35 सूरए फ़ातिर- चौथा रूकू

35  सूरए फ़ातिर- चौथा रूकू

أَلَمْ تَرَ أَنَّ اللَّهَ أَنزَلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَأَخْرَجْنَا بِهِ ثَمَرَاتٍ مُّخْتَلِفًا أَلْوَانُهَا ۚ وَمِنَ الْجِبَالِ جُدَدٌ بِيضٌ وَحُمْرٌ مُّخْتَلِفٌ أَلْوَانُهَا وَغَرَابِيبُ سُودٌ
وَمِنَ النَّاسِ وَالدَّوَابِّ وَالْأَنْعَامِ مُخْتَلِفٌ أَلْوَانُهُ كَذَٰلِكَ ۗ إِنَّمَا يَخْشَى اللَّهَ مِنْ عِبَادِهِ الْعُلَمَاءُ ۗ إِنَّ اللَّهَ عَزِيزٌ غَفُورٌ
إِنَّ الَّذِينَ يَتْلُونَ كِتَابَ اللَّهِ وَأَقَامُوا الصَّلَاةَ وَأَنفَقُوا مِمَّا رَزَقْنَاهُمْ سِرًّا وَعَلَانِيَةً يَرْجُونَ تِجَارَةً لَّن تَبُورَ
لِيُوَفِّيَهُمْ أُجُورَهُمْ وَيَزِيدَهُم مِّن فَضْلِهِ ۚ إِنَّهُ غَفُورٌ شَكُورٌ
وَالَّذِي أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ مِنَ الْكِتَابِ هُوَ الْحَقُّ مُصَدِّقًا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهِ ۗ إِنَّ اللَّهَ بِعِبَادِهِ لَخَبِيرٌ بَصِيرٌ
ثُمَّ أَوْرَثْنَا الْكِتَابَ الَّذِينَ اصْطَفَيْنَا مِنْ عِبَادِنَا ۖ فَمِنْهُمْ ظَالِمٌ لِّنَفْسِهِ وَمِنْهُم مُّقْتَصِدٌ وَمِنْهُمْ سَابِقٌ بِالْخَيْرَاتِ بِإِذْنِ اللَّهِ ۚ ذَٰلِكَ هُوَ الْفَضْلُ الْكَبِيرُ
جَنَّاتُ عَدْنٍ يَدْخُلُونَهَا يُحَلَّوْنَ فِيهَا مِنْ أَسَاوِرَ مِن ذَهَبٍ وَلُؤْلُؤًا ۖ وَلِبَاسُهُمْ فِيهَا حَرِيرٌ
وَقَالُوا الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي أَذْهَبَ عَنَّا الْحَزَنَ ۖ إِنَّ رَبَّنَا لَغَفُورٌ شَكُورٌ
الَّذِي أَحَلَّنَا دَارَ الْمُقَامَةِ مِن فَضْلِهِ لَا يَمَسُّنَا فِيهَا نَصَبٌ وَلَا يَمَسُّنَا فِيهَا لُغُوبٌ
وَالَّذِينَ كَفَرُوا لَهُمْ نَارُ جَهَنَّمَ لَا يُقْضَىٰ عَلَيْهِمْ فَيَمُوتُوا وَلَا يُخَفَّفُ عَنْهُم مِّنْ عَذَابِهَا ۚ كَذَٰلِكَ نَجْزِي كُلَّ كَفُورٍ
وَهُمْ يَصْطَرِخُونَ فِيهَا رَبَّنَا أَخْرِجْنَا نَعْمَلْ صَالِحًا غَيْرَ الَّذِي كُنَّا نَعْمَلُ ۚ أَوَلَمْ نُعَمِّرْكُم مَّا يَتَذَكَّرُ فِيهِ مَن تَذَكَّرَ وَجَاءَكُمُ النَّذِيرُ ۖ فَذُوقُوا فَمَا لِلظَّالِمِينَ مِن نَّصِيرٍ

क्या तूने न देखा कि अल्लाह ने आसमान से पानी उतारा(1)
(1) बारिश उतारी.

तो हमने उससे फल निकाले रंग बिरंगे(2)
(2) सब्ज़, सुर्ख़, ज़र्द वग़ैरह, तरह तरह के अनार सेब, इन्जीर, अंगूर वग़ैरह बे शुमार.

और पहाड़ों में रास्ते हैं सफ़ेद और सुर्ख़ रंग के और कुछ काले भुजंग{27} और आदमियों और जानवरों और चौपायों के रंग यूंही तरह तरह के हैं(3)
(3) जैसे फलों और पहाड़ों में, यहाँ अल्लाह तआला ने अपनी आयतें और अपनी क़ुदरत की निशानियाँ और ख़ालिक़ीयत (सृजन-शक्ति) के निशान जिन से उसकी ज़ात व सिफ़ात पर इस्तिदलाल किया जाए, ज़िक्र कीं इसके बाद फ़रमाया.

अल्लाह से उसके बन्दों में वही डरते हैं जो इल्म वाले हैं(4)
(4) और उसकी सिफ़ात को जानते और उसकी अज़मत को पहचानते हैं, जितना इल्म ज़्यादा, उतना ख़ौफ़ ज़्यादा. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि मुराद यह है कि मख़लूक़ में अल्लाह तआला का ख़ौफ़ उसको है जो अल्लाह तआला के जबरूत और उसकी इज़्ज़त व शान से बाख़बर है. बुख़ारी व मुस्लिम की हदीस में है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया क़सम अल्लाह तआला की कि मैं अल्लाह तआला को सबसे ज़्यादा जानने वाला हूँ और सब से ज़्यादा उसका ख़ौफ़ रखने वाला हूँ.

बेशक अल्लाह बख़्शने वाला इज़्ज़त वाला है {28} बेशक वो जो अल्लाह की किताब पढ़ते हैं और नमाज़ क़ायम रखते हैं और हमारे दिये से कुछ हमारी राह में ख़र्च करते हैं छुपवां और ज़ाहिर वो ऐसी तिजारत के उम्मीदवार हैं(5){29}
(5) यानी सवाब के.

जिसमें हरगिज़ टोटा नहीं ताकि उनके सवाब उन्हें भरपूर दे और अपने फ़ज़्ल से और ज़्यादा अता करे बेशक वह बख़्शने वाला क़द्र फ़रमाने वाला है {30} और वह किताब जो हमने तुम्हारी तरफ़ वही भेजी (6)
(6) यानी क़ुरआने मजीद.

वही हक़ (सत्य) है अपने से अगली किताबों की तस्दीक़(पुष्टि) फ़रमाती हुई, बेशक अल्लाह अपने बन्दों से ख़बरदार देखने वाला है (7){31}
(7) और उनके ज़ाहिर व बातिन का जानने वाला.

फिर हमने किताब का वारिस किया अपने चुने हुए बन्दों को(8)
(8) यानी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की उम्मत को यह किताब अता फ़रमाई जिन्हें तमाम उम्मतों पर बुज़ुर्गी दी और नबियों के सरदार सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ग़ुलामी और नियाज़मन्दी की करामत और शराफ़त से मुशर्रफ़ फ़रमाया. इस उम्मत के लोग मुख़्तलिफ़ दर्जे रखते हैं.

तो उनमें कोई अपनी जान पर ज़ुल्म करता है, और उनमें कोई बीच की चाल पर है, और उनमें कोई वह है जो अल्लाह के हुक्म से भलाइयों में सबक़त ले गया(9)
(9) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि सबक़त ले जाने वाला सच्चा मूमिन है और बीच का रास्ता चलने वाला वह जिसके कर्म रिया से हों और ज़ालिम से मुराद यहाँ वह है जो अल्लाह की नेअमत का इन्कारी तो न हो लेकिन शुक्र बजा न लाए. हदीस शरीफ़ में है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि हमारा पिछला तो पिछला ही है और मध्यमार्गी निजात पाया हुआ ज़ालिम मग़फ़ूर. एक और हदीस में है हुज़ूरे अक़दस सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया नेकियों में सबक़त लेजाने वाला जन्नत में बेहिसाब दाख़िल होगा और बीच की राह चलने वाले से हिसाब में आसानी की जाएगी और ज़ालिम हिसाब के मक़ाम में रोका जाएगा उसको परेशानी पेश आएगी फिर जन्नत में दाख़िल होगा. उम्मुल मूमिनीन हज़रत आयशा रदियल्लाहो अन्हा ने फ़रमाया कि साबिक़, एहदे रिसालत के वो मुख़लिस लोग हैं जिनके लिये रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने जन्नत की बशारत दी और बीच के रस्ते चलने वाले वो सहाबा हैं जो आपके तरीक़े पर चलते रहे और ज़ालिम हम तुम जैसे लोग हैं. यह हद दर्जे की विनम्रता थी हज़रत उम्मुल मूमिनीन रदियल्लाहो अन्हा की कि अपने आपको इस तीसरे तब्क़े (वर्ग) में शुमार फ़रमाया. इस बुज़ुर्गी और बलन्दी के बावुजूद जो अल्लाह तआला ने आपको अता फ़रमाई थी और भी इसकी तफ़सीर में बहुत क़ौल हैं जो तफ़सीरों में तफ़सील से आए हैं.

यही बड़ा फ़ज़्ल है {32} बसने के बाग़ों में दाख़िल होंगे वो(10)
(10) तीनों गिरोह.

उनमें सोने के कंगन और मोती पहनाए जाएंगे, और वहाँ उनकी पोशाक रेशमी है {33} और कहेंगे सब ख़ूबियाँ अल्लाह को जिसने हमारा ग़म दूर किया (11)
(11) इस ग़म से मुराद या दोज़ख़ का ग़म है या मौत का या गुनाहों का या ताआतों के ग़ैर मक़बूल होने का या क़यामत के हौल का. ग़रज़ उन्हें कोई ग़म न होगा और वो उसपर अल्लाह की हम्द करेंगे.

बेशक हमारा रब बख़्शने वाला क़द्र फ़रमाने वाला है(12) {34}
(12)  कि गुनाहों को बख़्शता है और ताअतें क़ुबूल फ़रमाता है.

वह जिसने हमें आराम की जगह उतारा अपने फ़ज़्ल से, हमें उसमें कोई तकलीफ़ न पहुंचे और न हमें उसमें कोई तकान लाहिक़ हो {35} और जिन्हों ने कुफ़्र किया उनके लिये जहन्नम की आग है न उनकी क़ज़ा (मौत) आए कि मर जाएं (13)
(13) और मर कर अज़ाब से छूट सकें.

और न उनपर उसका (14)
(14) यानी जहन्नम का.

अज़ाब कुछ हल्का किया जाए, हम ऐसी ही सज़ा देते हैं हर बड़े नाशुक्रे को {36} और वो उसमें चिल्लाते होंगे (15)
(15) यानी जहन्नम में चीख़ते और फ़रियाद करते होंगे कि—

ऐ हमारे रब, हमें निकाल (16)
(16) यानी दोज़ख़ से निकाल और दुनिया में भेज.

कि हम अच्छा काम करें उसके ख़िलाफ़ जो पहले करते थे (17)
(17) यानी हम बजाय कुफ़्र के ईमान लाएं और बजाय गुमराही और नाफ़रमानी के तेरी इताअत और फ़रमाँबरदारी करें, इस पर उन्हें जवाब दिया जाएगा.

और क्या हम ने तुम्हें वह उम्र न दी थी जिसमें समझ लेता जिसे समझना होता और डर सुनाने वाला (18)
(18)

तुम्हारे पास तशरीफ़ लाया था (19)
(19) तुमने उस रसूले मोहतरम की दावत क़ुबूल न की और उनकी इताअत व फ़रमाँबरदारी बजा न लाए.

तो अब चखो(20) कि ज़ालिमों का कोई मददगार नहीं {37}
(20) अज़ाब का मज़ा.

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