36 सूरए यासीन- दूसरा रूकू

36  सूरए यासीन- दूसरा रूकू


وَٱضْرِبْ لَهُم مَّثَلًا أَصْحَٰبَ ٱلْقَرْيَةِ إِذْ جَآءَهَا ٱلْمُرْسَلُونَ
إِذْ أَرْسَلْنَآ إِلَيْهِمُ ٱثْنَيْنِ فَكَذَّبُوهُمَا فَعَزَّزْنَا بِثَالِثٍۢ فَقَالُوٓا۟ إِنَّآ إِلَيْكُم مُّرْسَلُونَ
قَالُوا۟ مَآ أَنتُمْ إِلَّا بَشَرٌۭ مِّثْلُنَا وَمَآ أَنزَلَ ٱلرَّحْمَٰنُ مِن شَىْءٍ إِنْ أَنتُمْ إِلَّا تَكْذِبُونَ
قَالُوا۟ رَبُّنَا يَعْلَمُ إِنَّآ إِلَيْكُمْ لَمُرْسَلُونَ
وَمَا عَلَيْنَآ إِلَّا ٱلْبَلَٰغُ ٱلْمُبِينُ
قَالُوٓا۟ إِنَّا تَطَيَّرْنَا بِكُمْ ۖ لَئِن لَّمْ تَنتَهُوا۟ لَنَرْجُمَنَّكُمْ وَلَيَمَسَّنَّكُم مِّنَّا عَذَابٌ أَلِيمٌۭ
قَالُوا۟ طَٰٓئِرُكُم مَّعَكُمْ ۚ أَئِن ذُكِّرْتُم ۚ بَلْ أَنتُمْ قَوْمٌۭ مُّسْرِفُونَ
وَجَآءَ مِنْ أَقْصَا ٱلْمَدِينَةِ رَجُلٌۭ يَسْعَىٰ قَالَ يَٰقَوْمِ ٱتَّبِعُوا۟ ٱلْمُرْسَلِينَ
ٱتَّبِعُوا۟ مَن لَّا يَسْـَٔلُكُمْ أَجْرًۭا وَهُم مُّهْتَدُونَ
وَمَا لِىَ لَآ أَعْبُدُ ٱلَّذِى فَطَرَنِى وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ
ءَأَتَّخِذُ مِن دُونِهِۦٓ ءَالِهَةً إِن يُرِدْنِ ٱلرَّحْمَٰنُ بِضُرٍّۢ لَّا تُغْنِ عَنِّى شَفَٰعَتُهُمْ شَيْـًۭٔا وَلَا يُنقِذُونِ
إِنِّىٓ إِذًۭا لَّفِى ضَلَٰلٍۢ مُّبِينٍ
إِنِّىٓ ءَامَنتُ بِرَبِّكُمْ فَٱسْمَعُونِ
قِيلَ ٱدْخُلِ ٱلْجَنَّةَ ۖ قَالَ يَٰلَيْتَ قَوْمِى يَعْلَمُونَ
بِمَا غَفَرَ لِى رَبِّى وَجَعَلَنِى مِنَ ٱلْمُكْرَمِينَ
۞ وَمَآ أَنزَلْنَا عَلَىٰ قَوْمِهِۦ مِنۢ بَعْدِهِۦ مِن جُندٍۢ مِّنَ ٱلسَّمَآءِ وَمَا كُنَّا مُنزِلِينَ
إِن كَانَتْ إِلَّا صَيْحَةًۭ وَٰحِدَةًۭ فَإِذَا هُمْ خَٰمِدُونَ
يَٰحَسْرَةً عَلَى ٱلْعِبَادِ ۚ مَا يَأْتِيهِم مِّن رَّسُولٍ إِلَّا كَانُوا۟ بِهِۦ يَسْتَهْزِءُونَ
أَلَمْ يَرَوْا۟ كَمْ أَهْلَكْنَا قَبْلَهُم مِّنَ ٱلْقُرُونِ أَنَّهُمْ إِلَيْهِمْ لَا يَرْجِعُونَ
وَإِن كُلٌّۭ لَّمَّا جَمِيعٌۭ لَّدَيْنَا مُحْضَرُونَ

और उनसे निशानियाँ बयान करो उस शहर वालों की (1)
(1)  इस शहर से मुराद अन्ताकियह है. यह एक बड़ा शहर है इसमें चश्में हैं, कई पहाड़ हैं एक पथरीली शहर पनाह यानी नगर सीमा है. बारह मील के घेरे में बसता है.

जब उनके पास भेजे हुए (रसूल) आए (2){13}
(2) हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के वाक़ए का संक्षिप्त बयान यह है कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने अपने दो हवारियों सादिक़ और सुदूक़ को अन्ताकियह भेजा ताकि वहाँ के लोगों को जो बुत परस्त थे सच्चे दीन की तरफ़ बुलाएं. जब ये दोनों शहर के क़रीब पहुंचे तो उन्होंने एक बूढ़े व्यक्ति को देखा कि बकरियाँ चरा रहा है. उसका नाम हबीब नज्जार था. उसने उनका हाल पूछा. उन दोनों ने कहा कि हम हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के भेजे हुए हैं तुम्हें सच्चे दीन की तरफ़ बुलाने आए हैं कि बुत परस्ती छोड़कर ख़ुदा परस्ती इख़्तियार करो. हबीब नज्जार ने निशानी पूछी. उन्होंने कहा कि निशानी यह है कि हम बीमारों को अच्छा करते हैं. अंधों को आँख वाला करते हैं, सफ़ेद दाग़ वालों का रोग दूर करते हैं. हबीब नज्जार का बेटा दो साल से बीमार था उन्होंने उस पर हाथ फेरा वह स्वस्थ हो गया. हबीब ईमान ले आए और इस घटना की ख़बर मशहूर हो गई यहाँ तक कि बहुत सारे लोगों ने उनके हाथों अपनी बीमारियों से सेहत पाई. यह ख़बर पहुंचने पर बादशाह ने उन्हें बुला कर कहा कि क्या हमारे मअबूदों के सिवा और कोई मअबूद भी है. उन दोनों ने कहा हाँ वही जिसने तुझे और तेरे मअबूदों को पैदा किया. फिर लोग उनके पीछे पड़ गए और उन्हें मारा, दोनों क़ैद कर लिये गए. फिर हज़रत ईसा ने शमऊन को भेजा. वह अजनबी बन कर शहर में दाख़िल हुए और बादशाह के मुसाहिबों और क़रीब के लोगों से मेल जोल पैदा करके बादशाह तक पहुंचे और उसपर अपना असर पैदा कर लिया. जब देखा कि बादशाह उनसे ख़ूब मानूस हो चुका है तो एक दिन बादशाह से ज़िक्र किया कि दो आदमी जो क़ैद किये गये हैं क्या उनकी बात सुनी गई थी कि वो क्या कहते थे. बादशाह ने कहा कि नहीं. जब उन्होंने नए दीन का नाम लिया फ़ौरन ही मुझे ग़ुस्सा आ गया. शमऊन ने कहा अगर बादशाह की राय हो तो उन्हें बुलाया जाए देखें उनके पास क्या है. चुनांन्चे वो दोनों बुलाए गए. शमऊन उनसे पूछा तुम्हें किस ने भेजा है. उन्हों ने कहा उस पर अल्लाह ने जिसने हर चीज़ को पैदा किया और हर जानदार को रोज़ी दी और जिसका कोई शरीक नहीं. शमऊन ने कहा कि उसकी संक्षेप में विशेषताएं बयान करो. उन्होंने कहा वह जो चाहता है करता है जो चाहता है हुक्म देता है. शमऊन ने कहा तुम्हारी निशानी क्या है. उन्होंने कहा जो बादशाह चाहे. तो बादशाह ने एक अंधे लड़के को बुलाया उन्होंने दुआ की वह फ़ौरन आँख वाला हो गया. शमऊन ने बादशाह से कहा कि अब मुनासिब यह है कि तू अपने मअबूदों से कह कि वो भी ऐसा ही करके दिखाएं ताकि तेरी और उनकी इज़्ज़त ज़ाहिर हो. बादशाह ने शमऊन से कहा कि तुम से कुछ छुपाने की बात नहीं है. हमारा मअबूद न देखे न सुने न कुछ बिगाड़ सके न बना सके. फिर बादशाह ने उन दोनों हवारियों से कहा कि अगर तुम्हारे मअबूद को मुर्दे के ज़िन्दा कर देन की ताक़त हो तो हम उसपर ईमान ले आएं. उन्होंने कहा हमारा मअबूद हर चीज़ पर क़ादिर है. बादशाह ने एक किसान के लड़के को मंगाया जिसे मरे हुए सात दिन हो चुके थे और जिस्म ख़राब हो गया था, बदबू फैल रही थी. उनकी  दुआ से अल्लाह तआला ने उसको ज़िन्दा किया और वह उठ खड़ा हुआ और कहने लगा मैं मुश्रिक मरा था मुझे जहन्नम की सात घाटियों में दाख़िल किया गया. मैं तुम्हें आगाह करता हूँ कि जिस दीन पर तुम हो वह बहुत हानिकारक है. ईमान ले आओ और कहने लगा कि आसमान के दर्वाज़े खुले और एक सुन्दर जवान मुझे नज़र आया जो उन तीनों व्यक्तियों की सिफ़ारिश करता है बादशाह ने कहा कौन तीन, उसने कहा एक शमऊन और दो ये. बादशाह को आश्चर्य हुआ. जब शमऊन ने देखा कि उसकी बात बादशाह पर असर कर गई तो उसने बादशाह को नसीहत की वह ईमान ले आया और उसकी क़ौम के कुछ लोग ईमान लाए और कुछ ईमान न लाए और अल्लाह के अज़ाब से हलाक किये गए.

जब हमने उनकी तरफ़ दो भेजे(3)
(3) यानी दो हवारी. वहब ने कहा उनके नाम यूहन्ना और बोलस थे और कअब का क़ौल है कि  सादिक़ व सदूक़.

फिर उन्होंने उनको झुटलाया तो हमने तीसरे से ज़ोर दिया(4)
(4) यानी शमऊन से तक़बियत और ताईद पहुंचाई.

अब उन सबने कहा (5)
(5) यानी तीनों फ़रिस्तादों यानी एलचियों ने.

कि बेशक हम तुम्हारी तरफ़ भेजे गए हैं {14} बोले तुम तो नहीं मगर हम जैसे आदमी और रहमान ने कुछ नहीं उतारा तुम निरे झूटे हो {15} वो बोले हमारा रब जानता है कि बेशक ज़रूर हम तुम्हारी तरफ़ भेजे गए हैं {16} और हमारे ज़िम्मे नहीं मगर साफ़ पहुंचा देना (6) {17}
6) खुली दलीलों के साथ और वह अन्धों और बीमारों को अच्छा करता और मुर्दों को ज़िन्दा करता है.

बोले हम तुम्हें मनहूस समझते हैं (7)
(7) जब से तुम आए बारिश ही नहीं हुई.

बेशक तुम अगर बाज़ न आए (8)
(8) अपने दीन की तबलीग़ से.

तो ज़रूर हम तुम्हें संगसार करेंगे और बेशक हमारे हाथों तुम पर दुख की मार पड़ेगी {18} उन्होंने फ़रमाया तुम्हारी नहूसत तो तुम्हारे साथ है (9)
(9) यानी तुम्हारा कुफ़्र.

क्या इस पर बिदकते हो कि तुम समझाए गए (10)
(10) और तुम्हें इस्लाम की दावत दी गई.

बल्कि तुम हद से बढ़ने वाले लोग हो(11) {19}
(11)  गुमराही और सरकशी में और यही बड़ी नहूसत है.

और शहर के पर्ले किनारे से एक मर्द दौड़ता आया (12)
(12) यानी हबीब नज्ज़ार जो पहाड़ के ग़ार में इबादत में मसरूफ़ था जब उसने सुना कि क़ौम ने इन एलचियों को झुटलाया.

बोला ऐ मेरी क़ौम भेजे हुओं की पैरवी करो {20} ऐसों की पैरवी करो जो तुम से कुछ नेग नहीं मांगते और वो राह पर हैं (13){21}
(13)हबीब नज्ज़ार की यह बात सुनकर क़ौम ने कहा कि क्या तू उनके दीन पर है और तू उनके मअबूद पर ईमान लाया, इसके जवाब में हबीब नज्ज़ार ने कहा.

पारा बाईस समाप्त

तेईसवाँ पारा – वमालिया
(सूरए यासीन जारी)

और मुझे क्या है कि उसकी बन्दगी न करूं जिसने मुझे पैदा किया और उसी की तरफ़ तुम्हे पलटना है(14) {22}
(14) यानी इब्तिदाए हस्ती से जिसकी हम पर नेअमतें हैं और आख़िरकार भी उसी की तरफ़ पलटना है. उस हक़ीक़ी मालिक की इबादत न करना क्या मानी और उसकी निस्बत ऐतिराज़ कैसा. हर व्यक्ति अपने वुजूद पर नज़र करके उसके हक्के नेअमत और एहसान को पहचान सकता है.

क्या अल्लाह के सिवा और ख़ुदा ठहराऊं? (15)
(15) यानी क्या बुतों को मअबूद बनाऊं.

कि अगर रहमान मेरा कुछ बुरा चाहे तो उनकी सिफ़ारिश मेरे कुछ काम न आए और न वो मुझे बचा सके {23} बेशक जब तो मैं खुली गुमराही में हूँ  (16) {24}
(16) जब हबीब नज्ज़ार ने अपनी क़ौम से ऐसा नसीहत भरा कलाम किया तो वो लागे उनपर अचानक टूट पड़े और उनपर पथराव शुरू कर दिया और पाँव से कुचला यहाँ तक कि क़त्ल कर डाला. उनकी क़ब्र अन्ताकियह में है जब क़ौम ने उनपर हमला शुरू किया तो उन्होंने हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के एलचियों से बहुत जल्दी करके यह कहा.

मुक़र्रर में तुम्हारे रब पर ईमान लाया तो मेरी सुनो (17) {25}
(17) यानी मेरे ईमान के गवाह रहो जब वो क़त्ल हो चुके तो इकराम (आदर) के तौर पर—

उससे फ़रमाया गया कि जन्नत में दाख़िल हो(18)
(18) जब वो जन्नत में दाख़िल हुए और वहाँ की नेअमतें देखीं.

कहा किसी तरह मेरी क़ौम जानती {26} जैसी मेरे रब ने मेरी मग़फ़िरत की और मुझे इज़्ज़त वालों में किया (19) {27}
(19) हबीब नज्ज़ार ने यह तमन्ना की कि उनकी क़ौम को मालूम हो जाए कि अल्लाह तआला ने हबीब नज्ज़ार की मग़फ़िरत की और मेहरबानी फ़रमाई ताकि क़ौम को रसूलों के दीन की तरफ़ रग़बत हो. जब हबीब क़त्ल कर दिये गए तो अल्लाह तआला का उस क़ौम पर ग़ज़ब हुआ और उनकी सज़ा में देर फ़रमाई गई. हज़रत जिब्रईल को हुक्म हुआ और उनकी एक ही हौलनाक आवाज़ से सब के सब मर गए चुनांन्चे इरशाद फ़रमाया जाता है.

और हमने उसके बाद उसकी क़ौम पर आसमान से कोई लश्कर न उतारा (20)
(20) इस क़ौम की हलाकत के लिये.

और न हमें वहाँ कोई लश्कर उतारना था {28} वह तो बस एक ही चीख़ थी जभी वो बुझ कर रह गए (21){29}
(21) फ़ना हो गए जैसे आग बुझ जाती है.

और कहा गया कि हाय अफ़सोस उन बन्दों पर (22)
(22) उन पर और उनकी तरह और सब पर जो रसूलों को झुटलाकर हलाक हुए.

जब उनके पास कोई रसूल आता है तो उससे ठट्टा ही करते हैं {30} क्या उन्होंने न देखा (23)
(23) यानी मकका वालों ने जो नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को झुटलाते है कि–

हमने उनसे पहले कितनी संगतें हलाक फ़रमाई कि वो अब उनकी तरफ़ पलटने वाले नहीं(24){31}
(24) यानी दुनिया की तरफ़ लौटने वाले नहीं. क्या ये लोग उनके हाल से इब्रत हासिल नहीं करते.

और जितने भी हैं सब के सब हमारे हुज़ूर हाज़िर लाए जाएंगे (25) {32}
(25) यानी सारी उम्मतें क़यामत के दिन हमारे हुज़ूर हिसाब के लिये मैदान में हाज़िर की जाएंगी.

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