36 सूरए यासीन- चौथा रूकू

36  सूरए यासीन- चौथा रूकू

وَنُفِخَ فِى ٱلصُّورِ فَإِذَا هُم مِّنَ ٱلْأَجْدَاثِ إِلَىٰ رَبِّهِمْ يَنسِلُونَ
قَالُوا۟ يَٰوَيْلَنَا مَنۢ بَعَثَنَا مِن مَّرْقَدِنَا ۜ ۗ هَٰذَا مَا وَعَدَ ٱلرَّحْمَٰنُ وَصَدَقَ ٱلْمُرْسَلُونَ
إِن كَانَتْ إِلَّا صَيْحَةًۭ وَٰحِدَةًۭ فَإِذَا هُمْ جَمِيعٌۭ لَّدَيْنَا مُحْضَرُونَ
فَٱلْيَوْمَ لَا تُظْلَمُ نَفْسٌۭ شَيْـًۭٔا وَلَا تُجْزَوْنَ إِلَّا مَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
إِنَّ أَصْحَٰبَ ٱلْجَنَّةِ ٱلْيَوْمَ فِى شُغُلٍۢ فَٰكِهُونَ
هُمْ وَأَزْوَٰجُهُمْ فِى ظِلَٰلٍ عَلَى ٱلْأَرَآئِكِ مُتَّكِـُٔونَ
لَهُمْ فِيهَا فَٰكِهَةٌۭ وَلَهُم مَّا يَدَّعُونَ
سَلَٰمٌۭ قَوْلًۭا مِّن رَّبٍّۢ رَّحِيمٍۢ
وَٱمْتَٰزُوا۟ ٱلْيَوْمَ أَيُّهَا ٱلْمُجْرِمُونَ
۞ أَلَمْ أَعْهَدْ إِلَيْكُمْ يَٰبَنِىٓ ءَادَمَ أَن لَّا تَعْبُدُوا۟ ٱلشَّيْطَٰنَ ۖ إِنَّهُۥ لَكُمْ عَدُوٌّۭ مُّبِينٌۭ
وَأَنِ ٱعْبُدُونِى ۚ هَٰذَا صِرَٰطٌۭ مُّسْتَقِيمٌۭ
وَلَقَدْ أَضَلَّ مِنكُمْ جِبِلًّۭا كَثِيرًا ۖ أَفَلَمْ تَكُونُوا۟ تَعْقِلُونَ
هَٰذِهِۦ جَهَنَّمُ ٱلَّتِى كُنتُمْ تُوعَدُونَ
ٱصْلَوْهَا ٱلْيَوْمَ بِمَا كُنتُمْ تَكْفُرُونَ
ٱلْيَوْمَ نَخْتِمُ عَلَىٰٓ أَفْوَٰهِهِمْ وَتُكَلِّمُنَآ أَيْدِيهِمْ وَتَشْهَدُ أَرْجُلُهُم بِمَا كَانُوا۟ يَكْسِبُونَ
وَلَوْ نَشَآءُ لَطَمَسْنَا عَلَىٰٓ أَعْيُنِهِمْ فَٱسْتَبَقُوا۟ ٱلصِّرَٰطَ فَأَنَّىٰ يُبْصِرُونَ
وَلَوْ نَشَآءُ لَمَسَخْنَٰهُمْ عَلَىٰ مَكَانَتِهِمْ فَمَا ٱسْتَطَٰعُوا۟ مُضِيًّۭا وَلَا يَرْجِعُونَ

और फूंका जाएगा सूर(1)
(1) दूसरी बार. यह सूर का दूसरी बार फूंका जाना है जो मुर्दों को उठाने के लिये होगा और इन दोनों फूंकों के बीच चालीस साल का फ़ासला होगा.

जभी वो क़ब्रों से(2)
(2) ज़िन्दा होकर.

अपने रब की तरफ़ दौड़ते चलेंगें {51} कहेंगे हाय हमारी ख़राबी, किसने हमें सोते से जगा दिया(3)
(3) यह कहना काफ़िरों का होगा. इज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि वो यह बात इस लिये कहेंगे कि अल्लाह तआला दोनों फूंकों के बीच उनसे अज़ाब उठादेगा और इतना ज़माना वो सोते रहेंगे और सूर के दूसरी बार फूंके जाने के बाद उठाए जाएंगे और क़यामत की सख़्तियाँ देखेंगे तो इस तरह चीख़ उठेंगे और यह भी कहा गया है कि जब काफ़िर जहन्नम और उसका अज़ाब देखेंगे तो उसके मुक़ाबले में क़ब्र का अज़ाब उन्हें आसान मालूम होगा इसलिये वो अफ़सोस पुकार उठेंगे और उस वक़्त कहेंगे.

यह है वह जिसका रहमान ने वादा दिया था और रसूलों ने हक़ फ़रमाया (4) {52}
(4) और उस वक़्त का इक़रार उन्हें कुछ नफ़ा न देगा.

वह तो न होगी मगर एक चिंघाड़ (5)
(5) यानी सूर के आख़िरी बार फूंके जाने की एक हौलनाक आवाज़ होगी.

जभी वो सब के सब हमारे हुज़ूर हाजिर हो जाएंगे(6) {53}
(6) हिसाब के लिये, फिर उसे कहा जाएगा.

तो आज किसी जान पर कुछ ज़ुल्म न होगा और तुम्हें बदला न मिलेगा मगर अपने किये का {54} बेशक जन्नत वाले आज दिल के बहलावों में चैन करते हैं (7){55}
(7)  तरह तरह की नेअमतें और क़िस्म क़िस्म के आनन्द और अल्लाह तआला की तरफ़ से ज़ियाफ़तें, जन्नती नेहरों के किनारे जन्न्त के वृक्षों की दिलनवाज़ फ़ज़ाएं, ख़ुशी भरा संगीत, जन्नत की सुन्दरियों का क़ुर्ब और क़िस्म क़िस्म की नेअमतों के मज़े, ये उनके शग़ल होंगे.

वो और उनकी बीबियाँ सायों में हैं तख़्तों पर तकिया लगाए {56} उनेक लिये उसमें मेवा है और उनके लिये है उसमें जो मांगे {57} उन पर सलाम होगा मेहरबान रब का फ़रमाया हुआ (8){58}
(8) यानी अल्लाह तआला उनपर सलाम फ़रमाएगा चाहे सीधे सीधे या किसी ज़रिये से और यह सब से बड़ी और प्यारी मुराद है. फ़रिश्ते जन्नत वालों के पास हर दरवाज़े से आकर कहेंगे तुमपर तुम्हारे रहमत वाले रब का सलाम.

और आज अलग फट जाओ ऐ मुजरिमों (9){59}
(9) जिस वक़्त मूमिन जन्नत की तरफ़ रवाना किये जाएंगे, उस वक़्त काफ़िरों से कहा जाएगा कि अलग फट जाओ. मूमिनों से अलाहदा हो जाओ एक क़ौल यह भी है कि यह हुक्म काफ़िरों को होगा कि अलग अलग जहन्नम में अपने अपने ठिकाने पर जाएं.

ऐ आदम की औलाद क्या मैं ने तुम से एहद न लिया था (10)
(10) अपने नबियों की मअरिफ़त.

कि शैतान को न पूजना (11)
(11) उसकी फ़रमाँबरदारी न करना.

बेशक वह तुम्हारा खुला दुश्मन है {60} और मेरी बन्दगी करना(12)
(12) और किसी को इबादत में मेरा शरीक न करना.

यह सीधी राह है {61} और बेशक उसने तुम में से बहुत सी ख़लक़त को बहका दिया, तो क्या तुम्हें अक़्ल न थी (13){62}
(13) कि तुम उसकी दुश्मनी और गुमराह गरी को समझते और जब वो जहन्नम के क़रीब पहुंचेंगे तो उनसे कहा जाएगा.

यह है वह जहन्नम जिसका तुम से वादा दिया था {63} आज उसी मैं जाओ बदला अपने कुफ़्र का {64} आज हम उनके मुंहों पर मोहर कर देंगे (14)
(14) कि वो बोल न सकेंगे और यह कृपा करना उनके यह कहने के कारण होगा कि हम मुश्रिक न थे, न हमने रसूलों को झुटलाया.

और उनके हाथ हम से बात करेंगे और उनके पाँव उनके किये की गवाही देंगे (15) {65}
(15) उनके अंग बोल उठेंगे और जो कुछ उनसे सादिर हुआ है, सब बयान कर देंगे.

और अगर हम चाहते तो उनकी आँखें मिटा देते (16)
(16) कि निशान भी बाक़ी न रहता. इस तरह का अंधा कर देते.

फिर लपक कर रस्ते की तरफ़ जाते तो उन्हें कुछ न सूझता(17){66}
(17) लेकिन हमने ऐसा न किया और अपने फ़ज़्लों करम से देखने की नेअमत उनके पास बाक़ी रखी तो अब उनपर हक़ यह कि वो शुक्रगुज़ारी करें, कुफ़ न करें.

और अगर हम चाहते तो उनके घर बैठे उनकी सूरतें बदल देते (18)
(18) और उन्हें बन्दर या सुअर बना देते.

न आगे बढ़ सकते न पीछे लौटते (19) {67}
(19) और उनके जुर्म इसी के क़ाबिल थे लेकिन हमने अपनी रहमत और करम और हिकमत के अनुसार अज़ाब में जल्दी न की और उनके लिये मोहलत रखी.

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