31 – सूरए लुक़मान- चौथा रूकू

31 – सूरए लुक़मान- चौथा रूकू

أَلَمْ تَرَ أَنَّ الْفُلْكَ تَجْرِي فِي الْبَحْرِ بِنِعْمَتِ اللَّهِ لِيُرِيَكُم مِّنْ آيَاتِهِ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِّكُلِّ صَبَّارٍ شَكُورٍ
وَإِذَا غَشِيَهُم مَّوْجٌ كَالظُّلَلِ دَعَوُا اللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ فَلَمَّا نَجَّاهُمْ إِلَى الْبَرِّ فَمِنْهُم مُّقْتَصِدٌ ۚ وَمَا يَجْحَدُ بِآيَاتِنَا إِلَّا كُلُّ خَتَّارٍ كَفُورٍ
يَا أَيُّهَا النَّاسُ اتَّقُوا رَبَّكُمْ وَاخْشَوْا يَوْمًا لَّا يَجْزِي وَالِدٌ عَن وَلَدِهِ وَلَا مَوْلُودٌ هُوَ جَازٍ عَن وَالِدِهِ شَيْئًا ۚ إِنَّ وَعْدَ اللَّهِ حَقٌّ ۖ فَلَا تَغُرَّنَّكُمُ الْحَيَاةُ الدُّنْيَا وَلَا يَغُرَّنَّكُم بِاللَّهِ الْغَرُورُ
إِنَّ اللَّهَ عِندَهُ عِلْمُ السَّاعَةِ وَيُنَزِّلُ الْغَيْثَ وَيَعْلَمُ مَا فِي الْأَرْحَامِ ۖ وَمَا تَدْرِي نَفْسٌ مَّاذَا تَكْسِبُ غَدًا ۖ وَمَا تَدْرِي نَفْسٌ بِأَيِّ أَرْضٍ تَمُوتُ ۚ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ خَبِيرٌ

क्या तूने न देखा कि किश्ती दरिया में चलती है अल्लाह के फ़ज्ल (कृपा) से(1)
(1) उसकी रहमत और उसके एहसान से.

ताकि वह तुम्हें अपनी(2)
(2) क़ुदरत के चमत्कारों की.

निशानियाँ दिखाए, बेशक इसमें निशानियाँ हैं हर बड़े सब्र करने वाले शुक्रगुज़ार को (3){31}
(3) जो बलाओं पर सब्र करे और अल्लाह तआला की नेअमतों का शुक्र गुज़ार हो. सब्र और शुक्र ये दोनों गुण ईमान वाले के है.

और जब उनपर(4)
(4) यानी काफ़िरों पर.

आ पड़ती है कोई मौज़ पहाड़ों की तरह तो अल्लाह को पुकारते हैं निरे उसपर अक़ीदा रखते हुए(5)
(5) और उसके समक्ष गिड़गिड़ाते हैं और रोते हैं और उसी से दुआ और इल्तिज़ा. उस वक़्त सब को भूल जाते हैं.

फिर जब उन्हें ख़ुश्क़ी की तरफ़ बचा लाता है ता उनमें कोई ऐतिदाल (मध्यमार्ग) पर रहता है(6)
(6) अपने ईमान और सच्चाई पर क़ायम रहता, कुफ़्र की तरफ़ नहीं लौटता. कहा गया है कि यह आयत अकरमह बिन अबू जहल के बारे में उतरी. जिस साल मक्कए मुकर्रमा की फ़त्ह हुई तो वह समन्दर की तरफ़ भाग गए. वहाँ मुख़ालिफ़ वा ने घेरा और ख़तरे में पड़ गए, तो अकरमह ने कहा अगर अल्लाह तआला हमें इस ख़तरें से छुटकारा दे तो मैं ज़रूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर होकर हाथ में हाथ दे दूंगा यानी इताअत करूंगा. अल्लाह तआला ने करम किया. हवा ठहर गई और अकरमह मक्कए मुकर्रमा की तरफ़ आ गए और इस्लाम लाए और बड़ी सच्चाई के साथ इस्लाम लाए. कुछ उनमें ऐसे थे जिन्होंने एहद पूरा किया. उनकी निस्बत अगले जुमले में इरशाद होता है.

और हमारी आयतों का इन्कार न करेगा मगर हर बड़ा बेवफ़ा नाशुक्रा {32} ऐ लोगों (7)
(7) यानी ऐ मक्का वालों.

अपने रब से डरो और उस दिन का ख़ौफ़ करो जिसमें कोई बाप अपने बच्चे के काम न आएगा, और न कोई कामी (कारोबारी) बच्चा अपने बाप को कुछ नफ़ा दे (8)
(8)  क़यामत के दिन हर इन्सान नफ़्सी नफ़्सी करता होगा और बाप बेटे के और बेटा बाप के काम न आ सकेगा. न काफ़िरों की मुसलमान औलाद उन्हें फ़ायदा पहुंचा सकेगी, न मुसलमान माँ बाप काफ़िर औलाद की.

बेशक अल्लाह का वादा सच्चा है (9)
(9) ऐसा दिन ज़रूर आना और दोबारा उठाए जाने और हिसाब और जज़ा का वादा ज़रूर पूरा होना है.

तो हरगिज़ तुम्हें धोखा न दे दुनिया की ज़िन्दगी (10)
(10) जिसकी तमाम नेअमतें और लज़्ज़तें मिटने वाली कि उन पर आशिक़ होकर ईमान की नेअमत से मेहरूम रह जाओ.

और हरगिज़ तुम्हें अल्लाह के इल्म पर धोखा न दे वह बड़ा फ़रेबी (धुर्त) (11){33}
(11) यानी शैतान दूर दराज़ की उम्मीदों में डालकर गुनाहों में न जकड़ दें.

बेशक अल्लाह के पास है क़यामत का इल्म(12)
(12) यह आयत हारिस बिन अम्र के बारे में उतरी जिसने नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर होकर क़यामत का वक़्त पूछा था और यह कहा था कि मैंने खेती बोई है ख़बर दीजिये मेंह कब आएगा और मेरी औरत गर्भ से है, मुझे बताईये कि उसके पेट में क्या है, लड़का या लड़की. यह तो मुझे मालूम है कि कल मैं ने क्या किया, यह मुझे बताइये कि आयन्दा कल को क्या करूंगा. मैं यह भी जानता हूँ कि मैं कहाँ पैदा हुआ मुझे यह बताइये कि कहाँ मरूंगा. इसके जवाब में यह आयत उतरी.

और उतारता है मेंह, और जानता है जो कुछ माओ के पेट में है, और कोई जान नहीं जानती कि कल क्या कमाएगी, और कोई जान नहीं जानती कि किस ज़मीन में मरेगी, बेशक अल्लाह जानने वाला बताने वाला है(13){34}
(13) जिसको चाहे अपने औलिया और अपने प्यारों में से, उन्हें ख़बरदार करदे. इस आयत में जिन पांच चीज़ों के इल्म की विशेषता अल्लाह तआला के साथ बयान फ़रमाई गई उन्हीं की निस्बत सूरए जिन्न में इरशाद हुआ “आलिमुल ग़ैबे फ़ला युज़हिरो अला ग़ैबिही अहदन इल्ला मनिर तदा मिर रसूलिन” (यानी ग़ैब का जानने वाला, तो अपने ग़ैब पर किसी को मुसल्लत नहीं करता, सिवाए अपने पसन्दीदा रसूलों के – सूरए जिन्न, आयत 26-27) ग़रज़ यह कि बग़ैर अल्लाह तआला के बताए इन चीज़ों का इल्म किसी को नहीं और अपने पसन्दीदा रसूलों को बताने की ख़बर ख़ुद उसने सूरए जिन्न में दी है. ख़ुलासा यह कि इल्मे ग़ैब अल्लाह तआला के साथ ख़ास है और नबियों वलियों को ग़ैब का इल्म अल्लाह तआला की तालीम से चमत्कार के तौर पर अता होता है. यह उस विशेषता के विरूद्ध नहीं है जो अल्लाह के इल्म के साथ है. बहुत सी आयतें और हदीसें इस को साबित करती है. बारिश का वक़्त और गर्भ में क्या है और कल को क्या करे और कहाँ मरेगा. इन बातों की ख़बरें बहुतात से औलिया और नबियों ने दी हैं और क़ुरआन और हदीस से साबित हैं. हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को फ़रिश्तों ने हज़रत इस्हाक़ अलैहिस्सलाम के पैदा होने की और हज़रत ज़करिया अलैहिस्सलाम को हज़रत यहया अलैहिस्सलाम के पैदा होने की और हज़रत मरयम को हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के पैदा होने की ख़बरें दीं तो उन फ़रिश्तों को भी पहले से मालूम था कि इन गर्भों में क्या है और उन हजरात को भी जिन्हें फ़रिश्तों ने सूचनाएं दी थीं और उन सब का जानना क़ुरआने करीम से साबित हैं तो आयत के मानी बिल्कुल यही है कि बग़ैर अल्लाह तआला के बताए कोई नहीं जानता. इसके मानी यह लेना कि अल्लाह तआला के बताए से भी कोई नहीं जानता केवल बातिल और सैंकड़ों आयतों और हदीसों के ख़िलाफ़ है (ख़ाज़िन, बैज़ावी, अहमदी, रूहुल बयान वगै़रह).

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