam yarav kam ahlakna kablahum MINAL quruni” but you have written “Alam yarav kam ahlakna kablahum MANAL quruni” in arabic).

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