34 सूरए सबा- चौथा रूकू

34  सूरए सबा- चौथा रूकू

وَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا لَن نُّؤْمِنَ بِهَٰذَا الْقُرْآنِ وَلَا بِالَّذِي بَيْنَ يَدَيْهِ ۗ وَلَوْ تَرَىٰ إِذِ الظَّالِمُونَ مَوْقُوفُونَ عِندَ رَبِّهِمْ يَرْجِعُ بَعْضُهُمْ إِلَىٰ بَعْضٍ الْقَوْلَ يَقُولُ الَّذِينَ اسْتُضْعِفُوا لِلَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا لَوْلَا أَنتُمْ لَكُنَّا مُؤْمِنِينَ
قَالَ الَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا لِلَّذِينَ اسْتُضْعِفُوا أَنَحْنُ صَدَدْنَاكُمْ عَنِ الْهُدَىٰ بَعْدَ إِذْ جَاءَكُم ۖ بَلْ كُنتُم مُّجْرِمِينَ
وَقَالَ الَّذِينَ اسْتُضْعِفُوا لِلَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا بَلْ مَكْرُ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ إِذْ تَأْمُرُونَنَا أَن نَّكْفُرَ بِاللَّهِ وَنَجْعَلَ لَهُ أَندَادًا ۚ وَأَسَرُّوا النَّدَامَةَ لَمَّا رَأَوُا الْعَذَابَ وَجَعَلْنَا الْأَغْلَالَ فِي أَعْنَاقِ الَّذِينَ كَفَرُوا ۚ هَلْ يُجْزَوْنَ إِلَّا مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
وَمَا أَرْسَلْنَا فِي قَرْيَةٍ مِّن نَّذِيرٍ إِلَّا قَالَ مُتْرَفُوهَا إِنَّا بِمَا أُرْسِلْتُم بِهِ كَافِرُونَ
وَقَالُوا نَحْنُ أَكْثَرُ أَمْوَالًا وَأَوْلَادًا وَمَا نَحْنُ بِمُعَذَّبِينَ
قُلْ إِنَّ رَبِّي يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَن يَشَاءُ وَيَقْدِرُ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ

और काफ़िर बोले हम हरगिज़ न ईमान लाएंगे इस क़ुरआन पर और उन किताबों पर जो इससे आगे थीं(1)
(1) तौरात और इंजील वग़ैरह.

और किसी तरह तू देखें जब ज़ालिम अपने रब के पास खड़े किये जाएंगे, जो उनमें एक दूसरे पर बात डालेगा वो जो दबे थे(2)
(2) यानी ताबे और अनुयायी थे.

उनसे कहेंगे जो ऊंचे खिंचते थे(3)
(3) यानी अपने सरदारों से.

अगर तुम न होते(4)
(4) और हमें ईमान लाने से न रोकते.

तो हम ज़रूर ईमान ले आते {31} वो जो ऊंचे खिंचते थे उनसे कहेंगे जो दबे हुए थे क्या हम ने तुम्हें रोक दिया हिदायत से बाद इसके कि तुम्हारे पास आई बल्कि तुम ख़ुद मुजरिम थे {32} और कहेंगे वो जो दबे हुए थे उनसे जो ऊंचे खिंचते थे बल्कि रात दिन का दाँव था (5)
(5) यानी तुम रात दिन हमारे लिये छलकपट करते थे और हमें हर वक़्त शिर्क पर उभारते थे.

जब कि तुम हमें हुक्म देते थे कि अल्लाह का इन्कार करें और उसके बराबर वाले ठहराएं, और दिल ही दिल में पछताने लगे(6)
(6) दोनों पक्ष, ताबे भी और मतबूअ भी और उनके बहकाने वाले भी ईमान न लाने पर.

जब अज़ाब देखा(7)
(7) जहन्नम का.

और हमने तौक़ डाले उनकी गर्दनों में जो इन्कारी थे(8)
(8) चाहे बहकाने वाले हों या उनके कहने में आने वाले, तमाम काफ़िरों की यही सज़ा है.

वो क्या बदला पाएंगे मगर वही जो कुछ करते थे(9){33}
(9) दुनिया में कुफ़्र और गुमराही.

और हमने जब कभी किसी शहर में कोई डर सुनाने वाला भेजा वहाँ के आसूदों ने यही कहा कि तुम जो लेकर भेजे गए हम उसके इन्कारी हैं(10){34}
(10) इसमें सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तसल्ली फ़रमाई गई कि आप उन काफ़िरों के झुटलाने और इन्कार से दुखी न हों. काफ़िरों का नबियों के साथ यही तरीक़ा रहा है और मालदार लोग इसी तरह अपने माल व औलाद के घमण्ड में नबियों को झुटलाते रहे हैं. दो व्यक्ति तिजारत में शरीक थे. उनमें से एक शाम प्रदेश को गया और एक मक्कए मुकर्रमा में रह, जब नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम तशरीफ़ लाए और उसने शाम प्रदेश में हुज़ूर की ख़बर सुनी तो अपने शरीक को ख़त लिखा और उससे हुज़ूर का पूरा हाल पूछा. उस शरीक ने जवाब लिखा कि मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने अपनी नबुव्वत का ऐलान तो किया है लेकिन सिवाय छोटे दर्जे के हक़ीर और ग़रीब लोगों के और किसी ने उनका अनुकरण नहीं किया. जब यह ख़त उसके पास पहुंचा तो वह अपने तिजारती काम छोड़कर मक्कए मुकर्रमा आया और आते ही अपने शरीक से कहा कि मुझे सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का पता बताओ और मालूम करके हुज़ूर की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और अर्ज़ किया कि आप दुनिया को क्या दावत देते हैं और हम से क्या चाहते हैं. फ़रमाया बुत परस्ती छोड़कर एक अल्लाह तआला की इबादत करना और आपने इस्लाम के आदेश बताए, ये बातें उसके दिल में असर कर गईं और वह शख़्स पिछली किताबों का आलिम था कहने लगा कि मैं गवाही देता हूँ कि आप बेशक अल्लाह तआला के रसूल हैं. हुज़ूर ने फ़रमाया तुम ने यह कैसे जाना उसने कहा कि जब कभी कोई नबी भेजा गया, पहले छोटे दर्जे के ग़रीब लोग ही उसके ताबे हुए यह अल्लाह की सुन्नत हमेशा ही जारी रही. इसपर यह आयत उतरी.

और बोले हम माल और औलाद में बढ़ कर हैं और हम पर अज़ाब होना नहीं(11) {35}
(11) यानी जब दुनिया में हम ख़ुशहाल हैं तो हमारे अअमाल और अफ़आल अल्लाह तआला को पसन्द होंगे और ऐसा हुआ तो आख़िरत में अज़ाब नहीं होगा. अल्लाह तआला ने उनके इस बातिल ख़याल का रद फ़रमाया कि आख़िरत के सवाब को दुनिया की मईशत पर क़यास करना ग़लत है.

तुम फ़रमाओ बेशक मेरा रब रिज़्क़ वसीअ करता है जिसके लिये चाहे और तंगी फ़रमाता है (12)
(12) आज़माइश और परीक्षा के तौर पर, तो दुनिया में रोज़ी की कुशायश अल्लाह की रज़ा की दलील नहीं और ऐसे ही उसकी तंगी अल्लाह तआला की नाराज़ी की दलील नहीं. कभी गुनाहगार पर वुसअत करता है, कभी फ़रमाँबरदार पर तंगी, यह उसकी हिकमत है. आख़िरत के सवाब को इसपर क़यास करना ग़लत और बेजा है.
लेकिन बहुत लोग नहीं जानते {36}

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