36 सूरए यासीन- तीसरा रूकू

36  सूरए यासीन- तीसरा रूकू

وَءَايَةٌۭ لَّهُمُ ٱلْأَرْضُ ٱلْمَيْتَةُ أَحْيَيْنَٰهَا وَأَخْرَجْنَا مِنْهَا حَبًّۭا فَمِنْهُ يَأْكُلُونَ
وَجَعَلْنَا فِيهَا جَنَّٰتٍۢ مِّن نَّخِيلٍۢ وَأَعْنَٰبٍۢ وَفَجَّرْنَا فِيهَا مِنَ ٱلْعُيُونِ
لِيَأْكُلُوا۟ مِن ثَمَرِهِۦ وَمَا عَمِلَتْهُ أَيْدِيهِمْ ۖ أَفَلَا يَشْكُرُونَ
سُبْحَٰنَ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلْأَزْوَٰجَ كُلَّهَا مِمَّا تُنۢبِتُ ٱلْأَرْضُ وَمِنْ أَنفُسِهِمْ وَمِمَّا لَا يَعْلَمُونَ
وَءَايَةٌۭ لَّهُمُ ٱلَّيْلُ نَسْلَخُ مِنْهُ ٱلنَّهَارَ فَإِذَا هُم مُّظْلِمُونَ
وَٱلشَّمْسُ تَجْرِى لِمُسْتَقَرٍّۢ لَّهَا ۚ ذَٰلِكَ تَقْدِيرُ ٱلْعَزِيزِ ٱلْعَلِيمِ
وَٱلْقَمَرَ قَدَّرْنَٰهُ مَنَازِلَ حَتَّىٰ عَادَ كَٱلْعُرْجُونِ ٱلْقَدِيمِ
لَا ٱلشَّمْسُ يَنۢبَغِى لَهَآ أَن تُدْرِكَ ٱلْقَمَرَ وَلَا ٱلَّيْلُ سَابِقُ ٱلنَّهَارِ ۚ وَكُلٌّۭ فِى فَلَكٍۢ يَسْبَحُونَ
وَءَايَةٌۭ لَّهُمْ أَنَّا حَمَلْنَا ذُرِّيَّتَهُمْ فِى ٱلْفُلْكِ ٱلْمَشْحُونِ
وَخَلَقْنَا لَهُم مِّن مِّثْلِهِۦ مَا يَرْكَبُونَ
وَإِن نَّشَأْ نُغْرِقْهُمْ فَلَا صَرِيخَ لَهُمْ وَلَا هُمْ يُنقَذُونَ
إِلَّا رَحْمَةًۭ مِّنَّا وَمَتَٰعًا إِلَىٰ حِينٍۢ
وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ ٱتَّقُوا۟ مَا بَيْنَ أَيْدِيكُمْ وَمَا خَلْفَكُمْ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ
وَمَا تَأْتِيهِم مِّنْ ءَايَةٍۢ مِّنْ ءَايَٰتِ رَبِّهِمْ إِلَّا كَانُوا۟ عَنْهَا مُعْرِضِينَ
وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ أَنفِقُوا۟ مِمَّا رَزَقَكُمُ ٱللَّهُ قَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لِلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ أَنُطْعِمُ مَن لَّوْ يَشَآءُ ٱللَّهُ أَطْعَمَهُۥٓ إِنْ أَنتُمْ إِلَّا فِى ضَلَٰلٍۢ مُّبِينٍۢ
وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَٰذَا ٱلْوَعْدُ إِن كُنتُمْ صَٰدِقِينَ
مَا يَنظُرُونَ إِلَّا صَيْحَةًۭ وَٰحِدَةًۭ تَأْخُذُهُمْ وَهُمْ يَخِصِّمُونَ
فَلَا يَسْتَطِيعُونَ تَوْصِيَةًۭ وَلَآ إِلَىٰٓ أَهْلِهِمْ يَرْجِعُونَ

और उनके लिये एक निशानी मु्र्दा ज़मीन है(1)
(1) जो इसको साबित करती है कि अल्लाह तआला मुर्दे को ज़िन्दा फ़रमाएगा.

हमने उसे ज़िन्दा किया(2)
(2) यानी बरसा कर.

और फिर उससे अनाज़ निकाला तो उसमें से खाते हैं {33} और हमने उसमें(3)
(3) यानी ज़मीन में.

बाग़ बनाए खजूरों और अंगूरों के और हमने उसमें कुछ चश्मे बहाए{34} कि उसके फलों में से खाएं और ये उनके हाथ के बनाए नहीं तो क्या हक़ न मानेंगे(4) {35}
(4) और अल्लाह तआला की नेअमतों का शुक्र अदा न करेंगे.

पाकी है उसे जिसने सब जोड़े बनाए (5)
(5) यानी तरह तरह, क़िस्म क़िस्म.

उन चीज़ों से जिन्हें ज़मीन उगाती है(6)
(6) ग़ल्ले फल वग़ैरह.

और ख़ुद उनसे(7)
(7) औलाद, नर और माद.

और उन चीज़ों से जिनकी उन्हैं ख़बर नहीं(8){36}
(8) ख़ुश्क़ी और तरी की अजीबो ग़रीब मख़लूक़ात में से, जिसकी इन्सानों को ख़बर भी नहीं है.

और उनके लिये एक निशानी(9)
(9) हमारी ज़बरदस्त क़ुदरत को प्रमाणित करने वाली.

रात है हम उसपर से दिन खींच लेते हैं(10)
(10) तो बिल्कुल अंधेरी रह जाती है जिस तरह काले भुजंगे हबशी का सफ़ेद लिबास उतार लिया जाए तो फिर वह काला ही रह जाता है. इस से मालूम हुआ कि आसमान और ज़मीन के बीच की फ़ज़ा अस्ल में तारीक़ है. सूरज की रौशनी उसके लिये एक सफ़ेद लिबास की तरह है. जब सूरज डूब जाता है तो यह लिबास उतर जाता है और फ़ज़ा अपनी अस्ल हालत में तारीक रह जाती है.

जभी वो अंधेरों में हैं {37} और सूरज चलता है अपने एक ठहराव के लिये(11)
(11) यानी जहाँ तक उसकी सैर की हद मुक़र्रर फ़रमाई गई है और वह क़यामत का दिन है. उस वक़्त तक वह चलता ही रहेगा या ये मानी हैं कि वह अपनी मंज़िलों में चलता है और जब सबसे दूर वाले पश्चिम में पहुंचता है तो फिर लौट पड़ता है क्योंकि यही उसका ठिकाना है.

यह हुक्म है ज़बरदस्त इल्म वाले का(12) {38}
(12) और यह निशानी है जो उसकी भरपूर क़ुव्वत और हिकमत को प्रमाणित करती है.

और चांद के लिये हमने मंज़िलें मुक़र्रर कीं(13)
(13) चांद की 28 मंज़िलें हैं, हर रात एक मंज़िल में होता है और पूरी मंज़िल तय कर लेता है, न कम चले न ज़्यादा. निकलने की तारीख़ से अठ्ठाईसवीं तारीख़ तक सारी मंज़िलें तय कर लेता है. और अगर महीना तीस दिन का हो तो दो रात और उन्तीस का हो तो एक रात छुपता है और जब अपनी अन्तिम मंज़िलों में पहुंचता है तो बारीक और कमान की तरह बाँका और पीला हो जाता है.

यहां तक कि फिर हो गया जैसे खजूर की पुरानी डाली (टहर्नी) (14) {39}
(14) जो सूख कर पतली और बाँकी और पीली हो गई हो.

सूरज को नहीं पहुंचता कि चांद को पकड़ ले(15)
(15) यानी रात में, जो उसकी शौकत के ज़हूर का वक़्त है, उसके साथ जमा होकर, उसके नूर को मग़लूब करके, क्योंकि सूरज और चांद में से हर एक की शौकत के ज़हूर के लिये एक वक़्त मुक़र्रर है. सूरज के लिये दिन, और चाँद के लिये रात.

और न रात दिन पर सबक़त ले जाए(16)
(16) कि दिन का वक़्त पूरा होने से पहले आ जाए, ऐसा भी नहीं, बल्कि रात और दिन दोनों निर्धारित हिसाब के साथ आते जाते हैं. कोई उनमें से अपने वक़्त से पहले नहीं आता और सूरज चाँद में से कोई दूसरे की शौकत की सीमा में दाख़िल नहीं होता न आफ़ताब रात में चमके, न चाँद दिन में.

और हर एक एक घेरे में पैर रहा है {40} और उनके लिये एक निशानी यह है कि उन्हे उनके बुज़ुर्गों की पीठ में हमने भरी किश्ती में सवार किया(17){41}
(17) जो सामान अस्बाब वग़ैरह से भरी हुई थी, मुराद इससे किश्तीये नूह है जिसमें उनके पहले पूर्वज सवार किये गए थे और ये और इनकी सन्तानें उनकी पीठ में थीं.

और उनके लिये वैसी ही किश्तियां बना दीं जिनपर सवार होते हैं {42} और हम चाहें तो उन्हें डुबो दें (18)
(18) किश्तियों के बावुज़ूद.

तो न कोई उनकी फ़रियाद को पहुंचने वाला हो और न वो बचाए जाएं {43} मगर हमारी तरफ़ की रहमत और एक वक़्त तक बरतने देना (19) {44}
(19) जो उनकी ज़िन्दगी के लिये मुक़र्रर फ़रमाया है.

और जब उनसे फ़रमाया जाता है डरो तुम उससे जो तुम्हारे सामने है(20)
(20) यानी अज़ाबे दुनिया.

और जो तुम्हारे पीछे आने वाला है (21)
(21) यानी आख़िरत का अज़ाब.

इस उम्मीद पर कि तुम पर मेहर (दया) हो तो मुंह फेर लेते हैं {45} और जब कभी उनके रब की निशानियों से कोई निशानी उनके पास आती है तो उससे मुंह ही फेर लेते हैं(22){46}
(22) यानी उनका दस्तूर और काम का तरीक़ा ही यह है कि वो हर आयत और नसीहत से मुंह फेर लिया करते हैं.

और जब उनसे फ़रमाया जाए अल्लाह के दिये में से कुछ उसकी राह में खर्च करो तो काफ़िर मुसलमानों के लिये कहते हैं कि क्या हम उसे खिलाएं, जिसे अल्लाह चाहता तो खिला देता(23)
(23) यह आयत क़ुरैश के काफ़िरों के हक़ में उतरी जिनसे मुसलमानों ने कहा था कि तुम अपने मालों का वह हिस्सा मिस्कीनों पर ख़र्च करो जो तुमने अपनी सोच में अल्लाह तआला के लिये निकाला है. इसपर उन्होंने कहा कि क्या हम उन्हें खिलाएं जिन्हें अल्लाह खिलाना चाहता तो खिला देता. मतलब यह था कि ख़ुदा ही को दरिद्रों का मोहताज़ रखना मंज़ूर है तो उन्हें खाने को देना उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ होगा. यह बात उन्होंने कंजूसी से, हंसी मज़ाक़ के तौर पर कही थी पर बिल्कुल ग़लत थी क्योंकि दुनिया परीक्षा की जगह है. फ़क़ीरी और अमीरी दोनों आज़मायशें हैं. फ़क़ीर की परीक्षा सब्र से और मालदार की अल्लाह की रहा में खर्च करने से. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि मक्कए मुकर्रमा में ज़िन्दीक़ लोग थे जब उनसे कहा जाता था कि मिस्कीनों को सदक़ा दो तो कहते थे कि हरगिज़ नहीं. यह कैसे हो सकता है कि जिसको अल्लाह तआला मोहताज करे, हम खिलाएं.

तुम तो नहीं मगर खुली गुमराही में {47} और कहते हैं कब आएगा ये वादा (24)
(24) दोबारा ज़िन्दा होने और क़यामत का.

अगर तुम सच्चे हो (25) {48}
(25) अपने दावे में. उनका यह ख़िताब नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और आपके सहाबा से था. अल्लाह तआला उनके हक़ में फ़रमाता है.

राह नहीं देखते मगर एक चीख़ की(26)
(26) यानी सूर के पहले फूंके जाने की, जो हज़रत इस्राफ़ील अलैहिस्सलाम फूंकेंगे.

कि उन्हें आ लेगी जब वो दुनिया के झगड़े में फंसे होंगे (27) {49}
(27) ख़रीदों फ़रोख़्त में और खाने पीने में, और बाज़ारों और मजलिसों में, दुनिया के कामों में, कि अचानक क़यामत हो जाएगी. हदीस शरीफ़ में है कि नबिये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि ख़रीदार और विक्रेता के बीच कपड़ा फैला होगा, न सौदा पूरा होने पाएगा, न कपड़ा लपेटा जाएगा कि क़यामत हो जाएगी. यानी लोग अपने अपने कामों में लगे होंगे और वो काम वैसे ही अधूरे रह जाएंगे, न उन्हें ख़ुद पूरा कर सकेंगे, न किसी दूसरे से पूरा करने को कह सकेंगे और जो घर से बाहर गए हैं वो वापस न आ सकेंगे, चुनांन्चे इरशाद होता है.

तो न वसीयत कर सकेंगे और न अपने घर पलट कर जाएं (28) {50}
(28) वहीं मर जाएंगे और क़यामत फ़र्सत और मोहलत न देगी.

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