32 सूरए सज्दा – तीसरा रूकू

32  सूरए सज्दा – तीसरा रूकू

وَلَقَدْ آتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ فَلَا تَكُن فِي مِرْيَةٍ مِّن لِّقَائِهِ ۖ وَجَعَلْنَاهُ هُدًى لِّبَنِي إِسْرَائِيلَ
وَجَعَلْنَا مِنْهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا لَمَّا صَبَرُوا ۖ وَكَانُوا بِآيَاتِنَا يُوقِنُونَ
إِنَّ رَبَّكَ هُوَ يَفْصِلُ بَيْنَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فِيمَا كَانُوا فِيهِ يَخْتَلِفُونَ
أَوَلَمْ يَهْدِ لَهُمْ كَمْ أَهْلَكْنَا مِن قَبْلِهِم مِّنَ الْقُرُونِ يَمْشُونَ فِي مَسَاكِنِهِمْ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ ۖ أَفَلَا يَسْمَعُونَ
أَوَلَمْ يَرَوْا أَنَّا نَسُوقُ الْمَاءَ إِلَى الْأَرْضِ الْجُرُزِ فَنُخْرِجُ بِهِ زَرْعًا تَأْكُلُ مِنْهُ أَنْعَامُهُمْ وَأَنفُسُهُمْ ۖ أَفَلَا يُبْصِرُونَ
وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَٰذَا الْفَتْحُ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
قُلْ يَوْمَ الْفَتْحِ لَا يَنفَعُ الَّذِينَ كَفَرُوا إِيمَانُهُمْ وَلَا هُمْ يُنظَرُونَ
فَأَعْرِضْ عَنْهُمْ وَانتَظِرْ إِنَّهُم مُّنتَظِرُونَ

और बेशक हमने मूसा को किताब (1)
(1) यानी तौरात.

अता फ़रमाई तो तुम उसके मिलने में शक न करो(2)
(2) यानी हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को किताब के मिलने में या ये मानी हैं कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के मिलने और उनसे मुलाक़ात होने में शक न करो. चुनान्चे मेअराज की रात हुज़ूरे अक़दस सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से मुलाक़ात हुई जैसा कि हदीसों में आया है.

और हमने उसे (3)
(3) यानी हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को, या तौरात को.

बनी इस्राईल के लिये हिदायत किया {23} और हमने उनमें से (4)
(4)  यानी बनी इस्राईल में से.

कुछ इमाम बनाए कि हमारे हुक्म से बताते (5)
(5) लोगों को ख़ुदा की फ़रमाँबरदारी और उसकी ताअत और अल्लाह तआला के दीन और उसकी शरीअत का अनुकरण, तौरात के आदेशों की पूर्ति. ये इमाम बनी इस्राईल के नबी थे, या नबियों के अनुयायी.

जब कि उन्हों ने सब्र किया(6)
(6) अपने दीन पर और दुश्मनों की तरफ़ से पहुंचने वाली मुसीबतों पर. इससे मालूम हुआ कि सब्र का फल इमामत और पेशवाई है.

और वो हमारी आयतों पर यक़ीन लाते थे {24} बेशक तुम्हारा रब उनमें फ़ैसला कर देगा(7)
(7) यानी नबियों में और उनकी उम्मतों में या मूमिनीन व मुश्रिकीन में.

क़यामत के दिन जिस बात में इख़्तिलाफ़ करते थे(8){25}
(8) दीनी बातों में से, और हक़ व बातिल वालों को अलग अलग कर देगा.

और क्या उन्हें (9)
(9) यानी मक्का वालों को.

इस पर हिदायत न हुई कि हमने उनसे पहले कितनी संगतें (क़ौमें)(10)
(10) कितनी उम्मतें आद व समूद व क़ौम लूत की तरह.

हलाक कर दीं कि आज ये उनके घरों में चल फिर रहे हैं(11)
(11) यानी जब मक्का वाले व्यापार के लिये शाम के सफ़र करते हैं तो उन लोगों की मन्ज़िलों और शहरों में गुज़रते हैं और उनकी हलाकत के निशान देखते हैं.

बेशक इसमें ज़रूर निशानियाँ हैं, तो क्या सुनते नहीं (12) {26}
(12)  जो इब्रत हासिल करें और नसीहत मानें.

और क्या नहीं देखते कि हम पानी भेजते हैं ख़ुश्क ज़मीन की तरफ़(13)
(13)जिसमें सब्ज़े का नामो निशान नहीं.

फिर उससे खेती निकालते हैं कि उसमें से उनके चौपाए और वो ख़ुद खाते हैं(14)
(14) चौपाए भूसा और वो ख़ुद ग़ल्ला.

तो क्या उन्हे सूझता नहीं(15) {27}
(15)कि वो ये देखकर अल्लाह तआला की भरपूर क़ुदरत पर इस्तिदलाल करें और समझें कि जो क़ादिर बरहक़ ख़ुश्क ज़मीन से खेती निकालने पर क़ादिर है, मु्र्दों का ज़िन्दा करना उसकी क़ुदरत से क्या मुश्किल.

और कहते हैं यह फ़ैसला कब होगा अगर तुम सच्चे हो(16) {28}
(16) मुसलमान कहा करते थे कि अल्लाह तआला हमारे और मुश्रिकों के बीच फ़ैसला फ़रमाएगा और फ़रमाँबरदार और नाफ़रमान को उनके कर्मो के अनुसार बदला देगा. इससे उनकी मुराद यह थी कि हम पर रहमत और करम करेगा और काफ़िरों व मुश्रिकों को अज़ाब में जकड़ेगा. इसपर काफ़िर हंसी के तौर पर कहते थे कि यह फ़ैसला कब होगा, इसका वक़्त कब आएगा. अल्लाह तआला अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से इरशाद फ़रमाता है.

तुम फ़रमाओ फै़सले के दिन(17)
(17) जब अल्लाह का अज़ाब उतरेगा.

काफ़िरों को उनका ईमान लाना नफ़ा न देगा और न उन्हें मोहलत मिले (18) {29}
(18) तौबह और माफ़ी की. फ़ैसले के दिन से या क़यामत का दिन मुराद है या मक्के की विजय का दिन या बद्र का दिन. अगर क़यामत का दिन मुराद हो तो ईमान का नफ़ा न देना ज़ाहिर है क्योंकि ईमान वही मक़बूल है जो दुनिया में हो और दुनिया से निकलने के बाद न ईमान मक़बूल होगा न ईमान लाने के लिये दुनिया में वापस आना मिलेगा. और अगर फ़ैसले के दिन से बद्र का दिन या मक्के की विजय का दिन मुराद हो तो मानी ये होंगे कि जब अज़ाब आ जाए और वो लोग क़त्ल होने लगें तो क़त्ल की हालत में उनका ईमान लाना क़ुबूल न किया जाएगा और न अज़ाब में विलम्ब करके उन्हें मोहलत दी जायगी. चुनांन्चे जब मक्कए मुकर्रमा फ़त्ह हुआ तो क़ौमें बनी कनानह भागी. हज़रत ख़ालिद बिन वलीद ने जब उन्हें घेरा और उन्होंने देखा कि अब क़त्ल सर पर आ गया, कोई उम्मीद जान बचने की नहीं है तो उन्होंने इस्लाम का इज़हार किया. हज़रत ख़ालिद ने क़ुबूल न फ़रमाया और उन्हें क़त्ल कर दिया. (जुमल)

तो उनसे मुंह फेर लो और इन्तिज़ार करो (19)
(19) उनपर अज़ाब उतरने का.

बेशक उन्हें भी इन्तिज़ार करना है(20){30}
(20) बुख़ारी व मुस्लिम की हदीस शरीफ़ में है कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम शुक्रवार के दिन फ़ज्र की नमाज़ में यह सूरत यानी सूरए सज्दा और सूरए दहर पढ़ते थे. तिरमिज़ी की हदीस में है कि जब तक हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम यह सूरत और सूरए तबारकल्लज़ी बियदिहिल मुल्क न पढ़ लेते, सोने को न जाते. हज़रत इब्ने मसऊद रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि सूरए सज्दा क़ब्र के अज़ाब से मेहफ़ूज़ रखती है. (ख़ाज़िन व मदारिक वग़ैरह)

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: