सूरए रूम- पाँचवां रूकू

30 – सूरए रूम- पाँचवां रूकू

ظَهَرَ الْفَسَادُ فِي الْبَرِّ وَالْبَحْرِ بِمَا كَسَبَتْ أَيْدِي النَّاسِ لِيُذِيقَهُم بَعْضَ الَّذِي عَمِلُوا لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ
قُلْ سِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَانظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الَّذِينَ مِن قَبْلُ ۚ كَانَ أَكْثَرُهُم مُّشْرِكِينَ
فَأَقِمْ وَجْهَكَ لِلدِّينِ الْقَيِّمِ مِن قَبْلِ أَن يَأْتِيَ يَوْمٌ لَّا مَرَدَّ لَهُ مِنَ اللَّهِ ۖ يَوْمَئِذٍ يَصَّدَّعُونَ
مَن كَفَرَ فَعَلَيْهِ كُفْرُهُ ۖ وَمَنْ عَمِلَ صَالِحًا فَلِأَنفُسِهِمْ يَمْهَدُونَ
لِيَجْزِيَ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ مِن فَضْلِهِ ۚ إِنَّهُ لَا يُحِبُّ الْكَافِرِينَ
وَمِنْ آيَاتِهِ أَن يُرْسِلَ الرِّيَاحَ مُبَشِّرَاتٍ وَلِيُذِيقَكُم مِّن رَّحْمَتِهِ وَلِتَجْرِيَ الْفُلْكُ بِأَمْرِهِ وَلِتَبْتَغُوا مِن فَضْلِهِ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ رُسُلًا إِلَىٰ قَوْمِهِمْ فَجَاءُوهُم بِالْبَيِّنَاتِ فَانتَقَمْنَا مِنَ الَّذِينَ أَجْرَمُوا ۖ وَكَانَ حَقًّا عَلَيْنَا نَصْرُ الْمُؤْمِنِينَ
اللَّهُ الَّذِي يُرْسِلُ الرِّيَاحَ فَتُثِيرُ سَحَابًا فَيَبْسُطُهُ فِي السَّمَاءِ كَيْفَ يَشَاءُ وَيَجْعَلُهُ كِسَفًا فَتَرَى الْوَدْقَ يَخْرُجُ مِنْ خِلَالِهِ ۖ فَإِذَا أَصَابَ بِهِ مَن يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ إِذَا هُمْ يَسْتَبْشِرُونَ
وَإِن كَانُوا مِن قَبْلِ أَن يُنَزَّلَ عَلَيْهِم مِّن قَبْلِهِ لَمُبْلِسِينَ
فَانظُرْ إِلَىٰ آثَارِ رَحْمَتِ اللَّهِ كَيْفَ يُحْيِي الْأَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَا ۚ إِنَّ ذَٰلِكَ لَمُحْيِي الْمَوْتَىٰ ۖ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
وَلَئِنْ أَرْسَلْنَا رِيحًا فَرَأَوْهُ مُصْفَرًّا لَّظَلُّوا مِن بَعْدِهِ يَكْفُرُونَ
فَإِنَّكَ لَا تُسْمِعُ الْمَوْتَىٰ وَلَا تُسْمِعُ الصُّمَّ الدُّعَاءَ إِذَا وَلَّوْا مُدْبِرِينَ
وَمَا أَنتَ بِهَادِ الْعُمْيِ عَن ضَلَالَتِهِمْ ۖ إِن تُسْمِعُ إِلَّا مَن يُؤْمِنُ بِآيَاتِنَا فَهُم مُّسْلِمُونَ

चमकी ख़राबी ख़ुश्की और तरी में(1)
(1) शिर्क और गुमराही के कारण दुष्काल, और कम वर्षा और पैदावार में कमी और खेतियों की ख़राबी और व्यापार में घाटा और आग लगने की घटनाओं में वृद्धि, और आदमियों और जानवरों में मौत और डूबना और हर चीज़ में से बरकत का उठ जाना.

उन बुराइयों से जो लोगों के हाथों ने कमाई ताकि उन्हें कुछ कौतुकों(बुरे कामों) का मज़ा चखाए कहीं वो बाज़ आएं(2){41}
(2) कुफ़्र और गुनाहों से, और तौबह करें.

तुम फ़रमाओ ज़मीन में चल कर देखो कैसा अंजाम हुआ अगलों का, उनमें बहुत मुश्रिक थे(3){42}
(3) अपने शिर्क के कारण हलाक किये गए. उनकी मंज़िलें और मकान वीरान पड़े हैं उन्हें देखकर सबक़ पकड़ो.

तो अपना मुंह सीधा कर इबादत के लिये (4)
(4) यानी दीने इस्लाम पर मज़बूती के साथ क़ायम रहो.

पहले इसके कि वह दिन आए जिसे अल्लाह की तरफ़ से टलना नहीं(5)
(5) यानी क़यामत के दिन.

उस दिन अलग फट जाएंगे (6){43}
(6) यानी हिसाब के बाद अलग अलग हो जाएंगे. जन्नती जन्नत की तरफ़ जाएंगे और दोज़ख़ी दोज़ख़ की तरफ़.

जो कुफ़्र करें उसके कुफ़्र का वबाल उसी पर और जो अच्छा काम करें वो अपने ही लिये तैयारी कर रहे हैं(7){44}
(7) कि जन्नत के दर्ज़ों में राहत और आराम पाएं.

ताकि सिला दे(8)
(8) और सवाब अता फ़रमाए अल्लाह तआला.

उन्हें जो ईमान लाए और अच्छे काम किये अपने फ़ज़्ल से, बेशक वह काफ़िरों को दोस्त नहीं रखता {45} और उसकी निशानियों से है कि हवाएं भेजता है ख़ुशख़बरी सुनाती (9)
(9) बारिश और पैदावार की बहुतात का.

और इसलिये कि तुम्हें अपनी रहमत का ज़ायक़ा दे और इसलिये कि किश्ती (10)
(10) दरिया में उन हवाओ से.

उसके हुक्म से चले और इसलिये कि उसका फ़ज़्ल तलाश करो(11)
(11) यानी समु्द्री तिजारतों से रोज़ी हासिल करो.

और इसलिये कि तुम हक़ मानो(12){46}
(12) इन नेअमतों का और अल्लाह की तौहीद क़ुबूल करो.

और बेशक हमने पहले कितने रसूल उनकी क़ौम की तरफ़ भेजे तो वो उनके पास खुली निशानियाँ लाए (13)
(13) जो उन रसूलों की रिसालत के सच्चे होने पर खुले प्रमाण थे. तो उस क़ौम में से कुछ ईमान लाए, कुछ ने कुफ़्र किया.

फिर हमने मुजरिमों से बदला लिया(14)
(14) कि दुनिया में उन्हें अज़ाब करके हलाक कर दिया.

और हमारे करम के ज़िम्मे पर है मुसलमानों की मदद फ़रमाना(15) {47}
(15) यानी उन्हें निजात देना और काफ़िरों को हलाक करना. इसमें नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को आख़िरत की कामयाबी और दुश्मनों पर जीत की ख़ुशखबरी दी गई है. तिरमिज़ी की हदीस में है जो मुसलमान अपने भाई की आबरू बचाएगा अल्लाह तआला उसे रोज़े क़यामत जहन्नम की आग से बचाएगा. यह फ़रमाकर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने यह आयत पढ़ी “काना हक़्क़त अलैना नस्रूल मूमिनीन” और हमारे करम के ज़िम्मे पर है मुसलमानों की मदद फ़रमाना.

अल्लाह है कि भेजता है हवाएं कि उभारती हैं बादल फिर उसे फैला देता है आसमान में जैसा चाहे(16)
(16) थोड़ा या बहुत.

और उसे पारा पारा करता है(17)
(17) यानी कभी तो अल्लाह तआला घटा टोप बादल भेज देता है जिससे आसमान घिरा हुआ मालूम होता है और कभी अलग अलग टुकड़े.

तो तू देखे कि उसके बीच में से मेंह निकल रहा है फिर जब उसे पहुंचाता है(18)
(18) यानी मेंह को.

अपने बन्दों में जिसकी तरफ़ चाहे जभी वो ख़ुशियाँ मनाते हैं {48} अगरचे उसके उतारने से पहले आस तोड़े हुए थे {49} तो अल्लाह की रहमत के असर देखो (19)
(19) यानी बारिश के असर जो उसपर होते हैं कि बारिश ज़मीन की प्यास बुझाती है, उससे सब्ज़ा हरियाली निकालती है, हरियाली से फल पैदा होते हैं, फलों में ग़िज़ाइयत होती है और उससे जानदारों के शरीर को मदद पहुंचती है. और यह देखों कि अल्लाह तआला ये हरियाली और फल पैदा करके….

किस तरह ज़मीन को जिलाता है उसके मरे पीछे (20)
(20) और सूखे मैदान को हरा भरा कर देता है, जिसकी यह क़ुदरत है….

बेशक वह मुर्दों को ज़िन्दा करेगा, और वह सब कुछ कर सकता है {50} और अगर हम कोई हवा भेजे (21)
(21) ऐसी जो ख़ेती और हरियाली के लिये हानिकारक हो.

जिससे वो खेती को ज़र्द देखें (22)
(22) बाद इसके कि वह हरी भरी तरो ताज़ा थी.

तो ज़रूर इसके बाद नाशुक्री करने लगें(23) {51}
(23) यानी खेती ज़र्द होने के बाद नाशुक्री करने लगें और पहली नेअमत से भी मुकर जाएं. ये हैं कि इन लोगों की हालत यह है  कि जब उन्हें रहमत पहुंचती है, रिज़्क़ मिलता है, ख़ुश हो जाते हैं और जब काई सख़्ती आती है खेती ख़राब होती है तो पहली नेअमतों से भी मुकर जाते हैं. चाहिये तो यह था कि अल्लाह तआला पर भरोसा करते और जब नेअमत पहुंचती, शुक्र बजा लाते और जब बला आती सब्र करते और दुआ व इस्तिग़फ़ार में लग जाते. इसके बाद अल्लाह तआला अपने हबीबे करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तसल्ली फ़रमाता है कि आप इन लोगों की मेहरूमी और इनके ईमान न लाने पर रंज न करें.

इसलिये कि तुम मु्र्दों को नहीं सुनाते (24)
(24) यानी जिनके दिल मर चुके और उनसे किसी तरह सच्चाई क़ुबूल करने की आशा नहीं रही.

और न बहरों को पुकारना सुनाओ जब वो पीठ देकर फिरें(25){52}
(25) यानी हक़ के सुनने से बेहरें हों और बेहरें भी ऐसे कि पीठ देकर फिर गए. उनसे किसी तरह समझने की उम्मीद नहीं.

और न तुम अंधों को(26)
(26) यहाँ अन्धों से भी दिल के अंधे मुराद हैं. इस आयत से कुछ लोगों ने मुर्दों के न सुनने को साबित किया है मगर यह तर्क सही नहीं है क्योंकि यहाँ मुर्दों से मुराद काफ़िर हैं जो दुनियावी ज़िन्दगी तो रखते हैं मगर नसीहत से फ़ायदा नहीं उठाते इसलिये उन्हें मुर्दों से मिसाल दी गई है जो कर्मभूमि से गुज़र गए और वो नसीहत से लाभ नहीं उठा सकते. इसलिये आयत से मुर्दों के न सुनने पर सनद लाना दुरूस्त नहीं है और बहुत सी हदीसों में मुर्दों का सुनना और अपनी क़ब्रों पर ज़ियारत के लिये आने वालों को पहचानना साबित है.

उनकी गुमराही से राह पर लाओ, तो तुम उसी को सुनाते हो जो हमारी आयतों पर ईमान लाए तो वो गर्दन रखे हुए हैं{53}

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