33 सूरए अहज़ाब- चौथा रूकू

33  सूरए अहज़ाब- चौथा रूकू

ا أَيُّهَا النَّبِيُّ قُل لِّأَزْوَاجِكَ إِن كُنتُنَّ تُرِدْنَ الْحَيَاةَ الدُّنْيَا وَزِينَتَهَا فَتَعَالَيْنَ أُمَتِّعْكُنَّ وَأُسَرِّحْكُنَّ سَرَاحًا جَمِيلًا
وَإِن كُنتُنَّ تُرِدْنَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَالدَّارَ الْآخِرَةَ فَإِنَّ اللَّهَ أَعَدَّ لِلْمُحْسِنَاتِ مِنكُنَّ أَجْرًا عَظِيمًا
يَا نِسَاءَ النَّبِيِّ مَن يَأْتِ مِنكُنَّ بِفَاحِشَةٍ مُّبَيِّنَةٍ يُضَاعَفْ لَهَا الْعَذَابُ ضِعْفَيْنِ ۚ وَكَانَ ذَٰلِكَ عَلَى اللَّهِ يَسِيرًا
۞ وَمَن يَقْنُتْ مِنكُنَّ لِلَّهِ وَرَسُولِهِ وَتَعْمَلْ صَالِحًا نُّؤْتِهَا أَجْرَهَا مَرَّتَيْنِ وَأَعْتَدْنَا لَهَا رِزْقًا كَرِيمًا
يَا نِسَاءَ النَّبِيِّ لَسْتُنَّ كَأَحَدٍ مِّنَ النِّسَاءِ ۚ إِنِ اتَّقَيْتُنَّ فَلَا تَخْضَعْنَ بِالْقَوْلِ فَيَطْمَعَ الَّذِي فِي قَلْبِهِ مَرَضٌ وَقُلْنَ قَوْلًا مَّعْرُوفًا
وَقَرْنَ فِي بُيُوتِكُنَّ وَلَا تَبَرَّجْنَ تَبَرُّجَ الْجَاهِلِيَّةِ الْأُولَىٰ ۖ وَأَقِمْنَ الصَّلَاةَ وَآتِينَ الزَّكَاةَ وَأَطِعْنَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ ۚ إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيُذْهِبَ عَنكُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا
وَاذْكُرْنَ مَا يُتْلَىٰ فِي بُيُوتِكُنَّ مِنْ آيَاتِ اللَّهِ وَالْحِكْمَةِ ۚ إِنَّ اللَّهَ كَانَ لَطِيفًا خَبِيرًا

ऐ ग़ैब बताने वाले (नबी) अपनी बीबियों से फ़रमा दो अगर तुम दुनिया की ज़िन्दगी और इसकी आरायश चाहती हो(1)
(1) यानी अगर तुम्हें बहुत सारा माल और ऐश के साधन दरकार हैं. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की पाक बीबियों ने आपसे दुनियावी सामान तलब किये और गुज़ारे के ख़र्च को बढ़ाने की दरख़्वास्त की. यहाँ तो पाकीज़गी अपनी चरम सीमा पर थी और दुनिया का सामान जमा करना गवारा ही न था इस लिये यह तलब सरकार के दिल पर बोझ हुई. और तब यह आयत उतरी और हुज़ूर  की मुक़द्दस बीबियों को समझाया गया. उस वक़्त हुज़ूर की नौ बीबियाँ थीं. पाँच क़ुरैश से, हज़रत आयशा बिन्ते अबी बक्र सिद्दीक़ रदियल्लाहो अन्हो, हज़रत हफ़सा बिन्ते उमरे फ़ारूक़, उम्मे हबीबह बिन्ते अबू सुफ़ियान, उम्मे सलमा बिन्ते अबी उमैया, सौदह बिन्ते ज़म्अह और चार बीबियाँ ग़ैर क़ुरैश, ज़ैनब बिन्ते जहश असदियह, मेमूनह बिन्ते हारिस हिलालियह, सफ़ियह बिन्ते हयई बिन अख़्तब खै़बरियह, जवैरियह बिन्हे हारिस मुस्तलिक़ियह (सबसे अल्लाह तआला राज़ी). सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने सबसे सलाह करके आयशा रदियल्लाहो अन्हा को यह आयत सुनाकर इख़्तियार दिया और फ़रमाया कि जल्दी न करो अपने माँ बाप से से सलाह करके जो राय हो उस पर अमल करो. उन्होंने अर्ज़ किया, हुज़ूर के मामले में सलाह कैसी, मैं अल्लाह को और उसके रसूल को और आख़िरत को चाहती हूँ, और बाक़ी बीबियों ने भी यही जवाब दिया. जिस औरत को इख़्तियार दिया जाए वह अगर अपने शौहर को इख़्तियार करे तो तलाक़ वाक़े नहीं होती और अगर अपने नफ़्स को इख़्तियार करे तो हमारे नज़दीक तलाक़े बाइन वाक़े हो जाती है.

तो आओ मैं तुम्हें माल दूँ (2)
(2) जिस औरत के साथ निकाह के बाद सोहबत हुई हो उसको तलाक़ दी जाए तो कुछ सामान देना मुस्तहब है और वह सामान तीन कपड़ों का जोड़ा होता है. यहाँ माल से वही मुराद है. जिस औरत का मेहर निर्धारित न किया गया हो उसको सोहबत से पहले तलाक़ दी तो यह जोड़ा देना वाजिब है.

और अच्छी तरह छोड़ दूं(3) {28}
(3) बग़ैर किसी नुक़सान के.

और अगर तुम अल्लाह और उसके रसूल और आख़िरत का घर चाहती हो तो बेशक अल्लाह ने तुम्हारी नेकी वालियों के लिये बड़ा अज्र तैयार कर रखा है {29} ऐ नबी की बीबियों जो तुममें खुली शर्म के ख़िलाफ़ कोई जुरअत करे (4)
(4) जैसे कि शौहर की फ़रमाँबरदारी में कमी करना और उसके साथ दुर्व्यवहार करना, क्योंकि बदकारी से अल्लाह तआला नबियों की बीबियों को पाक रखता है.

उसपर औरों से दूना अज़ाब होगा (5)और यह अल्लाह को आसान है {30}
(5) क्योंकि जिस शख़्स की फ़ज़ीलत ज़्यादा होती है उससे अगर क़ुसूर वाक़े हो तो वह क़ुसूर भी दूसरों के क़ुसूर से ज़्यादा सख़्त क़रार दिया जाता है. इसीलिये आलिम का गुनाह जाहिल के गुनाह से ज़्यादा बुरा होता है और इसी लिये आज़ादों की सज़ा शरीअत में ग़ुलामों से ज़्यादा मुक़र्रर है. और नबी अलैहिस्सलातो वस्सलाम की बीबियाँ सारे जगत की औरतों से ज़्यादा बुज़ुर्गी रखती हैं इसलिये उनकी थोड़ी सी बात सख़्त पकड़ के क़ाबिल है. “फ़ाहिशा” यानी हया के ख़िलाफ़ खुली जुरअत का शब्द जब मअरिफ़ह होकर आए तो उससे ज़िना और लिवातत मुराद होती है और अगर नकरह ग़ैर मौसूफ़ह होकर लाया जाए तो उससे सारे गुनाह मुराद होते हैं और जब मौसूफ़ होकर आए तो उससे शौहर की नाफ़रमानी और उससे लड़ना झगड़ना मुराद होता है. इस आयत में नकरह मौसूफ़ह है इसीलिये इससे शौहर की इताअत में कमी और उससे दुर्व्यवहार मुराद है जैसा कि हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से नक़्ल किया गया है. (जुमल वगै़रह)

पारा इक्कीस समाप्त

बाईसवाँ पारा – व मैंय-यक़नुत
(सूरए अहज़ाब जारी)

और(6)
(6) ऐ नबी अलैहिस्सलातो वस्सलाम की बीबियो.

जो तुम में फ़रमाँबरदार रहे अल्लाह और रसूल की और अच्छा काम करे हम उसे औरों से दूना सवाब देंगे(7)
(7) यानी अगर औरों को एक नेकी पर दस गुना सवाब देंगे तो तुम्हें बीस गुना, क्योंकि सारे जगत की औरतों में तुम्हें अधिक सम्मान और बुज़ुर्गी हासिल है और तुम्हारे अमल में भी दो क़िस्में हैं एक इताअत की अदा, दूसरे रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को राज़ी रखने की कोशिश और क़नाअत और अच्छे व्यवहार के साथ हुज़ूर को ख़ुश करना.

और हमने उसके लिये इज़्ज़त की रोज़ी तैयार कर रखी है (8){31}
(8) जन्नत में.

ऐ नबी की बीबियों तुम और औरतों की तरह नहीं हो(9)
(9) तुम्हारा दर्जा सबसे ज़्यादा है और तुम्हारा इनाम सबसे बढ़कर. जगत की औरतों में कोई तुम्हारे बराबर की नहीं.

अगर अल्लाह से डरो तो बात में ऐसी नर्मी न करो कि दिल का रोगी कुछ लालच करे(10)
(10) इसमें अदब की तालीम है कि अगर ज़रूरत के हिसाब से किसी ग़ैर मर्द से पर्दे के पीछे से बात करनी पड़े तो कोशिश करो कि लहजे में नज़ाकत न आने पाए और बात में लोच न हो. बात बहुत ही सादगी से की जाए. इज़्ज़त वाली महिलाओ के लिये यही शान की बात है.

हाँ अच्छी बात कहो(11) {32}
(11) दीन और इस्लाम की और नेकी की तालीम और नसीहत व उपदेश की, अगर ज़रूरत पेश आए, मगर बेलोच लहजे से.

और अपने घरों में ठहरी रहो और बेपर्दा न रहो जैसे अगली जाहिलियत की बेपर्दगी(12)
(12) अगली जिहालत से मुराद इस्लाम से पहले का ज़माना है. उस ज़माने में औरतें इतराती हुई निकलती थीं, अपनी सजधज और श्रंगार का इज़हार करती थीं कि अजनबी मर्द देखें, लिबास ऐसे पहनती थीं जिनसे बदन के अंग अच्छी तरह न छुपें और पिछली जिहालत से आख़िरी ज़माना मुराद है जिसमें लोगों के कर्म पहलों की तरह हो जाएंगे.

और नमाज़ क़ायम रखो और ज़कात दो और अल्लाह और रसूल का हुक्म मानो, अल्लाह तो यही चाहता है ऐ नबी के घर वालों कि तुम से हर नापाकी दूर फ़रमा दे और तुम्हें पाक करके ख़ूब सुथरा कर दे(13){33}
(13) यानी गुनाहों की गन्दगी से तुम प्रदूषित न हो. इस आयत से एहले बैत की फ़ज़ीलत साबित होती है.  और एहले बैत में नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्ल्म की बीबियाँ और हज़रत ख़ातूने जन्नत बीबी फ़ातिमा ज़हरा और अली मुर्तज़ा और हसनैन करीमैन (यानी सैयदना इमाम हसन और सैयदना इमाम हुसैन) रदियल्लाहो अन्हुम सब दाख़िल हैं. आयतों और हदीसों को जमा करने से यही नतीजा निकलता है और यही हज़रत इमाम अबू मन्सूर मातुरीदी रहमतुल्लाह अलैह से नक़्ल किया गया है. इन आयतों में एहले बैते रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को नसीहत फ़रमाई गई है ताकि वो गुनाहों से बचें और तक़वा और परहेज़गारी के पाबन्द रहें. गुनाहों को नापाकी से और परहेज़गारी को पाकी से उपमा दी गई क्योंकि गुनाह करने वाला उनसे ऐसा ही सना होता है जैसा शरीर गन्दगी से. इस अन्दाज़े कलाम से मक़सद यह है कि समझ वालों को गुनाहों से नफ़रत दिलाई जाए और तक़वा व परहेज़गारी की तरग़ीब दी जाए.

और याद करो जो तुम्हारे घरों में पढ़ी जाती हैं अल्लाह की आयतें और हिकमत(14) बेशक अल्लाह हर बारीकी जानता ख़बरदार है {34}
(14) यानी सुन्नत.

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: