31 – सूरए लुक़मान- तीसरा रूकू

31 – सूरए लुक़मान- तीसरा रूकू

أَلَمْ تَرَوْا أَنَّ اللَّهَ سَخَّرَ لَكُم مَّا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ وَأَسْبَغَ عَلَيْكُمْ نِعَمَهُ ظَاهِرَةً وَبَاطِنَةً ۗ وَمِنَ النَّاسِ مَن يُجَادِلُ فِي اللَّهِ بِغَيْرِ عِلْمٍ وَلَا هُدًى وَلَا كِتَابٍ مُّنِيرٍوَإِذَا قِيلَ لَهُمُ اتَّبِعُوا مَا أَنزَلَ اللَّهُ قَالُوا بَلْ نَتَّبِعُ مَا وَجَدْنَا عَلَيْهِ آبَاءَنَا ۚ أَوَلَوْ كَانَ الشَّيْطَانُ يَدْعُوهُمْ إِلَىٰ عَذَابِ السَّعِيرِ۞ وَمَن يُسْلِمْ وَجْهَهُ إِلَى اللَّهِ وَهُوَ مُحْسِنٌ فَقَدِ اسْتَمْسَكَ بِالْعُرْوَةِ الْوُثْقَىٰ ۗ وَإِلَى اللَّهِ عَاقِبَةُ الْأُمُورِوَمَن كَفَرَ فَلَا يَحْزُنكَ كُفْرُهُ ۚ إِلَيْنَا مَرْجِعُهُمْ فَنُنَبِّئُهُم بِمَا عَمِلُوا ۚ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِنُمَتِّعُهُمْ قَلِيلًا ثُمَّ نَضْطَرُّهُمْ إِلَىٰ عَذَابٍ غَلِيظٍوَلَئِن سَأَلْتَهُم مَّنْ خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ لَيَقُولُنَّ اللَّهُ ۚ قُلِ الْحَمْدُ لِلَّهِ ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَلِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ إِنَّ اللَّهَ هُوَ الْغَنِيُّ الْحَمِيدُوَلَوْ أَنَّمَا فِي الْأَرْضِ مِن شَجَرَةٍ أَقْلَامٌ وَالْبَحْرُ يَمُدُّهُ مِن بَعْدِهِ سَبْعَةُ أَبْحُرٍ مَّا نَفِدَتْ كَلِمَاتُ اللَّهِ ۗ إِنَّ اللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌمَّا خَلْقُكُمْ وَلَا بَعْثُكُمْ إِلَّا كَنَفْسٍ وَاحِدَةٍ ۗ إِنَّ اللَّهَ سَمِيعٌ بَصِيرٌأَلَمْ تَرَ أَنَّ اللَّهَ يُولِجُ اللَّيْلَ فِي النَّهَارِ وَيُولِجُ النَّهَارَ فِي اللَّيْلِ وَسَخَّرَ الشَّمْسَ وَالْقَمَرَ كُلٌّ يَجْرِي إِلَىٰ أَجَلٍ مُّسَمًّى وَأَنَّ اللَّهَ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌذَٰلِكَ بِأَنَّ اللَّهَ هُوَ الْحَقُّ وَأَنَّ مَا يَدْعُونَ مِن دُونِهِ الْبَاطِلُ وَأَنَّ اللَّهَ هُوَ الْعَلِيُّ الْكَبِيرُ

क्या तुने न देखा कि अल्लाह ने तुम्हारे लिये काम में लगाए जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है(1)
(1) आसमानों में, सूरज चांद तारों की तरह, जिनसे नफ़ा उठाते हो. और ज़मीनों में दरिया, नेहरें, खानें, पहाड़, दरख्त, फल, चौपाए, वग़ैरह जिन से तुम फ़ायदे हासिल करते हो.

और तुम्हें भरपूर दीं अपनी नेअमतें ज़ाहिर और छुपी (2)
(2) ज़ाहिरी नेअमतों से शरीर के अंगों की दुरूस्ती और हुस्न व शक्ल सूरत मूराद हैं और बातिनी नअमतों से इल्मे मअरिफ़त वग़ैरह. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि नेअमतें ज़ाहिर तो इस्लाम और क़ुरआन है और नेअमते बातिन यह है कि तुम्हारे गुनाहों पर पर्दे डाल दिये. तुम्हारा हाल न खोला. सज़ा में जल्दी न फ़रमाई. कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि ज़ाहिरी नेअमत बदन का दुरूस्त होना और अच्छी शक्ल सूरत है और बातिनी नेअमत दिल का अक़ीदा. एक क़ौल यह भी है कि ज़ाहिरी नेअमत रिज़्क़ है और बातिनी नेअमत अच्छा अख़लाक़. एक क़ौल यह है कि ज़ाहिरी नेअमत इस्लाम का ग़लबा और दुश्मनों पर विजयी होना है और बातिनी नेअमत फ़रिश्तों का मदद के लिये आना. एक क़ौल यह है कि ज़ाहिरी नेअमत रसूल का अनुकरण है और बातिनी नेअमत उनकी महब्बत. अल्लाह तआला हम सब को अपने रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की महब्बत दे और उनका अनुकरण करने की तौफ़ीक़.

और कुछ आदमी अल्लाह के बारे में झगड़ते हैं यूं कि न इल्म न अक़्ल और न कोई रौशन किताब (3) {20}
(3) तो जो कहेंगे, जिहालत और नादानी होगी और अल्लाह की शान में इस तरह की जुरअत और मुंह खोलना अत्यन्त बेजा और गुमराही है. यह आयत नज़र बिन हारिस और उबई बिन ख़लफ़ वग़ैरह काफ़िरों के बारे में उतरी जो बेइल्म और ज़ाहिल होने के बावुजूद नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से अल्लाह तआला की ज़ात और सिफ़ात के बारे में झगड़े किया करते थे.

और जब उनसे कहा जाए उसकी पैरवी करो जो अल्लाह ने उतारा तो कहते हैं बल्कि हम तो उसकी पैरवी करेंगे जिसपर हमने अपने बाप दादा को पाया(4)
(4) यानी अपने बाप दादा के तरीक़े पर ही रहेंगे, इसपर अल्लाह तआला फ़रमाता है.

क्या अगरचे शैतान उनको दोज़ख़ के अज़ाब की तरफ़ बुलाता हो (5){21}
(5) जब भी वो अपने बाप दादा ही की पैरवी किये जाएंगे.

तो जो अपना मुंह अल्लाह की तरफ़ झुका दे (6)
(6) दीन ख़ालिस उसके लिये क़ुबूल करे, उसकी इबादत में लगे, अपने काम उस पर छोड़ दे, उसी पर भरोसा रखे.

और हो नेकी करने वाला तो बेशक उसने मज़बूत गांठ थामी और अल्लाह ही की तरफ़ है सब कामों की इन्तिहा {22} और जो कुफ़्र करे तो तुम (7)
(7) ऐ नबियों के सरदार सल्लल्लाहो अलैका वसल्ल्म.

उसके कुफ़्र से ग़म न खाओ उन्हें हमारी ही तरफ़ फिरना है हम उन्हें बता देंगे जो करते थे(8)
(8) यानी हम उन्हें उनके कर्मों की सज़ा देंगे.

बेशक अल्लाह दिलों की बात जानता है {23} हम उन्हें कुछ बरतने देंगे (9)
(9) यानी थोड़ी मोहलत देंगे कि वो दुनिया के मज़े उठाएं.

फिर उन्हें बेबस करके सख़्त अज़ाब की तरफ़ ले जाएंगे (10){24}
(10) आख़िरत में और वह दोज़ख़ का अज़ाब है जिससे वो रिहाई न पाएंगे.

और अगर तुम उनसे पूछो किसने बनाए आसमान और ज़मीन तो ज़रूर कहेंगे अल्लाह ने, तुम फ़रमाओ सब ख़ूबियां अल्लाह को(11)
(11)  यह उनके इक़रार पर उन्हें इल्ज़ाम देना है कि जिसने आसमान ज़मीन पैदा किये वह अल्लाह वहदहू ला शरीका लहू है तो वाजिब हुआ कि उसकी हम्द की जाए, उसका शुक्र किया जाए और उसके सिवा किसी और की इबादत न की जाए.

बेशक उनमें अक्सर जानते नहीं {25} अल्लाह ही का है जो कुछ आसमानों और ज़मीन में हैं (12)
(12) सब उसके ममलूक मख़लूक और बन्दे हैं तो उसके सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं.

बेशक अल्लाह ही बेनियाज़ है सब ख़ूबियों सराहा {26} और अगर ज़मीन में जितने पेड़ हैं सब क़ल्में हो जाएं और समन्दर उसकी सियाही हो उसके पीछे सात समन्दर और (13)
(13) और सारी ख़ल्क़ अल्लाह तआला के कलिमात को लिखे और वो तमाम क़लम और उन तमाम समन्दरों की स्याही ख़त्म हो जाए.

तो अल्लाह की बातें ख़त्म न होंगी(14)
(14) क्योंकि अल्लाह तआला का इल्म असीम है. जब सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम हिजरत करके मदीनए तैय्यिबह तशरीफ़ लाए तो यहूदियों के उलमा और पादरियों ने आपकी ख़िदमत में हाज़िर होकर कहा कि हम ने सुना है कि आप फ़रमाते हैं “वमा ऊतीतुम मिनल इल्मे इल्ला क़लीलन” (यानी तुम्हें थोड़ा इल्म दिया गया) तो उससे आपकी मुराद हम लोग हैं या सिर्फ़ अपनी क़ौम फ़रमाया, सब मुराद हैं. उन्होंने कहा, क्या आपकी किताब में यह नहीं हैं कि हमें तौरात दी गई है, उसमें हर चीज़ का इल्म है. हुज़ूर ने फ़रमाया कि हर चीज़ का इल्म भी अल्लाह के इल्म के सामने थोड़ा है और तुम्हें तो अल्लाह तआला ने इतना इल्म दिया है कि उसपर अमल करो तो नफ़ा पाओ. उन्होंने कहा, आप कैसे यह ख़याल फ़रमाते हैं. आपका क़ौल तो यह है कि जिसे हिकमत दी गई उसे बहुत भलाई दी गई. तो थोड़ा इल्म और बहुत सी भलाई कैसे जमा हो. इसपर यह आयत उतरी. इस सूरत में यह आयत मदनी होगी. एक क़ौल यह भी है कि यहूदियों ने क़ुरैश से कहा था कि मक्के में जाकर रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से इस तरह का कलाम करें. एक क़ौल यह है कि मुश्रिकों ने यह कहा था कि क़ुरआन और जो कुछ मुहम्मद (मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) लाते हैं, यह बहुत जल्द तमाम हो जाएगा. फिर क़िस्सा ख़त्म. इसपर अल्लाह तआला ने यह आयत उतारी.

बेशक अल्लाह इज़्ज़त व हिकमत वाला है  {27} तुम सब का पैदा करना और क़यामत में उठाना ऐसा ही है जैसा एक जान का (15)
(15) अल्लाह पर कुछ दुशवार नहीं. उसकी क़ुदरत यह है कि एक कुन से सब को पैदा कर दे.

बेशक अल्लाह सुनता देखता है {28} ऐ सुनने वाले क्या तूने न देखा कि अल्लाह रात लाता है दिन के हिस्से में और दिन करता है रात के हिस्से में(16)
(16) यानी एक को घटा कर, दूसरे को बढ़ाकर और जो वक़्त एक में से घटाता है, दूसरे में बढ़ा देता है.

और उसने सूरज और चांद काम में लगाए (17)
(17) बन्दों के नफ़े के लिये.

हर एक, एक मुक़र्रर (निश्चित) मीआद तक चलता है (18)
(18) यानी क़यामत के दिन तक या अपने अपने निर्धारित समय तक. सूरज आख़िर साल तक और चांद आख़िर माह तक.

और यह कि अल्लाह तुम्हारे कामों से ख़बरदार है {29} यह इसलिये कि अल्लाह ही हक़ है(19)
(19) वही इन चीज़ों पर क़ादिर है, तो वही इबादत के लायक़ है.

और उसके सिवा जिनको पूजते हैं सब बातिल (असत्य) हैं(20) और इसलिये कि अल्लाह ही बलन्द बड़ाई वाला है {30}
(20) फ़ना होने वाले. इन में से कोई इबादत के लायक़ नहीं हो सकता.

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