32 सूरए सज्दा – दूसरा रूकू

32  सूरए सज्दा – दूसरा रूकू

وَلَوْ تَرَىٰ إِذِ الْمُجْرِمُونَ نَاكِسُو رُءُوسِهِمْ عِندَ رَبِّهِمْ رَبَّنَا أَبْصَرْنَا وَسَمِعْنَا فَارْجِعْنَا نَعْمَلْ صَالِحًا إِنَّا مُوقِنُونَ
وَلَوْ شِئْنَا لَآتَيْنَا كُلَّ نَفْسٍ هُدَاهَا وَلَٰكِنْ حَقَّ الْقَوْلُ مِنِّي لَأَمْلَأَنَّ جَهَنَّمَ مِنَ الْجِنَّةِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ
فَذُوقُوا بِمَا نَسِيتُمْ لِقَاءَ يَوْمِكُمْ هَٰذَا إِنَّا نَسِينَاكُمْ ۖ وَذُوقُوا عَذَابَ الْخُلْدِ بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
إِنَّمَا يُؤْمِنُ بِآيَاتِنَا الَّذِينَ إِذَا ذُكِّرُوا بِهَا خَرُّوا سُجَّدًا وَسَبَّحُوا بِحَمْدِ رَبِّهِمْ وَهُمْ لَا يَسْتَكْبِرُونَ ۩
تَتَجَافَىٰ جُنُوبُهُمْ عَنِ الْمَضَاجِعِ يَدْعُونَ رَبَّهُمْ خَوْفًا وَطَمَعًا وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنفِقُونَ
فَلَا تَعْلَمُ نَفْسٌ مَّا أُخْفِيَ لَهُم مِّن قُرَّةِ أَعْيُنٍ جَزَاءً بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
أَفَمَن كَانَ مُؤْمِنًا كَمَن كَانَ فَاسِقًا ۚ لَّا يَسْتَوُونَ
أَمَّا الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ فَلَهُمْ جَنَّاتُ الْمَأْوَىٰ نُزُلًا بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
وَأَمَّا الَّذِينَ فَسَقُوا فَمَأْوَاهُمُ النَّارُ ۖ كُلَّمَا أَرَادُوا أَن يَخْرُجُوا مِنْهَا أُعِيدُوا فِيهَا وَقِيلَ لَهُمْ ذُوقُوا عَذَابَ النَّارِ الَّذِي كُنتُم بِهِ تُكَذِّبُونَ
وَلَنُذِيقَنَّهُم مِّنَ الْعَذَابِ الْأَدْنَىٰ دُونَ الْعَذَابِ الْأَكْبَرِ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ
وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّن ذُكِّرَ بِآيَاتِ رَبِّهِ ثُمَّ أَعْرَضَ عَنْهَا ۚ إِنَّا مِنَ الْمُجْرِمِينَ مُنتَقِمُونَ

और कहीं तुम देखो जब मुजरिम(1)
(1) यानी काफ़िर और मुश्रिक लोग.

अपने रब के पास सर नीचे डाले होंगे(2)
(2) अपने कर्मों और व्यवहार से शर्मिन्दा और लज्जित होकर, और अर्ज़ करते होंगे.

ऐ हमारे रब अब हमने देखा(3)
(3) मरने के बाद उठने को, और तेरे वादे की सच्चाई को, जिनके हम दुनिया में इन्कारी थे.

और सुना (4)
(4) तुझ से तेरे रसूलों की सच्चाई को, तो अब दुनिया में.

हमें फिर भेज कि नेक काम करें हमको यक़ीन आ गया (5){12}
(5) और अब हम ईमान ले आए, लेकिन उस वक़्त का ईमान लाना उन्हें कुछ काम न देगा.

और अगर हम चाहते हर जान को उसकी हिदायत फ़रमाते(6)
(6) और उस पर ऐसी मेहरबानी करते कि अगर वह उसके इख़्तियार करता तो राह पा जाता. लेकिन हमने ऐसा न किया क्योंकि हम काफ़िरों को जानते थे कि वो कुफ़्र ही इख़्तियार करेंगे.

मगर मेरी बात क़रार पा चुकी कि ज़रूर जहन्नम को भरदूंगा उन जिन्नों और आदमियों सब से(7){13}
(7) जिन्होंने कुफ़्र इख़्तियार किया, और जब वो जहन्नम में दाख़िल होंगे तो जहन्नम के ख़ाज़िन उनसे कहेंगे.

अब चखो बदला उसका कि तुम अपने इस दिन की हाज़िरी भूले थे(8)
(8) और दुनिया में ईमान लाए थे.

हमने तुम्हें छोड़ दिया (9)
(9) अज़ाब में, अब तुम्हारी तरफ़ इल्तिफ़ात न होगा.

अब हमेशा का अज़ाब चखो अपने किये का बदला {14} हमारी आयतों पर वही ईमान लाते हैं कि जब वो उन्हें याद दिलाई जाती हैं सज्दे में गिर जाते हैं(10)
(10)  विनम्रता और आजिज़ी से और इस्लाम की नेअमत पर शुक्रगुज़ारी के लिये.

और अपने रब की तारीफ़ करते हुए उसकी पाकी बोलते हैं और घमण्ड नहीं करते {15} उनकी करवटें जुदा होती हैं ख़्वाबगाहों से(11)
(11) यानी मीठी नींदों के बिस्तरों से उठते हैं और अपनी राहत और आराम छोड़ते हैं.

और अपने रब को पुकारते हैं डरते और उम्मीद करते(12)
(12) यानी उसके अज़ाब से डरते हैं और उसकी रहमत की उम्मीद करते हैं. यह तहज्जुद अदा करने वालों की हालत का बयान है. हज़रत अनस रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि यह आयत हम अन्सारियों के हक़ में उतरी कि हम मग़रिब पढ़कर अपने घरों को वापस न आते थे जब तक कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ इशा न पढ़ लेते.

और हमारे दिये हुए में से कुछ ख़ैरात करते हैं {16} तो किसी जी को नहीं मालूम जो आँख की ठण्डक उनके लिये छुपा रखी है (13)
(13) जिससे वो राहतें पाएंगे और उनकी आँखे ठण्डी होंगी.

सिला उनके कामों का (14) {17}
(14) यानी उन ताअतों का, जो उन्होंने दुनिया में अदा कीं.

तो क्या जो ईमान वाला है वो उस जैसा हो जाएगा जो बेहुक्म है(15)
(15)यानी काफ़िर है. हज़रत अली मुर्तज़ा रदियल्लाहो अन्हो से वलीद बिन अक़बह बिन अबी मुईत किसी बात में झगड़ रहा था. बात चीत के दौरान कहने लगा, ख़ामोश हो जाओ, तुम लड़के हो मैं बूढ़ा हूँ. मैं बहुत लम्बी ज़बान वाला हूँ. मेरे भाले की नौक तुमसे तेज़ है. मैं तुम से ज़्यादा बहादुर हूँ .मैं बड़ा जत्थेदार हूँ. हज़रत अली ने फ़रमाया चुप, तू फ़ासिक़ है. मुराद यह थी कि जिन बातों पर तू गर्व करता है, इन्सान के लिये उनमें से कोई भी प्रशंसनीय नहीं. इन्सान की महानता और इज़्ज़त ईमान और तक़वा में है. जिसे यह दौलत नसीब नहीं वह हद दर्जे का नीच है. काफ़िर मूमिन के बराबर नहीं हो सकता. अल्लाह तआला ने हज़रत अली की तस्दीक़ में यह आयत उतारी.

ये बराबर नहीं {18} जो ईमान लाए और अच्छे काम किये उनके लिये बसने के बाग़ हैं, उनके कामों के सिले में मेहमानदारी (16) {19}
(16) यानी ईमान वाले नेक बन्दों की जन्नते-मावा में अत्यन्त सम्मान व सत्कार के साथ मेहमानदारी की जाएगी.

रहे वो जो बेहुक्म हैं(17)
(17) नाफ़रमान काफ़िर हैं.

उनका ठिकाना आग है, जब कभी उसमें से निकलना चाहेंगे फिर उसी में फेर दिये जाएंगे और उनसे फ़रमाया जाएगा चखो उस आग का अज़ाब जिसे तुम झुटलाते थे {20} और ज़रूर हम उन्हें चखाएंगे कुछ नज़दीक का अज़ाब (18)
(18) दुनिया ही मैं क़त्ल और गिरफ़्तारी और दुष्काल और बीमारियों वग़ैरह में जकड़ के. चुनान्चे ऐसा ही पेश आया कि हुज़ूर की हिजरत से पहले क़ुरैश बीमारियों और मुसीबतों में गिरफ़्तार हुए और हिजरत के बाद बद्र में मारे गए. गिरफ़्तार हुए और सात साल दुष्काल की ऐसी सख़्त मुसीबत में जकड़े रहे कि हड्डियाँ और मु्र्दार कुत्ते तक खा गए.

उस बड़े अज़ाब से पहले (19)
(19) यानी आख़िरत के अज़ाब से.

जिसे देखने वाला उम्मीद करे कि अभी बाज़ आएंगे {21} और उससे बढ़कर ज़ालिम कौन जिसे उसके रब की आयतों से नसीहत की गई फिर उसने उनसे मुंह फेर लिया (20)
(20) और आयतों में ग़ौर न किया और उनकी व्याख्याओं और इरशाद से फ़ायदा न उठाया और ईमान से लाभान्वित न हुआ.
बेशक हम मुजरिमों से बदला लेने वाले हैं {22}

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