35 सूरए फ़ातिर

35  सूरए फ़ातिर

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ

الْحَمْدُ لِلَّهِ فَاطِرِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ جَاعِلِ الْمَلَائِكَةِ رُسُلًا أُولِي أَجْنِحَةٍ مَّثْنَىٰ وَثُلَاثَ وَرُبَاعَ ۚ يَزِيدُ فِي الْخَلْقِ مَا يَشَاءُ ۚ إِنَّ اللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
مَّا يَفْتَحِ اللَّهُ لِلنَّاسِ مِن رَّحْمَةٍ فَلَا مُمْسِكَ لَهَا ۖ وَمَا يُمْسِكْ فَلَا مُرْسِلَ لَهُ مِن بَعْدِهِ ۚ وَهُوَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ
يَا أَيُّهَا النَّاسُ اذْكُرُوا نِعْمَتَ اللَّهِ عَلَيْكُمْ ۚ هَلْ مِنْ خَالِقٍ غَيْرُ اللَّهِ يَرْزُقُكُم مِّنَ السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ ۚ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ فَأَنَّىٰ تُؤْفَكُونَ
وَإِن يُكَذِّبُوكَ فَقَدْ كُذِّبَتْ رُسُلٌ مِّن قَبْلِكَ ۚ وَإِلَى اللَّهِ تُرْجَعُ الْأُمُورُ
يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّ وَعْدَ اللَّهِ حَقٌّ ۖ فَلَا تَغُرَّنَّكُمُ الْحَيَاةُ الدُّنْيَا ۖ وَلَا يَغُرَّنَّكُم بِاللَّهِ الْغَرُورُ
إِنَّ الشَّيْطَانَ لَكُمْ عَدُوٌّ فَاتَّخِذُوهُ عَدُوًّا ۚ إِنَّمَا يَدْعُو حِزْبَهُ لِيَكُونُوا مِنْ أَصْحَابِ السَّعِيرِ
الَّذِينَ كَفَرُوا لَهُمْ عَذَابٌ شَدِيدٌ ۖ وَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَهُم مَّغْفِرَةٌ وَأَجْرٌ كَبِيرٌ

सूरए फ़ातिर मक्का में उतरी, इसमें 46 आयतें 5 रूकू हैं.
पहला रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) सूरए फ़ातिर मक्के में उतरी – इसमें पाँच रूकू, पैंतालीस आयतें, नौ सौ सत्तर कलिमे,  तीन हज़ार एक सौ अक्षर है.

सब ख़ूबियाँ अल्लाह को जो आसमानों और ज़मीन का बनाने वाला फ़रिश्तों को रसूल करने वाला(2)
(2) अपने नबियों की तरफ़.

जिनके दो दो तीन तीन चार चार पर हैं, बढ़ाता है आफ़रीनश में जो चाहे(3)
(3) फ़रिश्तों में और उनके सिवा और मख़लूक़ में.

बेशक अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर (सक्षम) है {1} अल्लाह जो रहमत लोगों के लिये खोले(4)
(4) जैसे बारिश, रिज़्क़ और सेहत वग़ैरह.

उसका कोई रोकने वाला नहीं और जो कुछ रोक ले तो उसकी रोक के बाद उसका कोई छोड़ने वाला नहीं, और वही इज़्ज़त हिकमत वाला है {2} ऐ लोगों अपने ऊपर अल्लाह का एहसान याद करो(5)
(5) कि उसने तुम्हारे लिये ज़मीन को फ़र्श बनाया, आसमान को बग़ैर किसी सुतून के क़ायम किया, अपनी राह बताने और हक़ की दावत देने के लिये रसूलों को भेजा रिज़्क़ के दरवाज़े खोले.

क्या अल्लाह के सिवा और भी कोई ख़ालिक़ (सृष्टा) है कि आसमान और ज़मीन से(6)
(6) मेंह बरसाकर और तरह तरह की वनस्पति पैदा करके.

तुम्हें रोज़ी दे उसके सिवा कोई मअबद नहीं तो तुम कहाँ औंधे जाते हो(7){3}
(7) और यह जानते हुए कि वही ख़ालिक़ और रिज़्क़ देने वाला है. ईमान और तौहीद से क्यों फिरते हो. इसके बाद नबिये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तसल्ली के लिये फ़रमाया जाता है.

और अगर ये तुम्हे झुटलाएं(8)
(8) ऐ मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम और तुम्हारी नबुव्वत और रिसालत को मानें और तौहीद और दोबारा उठाए जाने और हिसाब और अज़ाब का इन्कार करें.

तो बेशक तुम से पहले कितने ही रसूल झुटलाए गए(9)
(9) उन्होंने सब्र किया, आप भी सब्र फ़रमाइये. काफ़िरों का नबियों के साथ पहले से यह दस्तूर चला आता है.

और सब काम अल्लाह ही की तरफ़ फिरते हैं (10){4}
(10) वह झुटलाने वालों को सज़ा देगा और रसूलों की मदद फ़रमाएगा.

ऐ लोगों बेशक अल्लाह का वादा सच है(11)
(11) क़यामत ज़रूर आनी है, मरने के बाद ज़रूर उठना है, कर्मों का हिसाब यक़ीनन होगा. हर एक को उसके किये की जज़ा बेशक मिलेगी.

तो हरगिज़ तुम्हें धोखा न दे दुनिया की ज़िन्दग़ी (12)
(12) कि उसकी लज़्ज़तों में मश्ग़ूल होकर आख़िरत को भूल जाओ.

और हरगिज़ तुम्हें अल्लाह के हुक्म पर फ़रेब न दे वह बड़ा फ़रेबी(13){5}
(13) यानी शैतान तुम्हारे दिलों में यह वसवसा डाल कर कि गुनाहों से मज़ा उठालो. अल्लाह तआला हिल्म फ़रमाने वाला है वह दर गुज़र करेगा. अल्लाह तआला बेशक हिल्म वाला है लेकिन शैतान की फ़रेबकारी यह है कि बन्दों को इस तरह तौबह और नेक अमल से रोकता है और गुनाह और गुमराही पर उकसाता है, उसके धोखे से होशियार रहो.

बेशक शैतान तुम्हारा दुश्मन है तो तुम भी उसे दुश्मन समझो(14)
(14) और उसकी इताअत न करो और अल्लाह तआला की फ़रमाँबरदारी में मश्ग़ूल रहो.

वह तो अपने गिरोह को(15)
(15) यानी अपने अनुयाइयों और उसके विरोधियों का हाल तफ़सील के साथ बयान फ़रमाया जाता है.

इसीलिये बुलाता है कि दोज़ख़ियों में हो(16) {6}
(16) अब शैतान के अनुयाइयों और उसके विरोधियों का हाल तफ़सील के साथ बयान फ़रमाया जाता है.

काफ़िरों के लिये(17)
(17) जो शैतान के गिरोह में से हैं.

सख़्त अज़ाब है, और जो ईमान लाए और अच्छे काम किये (18)उनके लिये बख़्शिश और बड़ा सवाब है {7}
(18) और शैतान के धोखे में न आए और उसकी राह न चले.

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