35 सूरए फ़ातिर- पाँचवां रूकू

35  सूरए फ़ातिर- पाँचवां रूकू

إِنَّ اللَّهَ عَالِمُ غَيْبِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ إِنَّهُ عَلِيمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ
هُوَ الَّذِي جَعَلَكُمْ خَلَائِفَ فِي الْأَرْضِ ۚ فَمَن كَفَرَ فَعَلَيْهِ كُفْرُهُ ۖ وَلَا يَزِيدُ الْكَافِرِينَ كُفْرُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ إِلَّا مَقْتًا ۖ وَلَا يَزِيدُ الْكَافِرِينَ كُفْرُهُمْ إِلَّا خَسَارًا
قُلْ أَرَأَيْتُمْ شُرَكَاءَكُمُ الَّذِينَ تَدْعُونَ مِن دُونِ اللَّهِ أَرُونِي مَاذَا خَلَقُوا مِنَ الْأَرْضِ أَمْ لَهُمْ شِرْكٌ فِي السَّمَاوَاتِ أَمْ آتَيْنَاهُمْ كِتَابًا فَهُمْ عَلَىٰ بَيِّنَتٍ مِّنْهُ ۚ بَلْ إِن يَعِدُ الظَّالِمُونَ بَعْضُهُم بَعْضًا إِلَّا غُرُورًا
۞ إِنَّ اللَّهَ يُمْسِكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ أَن تَزُولَا ۚ وَلَئِن زَالَتَا إِنْ أَمْسَكَهُمَا مِنْ أَحَدٍ مِّن بَعْدِهِ ۚ إِنَّهُ كَانَ حَلِيمًا غَفُورًا
وَأَقْسَمُوا بِاللَّهِ جَهْدَ أَيْمَانِهِمْ لَئِن جَاءَهُمْ نَذِيرٌ لَّيَكُونُنَّ أَهْدَىٰ مِنْ إِحْدَى الْأُمَمِ ۖ فَلَمَّا جَاءَهُمْ نَذِيرٌ مَّا زَادَهُمْ إِلَّا نُفُورًا
اسْتِكْبَارًا فِي الْأَرْضِ وَمَكْرَ السَّيِّئِ ۚ وَلَا يَحِيقُ الْمَكْرُ السَّيِّئُ إِلَّا بِأَهْلِهِ ۚ فَهَلْ يَنظُرُونَ إِلَّا سُنَّتَ الْأَوَّلِينَ ۚ فَلَن تَجِدَ لِسُنَّتِ اللَّهِ تَبْدِيلًا ۖ وَلَن تَجِدَ لِسُنَّتِ اللَّهِ تَحْوِيلًا
أَوَلَمْ يَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَيَنظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ وَكَانُوا أَشَدَّ مِنْهُمْ قُوَّةً ۚ وَمَا كَانَ اللَّهُ لِيُعْجِزَهُ مِن شَيْءٍ فِي السَّمَاوَاتِ وَلَا فِي الْأَرْضِ ۚ إِنَّهُ كَانَ عَلِيمًا قَدِيرًا
وَلَوْ يُؤَاخِذُ اللَّهُ النَّاسَ بِمَا كَسَبُوا مَا تَرَكَ عَلَىٰ ظَهْرِهَا مِن دَابَّةٍ وَلَٰكِن يُؤَخِّرُهُمْ إِلَىٰ أَجَلٍ مُّسَمًّى ۖ فَإِذَا جَاءَ أَجَلُهُمْ فَإِنَّ اللَّهَ كَانَ بِعِبَادِهِ بَصِيرًا

बेशक अल्लाह जानने वाला है आसमानों और ज़मीन की हर छुपी बात का, बेशक वही दिलों की बात जानता है{38} वही है जिसने तुम्हें ज़मीन में अगलों का जानशीन किया(1)
(1) और उनके इमलाक और क़ब्ज़े वाली चीज़ों का मालिक और मुतसर्रिफ़ बनाया और उनके मुनाफ़े तुम्हारे लिये मुबाह किये ताकि तुम ईमान और इताअत इख़्तियार करके शुक्रगुज़ारी करो.

तो जो कुफ़्र करे(2)
(2) और उन नेअमतों पर अल्लाह का शुक्र अदा न किया.

उसका कुफ़्र उसी पर पड़े(3)
(3) यानी अपने कुफ़्र का वबाल उसी को बर्दाश्त करना पड़ेगा.

और काफ़िरों को उनका कुफ़्र उनके रब के यहाँ नहीं बढ़ाएगा मगर बेज़ारी(4)
(4) यानी अल्लाह का ग़ज़ब.

और काफ़िरों को उनका कुफ़्र न बढ़ाएगा मगर नुक़सान(5){39}
(5) आख़िरत में.

तुम फ़रमाओ भला बताओ तो अपने वो शरीक(6)
(6) यानी बुत.

जिन्हें अल्लाह के सिवा पूजते हो, मुझे दिखाओ उन्होंने ज़मीन में से कौन सा हिस्सा बनाया आसमानों में कुछ उनका साझा है(7)
(7) कि आसमान के बनाने में उन्हें कुछ दख़ल हो, किस कारण उन्हें इबादत का मुस्तहिक़ क़रार देते हो.

या हमने उन्हें कोई किताब दी है कि वो उसकी रौशन दलीलों पर हैं(8)
(8) इनमें से कोई भी बात नहीं.

बल्कि ज़ालिम आपस में एक दूसरे को वादा नहीं देते मगर धोखे का(9){40}
(9) कि उनमें जो बहकाने वाले हैं वो अपने अनुयाइयों को धोखा देते हैं और बुतों की तरफ़ से उन्हें बातिल उम्मीदें दिलाते हैं.

बेशक अल्लाह रोके हुए है आसमानों और ज़मीन को कि जुंबिश (हरकत) न करें(10)
(10) वरना आसमान और ज़मीन के बीच शिर्क जैसा गुनाह हो तो आसमान और ज़मीन कैसे क़ायम रहें.

और अगर वो हट जाएं तो उन्हें कौन रोके अल्लाह के सिवा, बेशक वह हिल्म वाला बख्शने वाला है{41} और उन्होंने अल्लाह की क़सम खाई अपनी क़समों में हद की कोशिश से कि अगर उनके पास कोई डर सुनाने वाला आया तो वो ज़रूर किसी न किसी गिरोह से ज़्यादा राह पर होंगे(11)
(11)  नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को तशरीफ़ आवरी से पहले क़ुरैश ने यहूदियों और ईसाइयों के अपने रसूलों को मानने और उनको झुटलाने की निस्बत कहा था कि अल्लाह तआला उनपर लअनत करे कि उनके पास अल्लाह तआला की तरफ़ से रसूल आए और उन्हों ने उन्हें झुटलाया और न माना. ख़ुदा की क़सम अगर हमारे पास कोई रसूल आए तो हम उनसे ज़्यादा राह पर रहेंगे और उस रसूल को मानने में उनके बेहतर गिरोह पर सबक़त ले जाएंगे.

फिर जब उनके पास डर सुनाने वाला तशरीफ़ लाया(12)
(12) यानी नबियों के सरदार हबीबे ख़ुदा मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की रौनक़ अफ़रोज़ी और जलवा आराई हुई.

तो उसने उन्हें न बढ़ाया मगर नफ़रत करना (13){42}
(13) हक़ व हिदायत से और.

अपनी जान को ज़मीन में ऊंचा खींचना और दाँव (14)
(14) बुरे दाव से मुराद या तो शिर्क व कुफ़्र है या रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ छलकपट करना.

और बुरा दाँव अपने चलने वाले पर ही पड़ता है(15)
(15) यानी मक्कार पर, चुनांन्चे फ़रेबकारी करने वाले बद्र में मारे गए.

तो काहे के इन्तिज़ार में हैं मगर उसी के जो अगलों का दस्तूर (तरीक़ा) हुआ(16)
(16) कि उन्होंने तकज़ीब की और उनपर अज़ाब उतरे.

तो तुम हरगिज़ अल्लाह के दस्तूर को बदलता न पाओगे और हरगिज़ अल्लाह के कानून को टलता न पाओगे {43} और क्या उन्होंने ज़मीन में सफ़र न किया कि देखते उनसे अगलों का कैसा अंजाम हुआ(17)
(17) यानी क्या उन्होंने शाम और इराक़ और यमन के सफ़रों में नबियों को झुटलाने वालों की हलाकत और बर्बादी और उनके अज़ाब और तबाही के निशानात नहीं देखे कि उनसे इब्रत हासिल करते.

और वो उनसे ज़ोर में सख़्त थे (18)
(18) यानी वो तबाह हुई क़ौमें इन मक्का वालों से ज़्यादा शक्तिशाली थीं इसके बावुजूद इतना भी न हो सका कि वो अज़ाब से भाग कर कहीं पनाह ले सकतीं.

और अल्लाह वह नहीं जिसके क़ाबू से निकल सके कोई चीज़ आसमानों और ज़मीन में बेशक वह इल्म व क़ुदरत वाला है{44} और अगर अल्लाह लोगों को उनके किये पर पकड़ता(19)
(19) यानी उनके गुनाहों पर.

तो ज़मीन की पीठ पर कोई चलने वाला न छोड़ता लेकिन एक मुक़र्रर (निश्चित) मीआद(20)
(20) यानी क़यामत के दिन.

तक उन्हें ढील देता है फिर जब उनका वादा आएगा तो बेशक अल्लाह के सब बन्दे उसकी निगाह में हैं(21){45}
(21) उन्हें उनके कर्मों की जज़ा देगा. जो अज़ाब के हक़दार हैं उन्हें अज़ाब फ़रमाएगा और जो करम के लायक़ हैं उनपर रहमो करम करेगा.

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