34 सूरए सबा- तीसरा रूकू

34  सूरए सबा- तीसरा रूकू

قُلِ ادْعُوا الَّذِينَ زَعَمْتُم مِّن دُونِ اللَّهِ ۖ لَا يَمْلِكُونَ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ فِي السَّمَاوَاتِ وَلَا فِي الْأَرْضِ وَمَا لَهُمْ فِيهِمَا مِن شِرْكٍ وَمَا لَهُ مِنْهُم مِّن ظَهِيرٍ
وَلَا تَنفَعُ الشَّفَاعَةُ عِندَهُ إِلَّا لِمَنْ أَذِنَ لَهُ ۚ حَتَّىٰ إِذَا فُزِّعَ عَن قُلُوبِهِمْ قَالُوا مَاذَا قَالَ رَبُّكُمْ ۖ قَالُوا الْحَقَّ ۖ وَهُوَ الْعَلِيُّ الْكَبِيرُ
۞ قُلْ مَن يَرْزُقُكُم مِّنَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۖ قُلِ اللَّهُ ۖ وَإِنَّا أَوْ إِيَّاكُمْ لَعَلَىٰ هُدًى أَوْ فِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ
قُل لَّا تُسْأَلُونَ عَمَّا أَجْرَمْنَا وَلَا نُسْأَلُ عَمَّا تَعْمَلُونَ
قُلْ يَجْمَعُ بَيْنَنَا رَبُّنَا ثُمَّ يَفْتَحُ بَيْنَنَا بِالْحَقِّ وَهُوَ الْفَتَّاحُ الْعَلِيمُ
قُلْ أَرُونِيَ الَّذِينَ أَلْحَقْتُم بِهِ شُرَكَاءَ ۖ كَلَّا ۚ بَلْ هُوَ اللَّهُ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ
وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا كَافَّةً لِّلنَّاسِ بَشِيرًا وَنَذِيرًا وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ
وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَٰذَا الْوَعْدُ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
قُل لَّكُم مِّيعَادُ يَوْمٍ لَّا تَسْتَأْخِرُونَ عَنْهُ سَاعَةً وَلَا تَسْتَقْدِمُونَ

तुम फ़रमाओ (1)
(1) ऐ मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम! मक्कए मुकर्रमा के काफ़िरों से.

पुकारो उन्हें जिन्हें अल्लाह के सिवा(2)
(2) अपना मअबूद.

समझे बैठे हो(3)
(3) कि वो तुम्हारी मुसीबतें दूर करें लेकिन ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि नफ़ा और नुक़सान में.

और वो ज़र्रा भर के मालिक नहीं आसमानों में और न ज़मीन में और न उनका इन दोनों में कुछ हिस्सा और न अल्लाह का उनमें से कोई मददगार {22} और उसके पास शफ़ाअत काम नहीं देती मगर जिसके लिये वह इ़ज्न (आज्ञा) फ़रमाए, यहाँ तक कि जब इज़्न देकर उनके दलों की घबराहट दूर फ़रमा दी जाती है एक दूसरे से (4)
(4) ख़ुशख़बरी के तौर पर

कहते हैं तुम्हारे रब ने क्या ही बात फ़रमाई, वो कहते हैं जो फ़रमाया हक़(सत्य) फ़रमाया (5){23}
(5) यानी शफ़ाअत करने वालों को ईमानदारों की शफ़ाअत की इजाज़त दी.

और वही है बलन्द बड़ाई वाला, तुम फ़रमाओ कौन जो तुम्हें रोज़ी देता है आसमानों और ज़मीन से(6)
(6) यानी आसमान से मेंह बरसा कर और ज़मीन से सब्ज़ा उगाकर.

तुम ख़ुद ही फ़रमाओ अल्लाह(7)
(7) क्योंकि इस सवाल का इसके सिवा और कोई जवाब ही नहीं.

और बेशक हम या तुम(8)
(8) यानी दोनों पक्षों में से हर एक के लिये इन दोनो हालों में से एक हाल ज़रूरी है.

या तो ज़रूर हिदायत पर हैं या खुली गुमराही में(9){24}
(9) और यह ज़ाहिर है कि वो शख़्स सिर्फ़ अल्लाह तआला को रोज़ी देने वाला, पानी बरसाने वाला, सब्ज़ा उगाने वाला जानते हुए भी बुतों को पूजे जो किसी एक कण भर चीज़ के मालिक नहीं (जैसा कि ऊपर की आयतों में बयान हो चुका), वो यक़ीनन खुली गुमराही में है.

तुम फ़रमाओ हमने तुम्हारे गुमान में अगर कोई जुर्म किया तो उसकी तुमसे पूछ नहीं न तुम्हारे कौतुकों का हमसे सवाल(10){25}
(10) बल्कि हर शख़्स से उसके अमल का सवाल होगा और हर एक अपने अमल की जज़ा पाएगा.

तो फ़रमाओ हमारा रब हम सब को जमा करेगा(11)
(11) क़यामत के दिन.

फिर हम में सच्चा फ़ैसला फ़रमा देगा(12)
(12) तो सच्चाई वालों को जन्नत में और बातिल वालों को जहन्नम में दाख़िल करेगा.

और वही है बड़ा न्याव चुकाने वाला सब कुछ जानता {26} तुम फ़रमाओ मुझे दिखाओ तो वो शरीक जो तुमने उससे मिलाए हैं (13)
(13) यानी जिन बुतों को तुमने इबादत में शरीक किया है, मुझे दिखाओ तो किस क़ाबिल हैं. क्या वो कुछ पैदा करते हैं, रोज़ी देते हैं, और जब यह कुछ नहीं तो उनको ख़ुदा का शरीक बनाना और उनकी इबादत करना कैसी भरी ख़ता है, उससे बाज़ आओ.

हिश्त, बल्कि वही है अल्लाह इज़्ज़त वाला हिकमत (बोध) वाला {27} और ऐ मेहबूब हमने तुमको न भेजा मगर ऐसी रिसालत से जो तमाम आदमियों को घेरने वाली है(14)
(14) इस आयत से मालूम हुआ कि हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की रिसालत सार्वजनिक है, सारे इन्सान उसके घेरे में हैं, गोरे हों या काले, अरबी हों या अजमी, पहले हों या पिछले, सब के लिये आप रसूल हैं और वो सब आपके उम्मती. बुख़ारी और मुस्लिम की हदीस में है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम फ़रमाते हैं मुझे पाँच चीज़ें ऐसी अता फ़रमाई गई जो मुझसे पहले किसी नबी को न दी गई – एक माह की दुरी के रोअब से मेरी मदद की गई, तमाम ज़मीन मेरे लिय मस्जिद और पाक की गई कि जहाँ मेरे उम्मती को नमाज़ का वक़्त हो नमाज़ पढ़े और मेरे लिये ग़नीमतें हलाल की गईं जो मुझ से पहले किसी के लिये हलाल न थीं और मुझे शफ़ाअत का दर्जा अता किया गया. दूसरे नबी ख़ास अपनी क़ौम की तरफ़ भेजे जाते थे और मैं तमाम इन्सानों की सार्वजनिक रिसालत है जो तमाम जिन्न और इन्सानों को शामिल है. ख़ुलासा यह कि हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम तमाम सृष्टि के रसूल हैं और यह दर्जा ख़ास आपका है जो क़ुरआने करीम की आयतों और बहुत सी हदीसों से साबित है. सूरए फ़ुरक़ान के शुरू में भी इसका बयान गुज़र चुका है. (ख़ाज़िन)

ख़ुशख़बरी देता(15)
(15) ईमान वालों को अल्लाह तआला के फ़ज़्ल की.

और डर सुनाता(16)
(16) काफ़िरों को उसके इन्साफ़ का.

लेकिन बहुत लोग नहीं जानते(17){28}
(17) और अपनी जिहालत की वजह से आपकी मुख़ालिफ़त करते हैं.

और कहते हैं ये वादा कब आएगा (18)
(18) यानी क़यामत का वादा.

अगर तुम सच्चे हो {29} तुम फ़रमाओ तुम्हारे लिये एक ऐसे दिन का वादा जिससे तुम न एक घड़ी पीछे हट सको और न आगे बढ़ सको(19) {30}
(19) यानी अगर तुम मोहलत चाहो तो ताख़ीर संभव नहीं और अगर जल्दी चाहो तो पहल मुमकिन नहीं, हर हाल में इस वादे का अपने वक़्त पर पूरा होना.

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