34 सूरए सबा- पाचँवां रूकू

34  सूरए सबा- पाचँवां रूकू

وَمَا أَمْوَالُكُمْ وَلَا أَوْلَادُكُم بِالَّتِي تُقَرِّبُكُمْ عِندَنَا زُلْفَىٰ إِلَّا مَنْ آمَنَ وَعَمِلَ صَالِحًا فَأُولَٰئِكَ لَهُمْ جَزَاءُ الضِّعْفِ بِمَا عَمِلُوا وَهُمْ فِي الْغُرُفَاتِ آمِنُونَ
وَالَّذِينَ يَسْعَوْنَ فِي آيَاتِنَا مُعَاجِزِينَ أُولَٰئِكَ فِي الْعَذَابِ مُحْضَرُونَ
قُلْ إِنَّ رَبِّي يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَن يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ وَيَقْدِرُ لَهُ ۚ وَمَا أَنفَقْتُم مِّن شَيْءٍ فَهُوَ يُخْلِفُهُ ۖ وَهُوَ خَيْرُ الرَّازِقِينَ
وَيَوْمَ يَحْشُرُهُمْ جَمِيعًا ثُمَّ يَقُولُ لِلْمَلَائِكَةِ أَهَٰؤُلَاءِ إِيَّاكُمْ كَانُوا يَعْبُدُونَ
3قَالُوا سُبْحَانَكَ أَنتَ وَلِيُّنَا مِن دُونِهِم ۖ بَلْ كَانُوا يَعْبُدُونَ الْجِنَّ ۖ أَكْثَرُهُم بِهِم مُّؤْمِنُونَ
فَالْيَوْمَ لَا يَمْلِكُ بَعْضُكُمْ لِبَعْضٍ نَّفْعًا وَلَا ضَرًّا وَنَقُولُ لِلَّذِينَ ظَلَمُوا ذُوقُوا عَذَابَ النَّارِ الَّتِي كُنتُم بِهَا تُكَذِّبُونَ
وَإِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ آيَاتُنَا بَيِّنَاتٍ قَالُوا مَا هَٰذَا إِلَّا رَجُلٌ يُرِيدُ أَن يَصُدَّكُمْ عَمَّا كَانَ يَعْبُدُ آبَاؤُكُمْ وَقَالُوا مَا هَٰذَا إِلَّا إِفْكٌ مُّفْتَرًى ۚ وَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا لِلْحَقِّ لَمَّا جَاءَهُمْ إِنْ هَٰذَا إِلَّا سِحْرٌ مُّبِينٌ
وَمَا آتَيْنَاهُم مِّن كُتُبٍ يَدْرُسُونَهَا ۖ وَمَا أَرْسَلْنَا إِلَيْهِمْ قَبْلَكَ مِن نَّذِيرٍ
وَكَذَّبَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ وَمَا بَلَغُوا مِعْشَارَ مَا آتَيْنَاهُمْ فَكَذَّبُوا رُسُلِي ۖ فَكَيْفَ كَانَ نَكِيرِ

और तुम्हारे माल और तुम्हारी औलाद इस क़ाबिल नहीं कि तुम्हें हमारे करीब तक पहुंचाएं मगर वो जो ईमान लाए और नेकी की(1)
(1) यानी माल किसी के लिये क़ुर्ब का कारण नहीं सिवाय नेक मूमिन के, जो उसको ख़ुदा की राह में ख़र्च करे. और औलाद के लिये क़ुर्ब का कारण नहीं, सिवाय उस मूमिन के जो उन्हे नेक इल्म सिखाए, दीन की तालीम दे, और नेक और तक़वा वाला बनाए.

उनके लिये दूनादूं सिला(2)
(2) एक नेकी के बदले दस से लेकर सात सौ गुना तक और इससे भी ज़्यादा, जितना ख़ुदा चाहे.

उनके अमल (कर्म) का बदला और वो बालाख़ानों (अट्टालिकाओ) में अम्न व अमान से हैं(3){37}
(3) यानी जन्नत की ऊंची मंज़िलों में.

और वो जो हमारी आयतों में हराने की कोशिश करते हैं(4)
(4) यानी क़ुरआने करीम पर आलोचना करते हैं और यह गुमान करते हैं कि अपनी इन ग़लत हरकतों से वो लोगों को ईमान लाने से रोक देंगे. और उनका यह छलकपट इस्लाम के हक़ में चल जाएगा और वो हमारे अज़ाब से बच रहेंगे कयोंकि उनका अक़ीदा यह है कि मरने के बाद उठना ही नहीं है तो अज़ाब सवाब कैसा.

वो अज़ाब में ला धरे जाएंगे (5){38}
(5) और उनकी मक्कारियाँ उनके कुछ काम न आएंगी.

तुम फ़रमाओ बेशक मेरा रब रिज़्क़ वसीअ (विस्तृत) फ़रमाता है अपने बन्दों में जिसके लिये चाहे और तंगी फ़रमाता है जिसके लिये चाहे  (6)
(6) अपनी हिकमत के अनुसार.

और जो चीज़ तुम अल्लाह की राह में ख़र्च करो वह उसके बदले और देगा (7)
(7)  दुनिया में या आख़िरत में.  बुख़ारी और मुस्लिम की हदीस में है कि अल्लाह तआला फ़रमाता है ख़र्च करो तुम पर ख़र्च किया जाएगा. दूसरी हदीस में है सदक़े से माल कम नहीं होता, माफ़ करने से इज़्ज़त बढ़ती है, विनम्रता से दर्जे बलन्द होते हैं.

और वह सबसे बेहतर रिज़्क़ देने वाला (8){39}
(8) क्योंकि उसके सिवा जो कोई किसी को देता है चाहे बादशाह लश्कर को, या आक़ा ग़ुलाम को, या घर वाला अपने बीवी बच्चो को, वह अल्लाह तआला की पैदा की हुई और उसकी अता की हुई रोज़ी में से देता है. रिज़्क़ और उससे नफ़ा उठाने के साधनों का पैदा करने वाला अल्लाह तआला के सिवा कोई नहीं. वही सच्चा रिज़्क़ देने वाला है.

और जिस दिन उन सब को उठाएगा (9)
(9) यानी उन मुश्रिकों को.

फिर फ़रिश्तों से फ़रमाएगा क्या ये तुम्हें पूजते थे(10){40}
(10) दुनिया में.

वो अर्ज़ करेंगे पाकी है तुझ को तू हमारा दोस्त है न वो(11)
(11) यानी हमारी उनसे कोई दोस्ती नहीं तो हम किस तरह उनके पूजने से राज़ी हो सकते थे. हम उससे बरी हैं.

बल्कि वो जिन्नों को पूजते थे(12)
(12) यानी शैतानों को कि उनकी इताअत के लिये ग़ैर ख़ुदा को पूजते हैं.

उनमें अक्सर उन्हीं पर यक़ीन लाए थे(13){41}
(13) यानी शैतानों पर.

तो आज तुम में एक दूसरे के भले बुरे का कुछ इख़्तियार न रखेगा(14)
(14) और वो झूटे मअबूद अपने पुजारियों को कुछ नफ़ा नुक़सान न पहुंचा सकेंगे.

और हम फ़रमांगे ज़ालिमों से, उस आग का अज़ाब चखो जिसे तुम झुटलाते थे(15) {42}
(15) दुनिया में.

और जब उनपर हमारी रौशन आयतें(16)
(16) यानी क़ुरआन की आयतें, हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ज़बान से.

पढ़ीं जाएं तो कहते हैं(17)
(17)हज़रत सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की निस्बत.

ये तो नहीं मगर एक मर्द कि तुम्हें रोकना चाहते हैं तुम्हारे बाप दादा के मअबूदों से(18)
(18)यानी बुतों से.

और कहते हैं (19)
(19)क़ुरआन शरीफ़ की निस्बत.

ये तो नहीं बोहतान जोड़ा हुआ, और काफ़िरों ने हक़ को कहा(20)
(20) यानी कु़रआन शरीफ़ को.

जब उनके पास आया यह तो नहीं मगर खुला जादू {43} और हमने उन्हें कुछ किताबें न दीं जिन्हें पढ़ते हों न तुम से पहले उनके पास कोई डर सुनाने वाला आया (21){44}
(21) यानी आप से पहले अरब के मुश्रिकों के पास न कोई किताब आई न रसूल जिसकी तरफ़ अपने दीन की निस्बत कर सके तो ये जिस ख़याल पर हैं उनके पास उसकी कोई सनद नहीं वह उनके नफ़्स का धोखा है.

और उनसे अगलों ने(22)
(22) यानी पहली उम्मतों ने क़ुरैश की तरह रसूलों को झुटलाया और उनको.

झुटलाया और ये उसके दसवें को भी न पहुंचे जो हमने उन्हें दिया था (23)
(23) यानी जो क़ुव्वत और माल औलाद की बहुतात और लम्बी उम्र पहलों को दी गई थी, क़ुरैश के मुश्रिकों के पास से तो उसका दसवाँ हिस्सा भी नहीं, उनके पहले तो उनसे ताक़त और क़ुव्वत, माल दौलत में दस गुना से ज़्यादा थे.

फिर उन्होंने मेरे रसूलों को झुटलाया तो कैसा हुआ मेरा इन्कार करना (24) {45}
(24) यानी उनको नापसन्द रखना और अज़ाब देना और हलाक फ़रमाना यानी पहले झुटलाने वालों ने मेरे रसूलों को झुटलाया तो मैं ने अपने अज़ाब से उन्हें हलाक किया और उनकी ताक़त व क़ुव्वत और माल दौलत कोई भी चीज़ उनके काम न आई. इन लोगों की क्या हक़ीक़त है, इन्हे डरना चाहिये.

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