34 सूरए सबा- छटा रूकू

34  सूरए सबा- छटा रूकू

۞ قُلْ إِنَّمَا أَعِظُكُم بِوَاحِدَةٍ ۖ أَن تَقُومُوا لِلَّهِ مَثْنَىٰ وَفُرَادَىٰ ثُمَّ تَتَفَكَّرُوا ۚ مَا بِصَاحِبِكُم مِّن جِنَّةٍ ۚ إِنْ هُوَ إِلَّا نَذِيرٌ لَّكُم بَيْنَ يَدَيْ عَذَابٍ شَدِيدٍ
قُلْ مَا سَأَلْتُكُم مِّنْ أَجْرٍ فَهُوَ لَكُمْ ۖ إِنْ أَجْرِيَ إِلَّا عَلَى اللَّهِ ۖ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ شَهِيدٌ
قُلْ إِنَّ رَبِّي يَقْذِفُ بِالْحَقِّ عَلَّامُ الْغُيُوبِ
قُلْ جَاءَ الْحَقُّ وَمَا يُبْدِئُ الْبَاطِلُ وَمَا يُعِيدُ
قُلْ إِن ضَلَلْتُ فَإِنَّمَا أَضِلُّ عَلَىٰ نَفْسِي ۖ وَإِنِ اهْتَدَيْتُ فَبِمَا يُوحِي إِلَيَّ رَبِّي ۚ إِنَّهُ سَمِيعٌ قَرِيبٌ
وَلَوْ تَرَىٰ إِذْ فَزِعُوا فَلَا فَوْتَ وَأُخِذُوا مِن مَّكَانٍ قَرِيبٍ
وَقَالُوا آمَنَّا بِهِ وَأَنَّىٰ لَهُمُ التَّنَاوُشُ مِن مَّكَانٍ بَعِيدٍ
وَقَدْ كَفَرُوا بِهِ مِن قَبْلُ ۖ وَيَقْذِفُونَ بِالْغَيْبِ مِن مَّكَانٍ بَعِيدٍ
وَحِيلَ بَيْنَهُمْ وَبَيْنَ مَا يَشْتَهُونَ كَمَا فُعِلَ بِأَشْيَاعِهِم مِّن قَبْلُ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا فِي شَكٍّ مُّرِيبٍ

तुम फ़रमाओ मैं तुम्हें एक नसीहत करता हूँ (1)
(1) अगर तुमने उस पर अमल किया तो तुम पर सच्चाई खुल जाएगी और तुम वसवसों, शुबह और गुमराही की मुसीबत से निजात पाओगे. वह नसीहत ये है—

कि अल्लाह के लिये खड़े रहो(2)
(2) केवल सत्य की तलब की नियत से, अपने आपको तरफ़दारी और तअस्सुब से ख़ाली करके.

दो दो(3)
(3) ताकि आपस में सलाह कर सको और हर एक दूसरे से अपनी फ़िक्र का नतीज़ा बयान कर सके और दोनों इन्साफ़ के साथ ग़ौर कर सकें.

और अकेले अकेले(4)
(4) ताकि भीड़ से तबीअत न घबराए और तअस्सुब और तरफ़दारी और मुक़ाबला और लिहाज़ वग़ैरह से तबीअतें पाक रहे और अपने दिल में इन्साफ़ करने का मौक़ा मिले.

फिर सोचो(5)
(5) और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की निस्बत ग़ौर करो कि क्या जैसा कि काफ़िर आपकी तरफ़ जुनून की निस्बत करते हैं उसमें सच्चाई का कुछ भाग भी है. तुम्हारे अपने अनुभव में क़ुरैश में या मानव जाति में कोई व्यक्ति भी इस दर्जे का अक़्ल वाला नज़र आया है, क्या ऐसा ज़हीन, ऐसा सही राय वाला देखा है, ऐसा सच्चा, ऐसा पाक अन्त:करण वाला कोई और पाया है. जब तुम्हारा नफ़्स हुक्म कर दे और तुम्हारा ज़मीर मान ले कि हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम इन गुणों में यकता हैं तो तुम यक़ीन जानो.

कि तुम्हारे इन साहब में जिन्नों की कोई बात नहीं, वही तो नहीं मगर तुम्हें डर सुनाने वाले(6)
(6) अल्लाह तआला के नबी.

एक सख़्त अज़ाब के आगे(7){46}
(7) और वह आख़िरत का अज़ाब है.

तुम फ़रमाओ मैं ने तुमसे इस पर कुछ अज्र मांगा तो वह तुम्हीं को(8)
(8) यानी मैं नसीहत और हिदायत और रिसालत की तबलीग़ पर तुम से कोई उजरत नहीं तलब करता.

मेरा अज्र तो अल्लाह ही पर है, और वह हर चीज़ पर गवाह है {47} तुम फ़रमाओ बेशक मेरा रब हक़ (सत्य) का इल्क़ा फ़रमाता है(9)
(9) अपने नबियों की तरफ़.

बहुत जानने वाला सब ग़ैबों (अज्ञात) का {48} तुम फ़रमाओ हक़ (सत्य) आया(10)
(10) यानी क़ुरआन और इस्लाम.

और बातिल (असत्य) न पहल करे और न फिर कर आए(11) {49}
(11) यानी शिर्क और कुफ़्र मिट गया. उसकी शुरूआत रही न उसका पलट कर आना. मुराद यह है कि वह हलाक हो गया.

तुम फ़रमाओ अगर में बहका तो अपने ही बुरे को बहका(12)
(12) मक्के के काफ़िर हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कहते थे कि आप गुमराह हो गए. अल्लाह तआला ने अपने नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को हुक्म दिया कि आप उनसे फ़रमा दे कि अगर यह मान लिया जाए कि मैं बहका तो इसका वबाल मेरे नफ़्स पर है.

और अगर मैं ने राह पाई तो उसके कारण जो मेरा रब मेरी तरफ़ वही (देववाणी) फ़रमाता है(13)
(13) हिकमत और बयान की क्योंकि राह पाना उसकी तौफ़ीक़ और हिदायत पर है. नबी सब मअसूम होते हैं. गुनाह उनसे हो ही नहीं सकता और हुज़ूर तो नबियों के सरदार हैं. सृष्टि को नेकियों की राहें आपके अनुकरण से मिलती हैं. बुज़ुर्गी और ऊंचे दर्जे के बावुजूद आपको हुक्म दिया गया कि गुमराही की निस्बत सिर्फ़ मान लेने की हद तक अपो नफ़्स की तरफ़ फ़रमाएं ताकि ख़ल्क़ को मालूम हो कि गुमराही का मन्शा इन्सान का नफ़्स है जब उसको उसपर छोड़ दिया जाता है, उससे गुमराही पैदा होती है और हिदायत अल्लाह तआला की रेहमत और मेहरबानी और उसी के दिये से हासिल होती है, नफ़्स उसका मन्शा नहीं.

बेशक वह सुनने वाला नज़्दीक़ है(14) {50}
(14) हर राह पाए हुए और गुमराह को जानता है और उनके कर्मों और चरित्र से बाख़बर है. कोई कितना ही छुपाए किसी का हाल उससे छुप नहीं सकता. अरब के एक बड़े मशहूर शायर इस्लाम लाए तो काफ़िरों ने उनसे कहा कि तुम अपने दीन से फिर गए और इतने बड़े शायर और ज़बान वाले होकर मुहम्मद पर ईमान लाए. उन्होंने कहा हाँ, वह मुझ पर ग़ालिब आ गए. क़ुरआने करीम की तीन आयतें मैंने सुनीं और चाहा कि उनके काफ़िये पर तीन शेअर कहूँ बहुत मेहनत की, जान लड़ाई, अपनी सारी शक्ति लगा दी मगर यह संभव न हो सका. तब मुझे यक़ीन हो गया कि यह इन्सान का कलाम नहीं, वो आयतें इसी सूरत की 48वीं, 49वीं, और 50वीं आयतें हैं (रूहुल बयान)

और किसी तरह तू देखे (15)
(15) काफ़िरों को, मरने या क़ब्र से उठने के वक़्त या बद्र के दिन.

जब वो घबराहट में डाले जाएंगे फिर बचकर न निकल सकेंगे(16)
(16) और कोई जगह भागने और पनाह लेने की न पा सकेंगे.

और एक क़रीब जगह से पकड़ लिये जाएंगे (17){51}
(17) जहाँ भी होंगे  क्योंकि कहीं भी हों, अल्लाह तआला की पकड़ से दूर नहीं हो सकते. उस वक़्त हक़ की पहचान के लिये बेचैन होंगे.

और कहेंगे हम उसपर ईमान लाए (18)
(18) यानी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर.

और अब वो उसे कैसे पाएं इतनी दूर जगह से (19) {52}
(19) यानी जब मुकल्लफ़ होने के महल से दूर होकर तौबह और ईमान कैसे पा सकेंगे.

कि पहले (20)
(20) यानी अज़ाब देखने से पहले

तो उससे कुफ़्र कर चुके थे, और बे देखे फैंक मारते हैं(21)
(21) यानी बे जाने कह गुज़रते हैं जैसा कि उन्हों ने रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की शान में कहा था कि वह शायर हैं, जादूगर हैं, तांत्रिक हैं और उन्होंने कभी हुज़ूर से शेअर, व जादू व तंत्र विद्या का होना न देखा था.

दूर मकान से(22){53}
(22) यानी सच्चाई से दूर कि उन तअनों को सच्चाई से ज़रा भी नज़्दीक़ी नहीं.

और रोक कर दी गई उनमें और उसमें और उसमें जिसे चाहते हैं(23)
(23)  यानी तौबह और ईमान में.

जैसे उनके पहले गिरोहों से किया गया था(24)
(24)कि उनकी तौबह और ईमान यास के वक़्त क़ुबूल न फ़रमाई गई.

बेशक वो धोका डालने वाले शक में थे(25){54}
(25) ईमानियत के मुतअल्लिक़.

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: