31 – सूरए लुक़मान- दूसरा रूकू

31 – सूरए लुक़मान- दूसरा रूकू

وَلَقَدْ آتَيْنَا لُقْمَانَ الْحِكْمَةَ أَنِ اشْكُرْ لِلَّهِ ۚ وَمَن يَشْكُرْ فَإِنَّمَا يَشْكُرُ لِنَفْسِهِ ۖ وَمَن كَفَرَ فَإِنَّ اللَّهَ غَنِيٌّ حَمِيدٌ
وَإِذْ قَالَ لُقْمَانُ لِابْنِهِ وَهُوَ يَعِظُهُ يَا بُنَيَّ لَا تُشْرِكْ بِاللَّهِ ۖ إِنَّ الشِّرْكَ لَظُلْمٌ عَظِيمٌ
وَوَصَّيْنَا الْإِنسَانَ بِوَالِدَيْهِ حَمَلَتْهُ أُمُّهُ وَهْنًا عَلَىٰ وَهْنٍ وَفِصَالُهُ فِي عَامَيْنِ أَنِ اشْكُرْ لِي وَلِوَالِدَيْكَ إِلَيَّ الْمَصِيرُ
وَإِن جَاهَدَاكَ عَلَىٰ أَن تُشْرِكَ بِي مَا لَيْسَ لَكَ بِهِ عِلْمٌ فَلَا تُطِعْهُمَا ۖ وَصَاحِبْهُمَا فِي الدُّنْيَا مَعْرُوفًا ۖ وَاتَّبِعْ سَبِيلَ مَنْ أَنَابَ إِلَيَّ ۚ ثُمَّ إِلَيَّ مَرْجِعُكُمْ فَأُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
يَا بُنَيَّ إِنَّهَا إِن تَكُ مِثْقَالَ حَبَّةٍ مِّنْ خَرْدَلٍ فَتَكُن فِي صَخْرَةٍ أَوْ فِي السَّمَاوَاتِ أَوْ فِي الْأَرْضِ يَأْتِ بِهَا اللَّهُ ۚ إِنَّ اللَّهَ لَطِيفٌ خَبِيرٌ
يَا بُنَيَّ أَقِمِ الصَّلَاةَ وَأْمُرْ بِالْمَعْرُوفِ وَانْهَ عَنِ الْمُنكَرِ وَاصْبِرْ عَلَىٰ مَا أَصَابَكَ ۖ إِنَّ ذَٰلِكَ مِنْ عَزْمِ الْأُمُورِ
وَلَا تُصَعِّرْ خَدَّكَ لِلنَّاسِ وَلَا تَمْشِ فِي الْأَرْضِ مَرَحًا ۖ إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ كُلَّ مُخْتَالٍ فَخُورٍ
وَاقْصِدْ فِي مَشْيِكَ وَاغْضُضْ مِن صَوْتِكَ ۚ إِنَّ أَنكَرَ الْأَصْوَاتِ لَصَوْتُ الْحَمِيرِ

और बेशक हमने लुक़मान को हिकमत (बोध) अता फ़रमाई(1)
(1) मुहम्मद बिन इस्हाक़ ने कहा कि लुक़मान का नसब यह है लुक़मान बिन बाऊर बिन नाहूर बिन तारिख़. वहब का क़ौल है कि हज़रत लुक़मान हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम के भान्जे थे. मक़ातिल ने कहा कि हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम की ख़ाला के बेटे थे. वाक़िदी ने कहा बनी इस्राईल में क़ाज़ी थे. और यह भी कहा गया है कि आप हज़ार साल  ज़िन्दा रहे और हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम का ज़माना पाया और उनसे इल्म हासिल किया और उनके ज़माने में फ़तवा देना छोड़ दिया, अगरचे पहले से फ़तवा देते थे. आपकी नबुव्वत में इख़्तिलाफ़ है. अक्सर उलमा इसी तरफ़ हैं कि आप हकीम थे, नबी न थे. हिकमत अक़्ल और समझ को कहते हैं और कहा गया है कि हिकमत वह इल्म है जिसके मुताबिक़ अमल किया जाए. कुछ ने कहा कि हिकमत मअरिफ़त और कामों के सम्बन्ध में भरपूर समझदारी को कहते हैं और यह भी कहा गया है कि अल्लाह तआला इसको जिसके दिल में रखता है, उसके दिल को रौशन कर देता है.

कि अल्लाह का शुक्र कर(2)
(2)  इस नेअमत पर कि अल्लाह तआला ने हिकमत अता की.

और जो शुक्र करे वह अपने भले को शुक्र करता है(3)
(3) क्योंकि शुक्र से नेअमत ज़्यादा होती है और सवाब मिलता है.

और जो नाशुक्री करे तो बेशक अल्लाह बेपर्वाह है सब ख़ूबियों सराहा {12} और याद करो जब लुक़मान ने अपने बेटे से कहा और वह नसीहत करता था(4)
(4) हज़रत लुक़मान अला नबिय्यिना व अलैहिस्सलाम के उन सुपुत्र का नाम अनअम या अश्कम था. इन्सान का आला मरतबा यह है कि वह ख़ुद कामिल हो और दूसरे की तकमील करे. तो हज़रत लुक़मान अला नबिय्यिना व अलैहिस्सलाम का कामिल होना तो “आतैनल लुक़मानल हिकमता” में बयान फ़रमा दिया और दूसरे की तकमील करना “व हुवा यईज़ुहू” (और वह नसीहत करता था) से ज़ाहिर फ़रमाया, और नसीहत बेटे को की, इससे मालूम हुआ कि नसीहत में घर वालों और क़रीबतर लोगों को पहले रखना चाहिये और नसीहत की शुरूआत शिर्क से मना करके की गई इससे मालूम हुआ कि यह अत्यन्त अहम है.

ऐ मेरे बेटे, अल्लाह का किसी को शरीक न करना, बेशक शिर्क बड़ा ज़ुल्म है(5){13}
(5) क्योंकि इसमें इबादत के लायक़ जो न हो उसको इबादत के योग्य जो है उसके बराबर क़रार देना है और इबादत को उसके अर्थ के ख़िलाफ़ रखना, ये दोनों बातें, बड़ा भारी ज़ुल्म हैं.

और हमने आदमी को उसके माँ बाप के बारे में ताक़ीद फ़रमाई (6)
(6)  कि उनका फ़रमाँबरदार रहे और उनके साथ नेक सुलूक करे (जैसा कि इसी आयत में आगे इरशाद है)

उसकी माँ ने उसे पेट में रखा कमज़ोरी पर कमज़ोरी झेलती हुई(7)
(7) यानी उसकी कमज़ोरी दम ब दम तरक़्क़ी पर होती है, जितना गर्भ बढ़ता जाता है, बोझ ज़्यादा होता है और कमज़ोरी बढ़ती है. औरत को गर्भवती होने के बाद कमज़ोरी और दर्द और मशक़्क़ते पहुंचती रहती हैं. गर्भ ख़ुद कमज़ोर करने वाला है. ज़चगी का दर्द कमज़ोरी पर कमज़ोरी है. और बच्चा होना इसपर और अधिक सख़्ती है. दूध पिलाना इन सब पर और ज़्यादा है.

और उसका दूध छूटना दो बरस में है यह कि हक़ मान मेरा और अपने माँ बाप का (8)
(8) यह वह ताकीद है जिसका ज़िक्र ऊपर फ़रमाया था. सुफ़ियान बिन ऐनिय्या ने इस आयत की तफ़सीर में फ़रमाया कि जिसने पाँचों वक़्त की नमाज़ें अदा कीं  वह अल्लाह तआला का शुक्र बजा लाया और जिसने पाँचों वक़्त की नमाज़ों के बाद माँ बाप के लिये दुआएं कीं उसने माँ बाप की शुक्रगुज़ारी की.

आख़िर मुझी तक आना है {14} और अगर वो दोनों तुझ से कोशिश करें कि मेरा शरीक ठहराए ऐसी चीज़ को जिसका तुझे इल्म नहीं(9)
(9) यानी इल्म से तो किसी को मेरा शरीक ठहरा ही नहीं सकते क्योंकि मेरा शरीक असंभव है, हो ही नहीं सकता, अब जो कोई भी कहेगा तो बेइल्मी ही से किसी चीज़ के शरीक ठहराने को कहेगा. ऐसा अगर माँ बाप भी कहे.

तो उनका कहना न मान(10)
(10) नख़ई ने कहा कि माँ बाप की फ़रमाँबरदारी वाजिब है लेकिन अगर वो शिर्क का हुक्म करें तो उनकी फ़रमाँबरदारी न कर क्योंकि ख़ालिक़ की नाफ़रमानी करने में किसी मख़लूक़ की फ़रमाँबरदारी रवा नहीं.

और दुनिया में अच्छी तरह उनका साथ दें(11)
(11) हुस्ने अख़्लाक़ और हुस्ने सुलूक और ऐहसान और तहम्मुल के साथ.

और उसकी राह चल जो मेरी तरफ़ रूजू (तवज्जूह) लाया(12)
(12) यानी नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और आपके सहाबा की राह, इसी को सुन्नत व जमाअत का मज़हब कहते हैं.

फिर मेरी ही तरफ़ तुम्हें फिर आना है तो मैं बतादूंगा जो तुम करते थे(13){15}
(13) तुम्हारे कर्मों की जज़ा देकर. ‘व वस्सैनल इन्साना’ (यानी और हमने आदमी को उसके माँ बाप में ताकीद फ़रमाई) से यहां तक जो मज़मून है यह हज़रत लुक़मान अला नबिय्यिना व अलैहिस्सलाम का नहीं है बल्कि उन्होंने अपने सुपुत्र को अल्लाह तआला की नेअमत का शुक्र करने का हुक्म दिया था और शिर्क से मना किया था तो अल्लाह तआला ने माँ बाप की फ़रमाँबरदारी और उसका महत्व इरशाद फ़रमाया. इसके बाद फिर लुक़मान अलैहिस्सलाम का क़ौल बयान किया जाता है कि उन्होंने अपने बेटे से फ़रमाया.

ऐ मेरे बेटे बुराई अगर राई के दाने बराबर हो फिर वह पत्थर की चट्टान में या आसमानों में या ज़मीन में कहीं हो(14)
(14) कैसी ही पोशीदा जगह हो, अल्लाह तआला से नहीं छुप सकती.

अल्लाह उसे ले आएगा(15)
(15) क़यामत के दिन, और उसका हिसाब फ़रमाएगा.

बेशक अल्लाह हर बारीकी (सुक्ष्मता) का जानने वाला ख़बरदार है(16) {16}
(16) यानी हर छोटा बड़ा उसके इल्म के घेरे में है.

ऐ मेरे बेटे नमाज़ क़ायम रख और अच्छी बात का हुक्म दे और बुरी बात से मना कर और जो उफ़ताद तुझ पर पड़े(17)
(17) अच्छाई का हुक्म देने और बुराई से मना करने से.

उस पर सब्र कर, बेशक ये हिम्मत के काम हैं (18) {17}
(18) उनका करना लाज़िम है. इस आयत से मालम हुआ कि नमाज़ और नेकी के हुक्म और बुराई की मनाही और तकलीफ़ पर सब्र ऐसी ताअतें है जिनका तमाम उम्मतों में हुकम था.

और किसी से बात करने में (19)
(19) घमण्ड के तौर पर.

अपना रूख़सारा कज (टेढ़ा) न कर(20)
(20) यानी जब आदमी बात करें तो उन्हें तुच्छ जान कर उनकी तरफ़ से मुंह फेरना, जैसा घमण्डियों का तरीक़ा है, इख़्तियार न करना. मालदार और फ़क़ीर के साथ विनम्रता से पेश आना.

और ज़मीन में इतराता न चल, बेशक अल्लाह को नहीं भाता कोई इतराता फ़ख्र करता {18} और बीच की चाल चल(21)
(21) न बहुत तेज़, न बहुत सुस्त, कि ये दोनों बुरी हैं. एक में घमण्ड है, और एक में छिछोरापन. हदीस शरीफ़ में है कि बहुत तेज़ चलना मूमिन का विक़ार खोता है.

और अपनी आवाज़ कुछ पस्त (नीची) कर(22)
(22) यानी शोर ग़ुल और चीख़ने से परहेज़ करे.

बेशक सब आवाज़ों में बुरी आवाज़ गधे की(23){19}
(23)  मतलब यह है कि शोर मचाना और आवाज़ ऊंची करना मकरूह और ना पसन्दीदा है और इसमें कुछ बड़ाई नहीं हैं. गधे की आवाज़ ऊंची होने के बावुजूद कानों को बुरी लगने वाली और डरावनी है. नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को नर्म आवाज़ से कलाम करना पसन्द था और सख़्त आवाज़ से बोलने को नापसन्द रखते थे.

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