सूरए रूम- दूसरा रूकू

30 – सूरए रूम- दूसरा रूकू

اللَّهُ يَبْدَأُ الْخَلْقَ ثُمَّ يُعِيدُهُ ثُمَّ إِلَيْهِ تُرْجَعُونَ
وَيَوْمَ تَقُومُ السَّاعَةُ يُبْلِسُ الْمُجْرِمُونَ
وَلَمْ يَكُن لَّهُم مِّن شُرَكَائِهِمْ شُفَعَاءُ وَكَانُوا بِشُرَكَائِهِمْ كَافِرِينَ
وَيَوْمَ تَقُومُ السَّاعَةُ يَوْمَئِذٍ يَتَفَرَّقُونَ
فَأَمَّا الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ فَهُمْ فِي رَوْضَةٍ يُحْبَرُونَ
وَأَمَّا الَّذِينَ كَفَرُوا وَكَذَّبُوا بِآيَاتِنَا وَلِقَاءِ الْآخِرَةِ فَأُولَٰئِكَ فِي الْعَذَابِ مُحْضَرُونَ
فَسُبْحَانَ اللَّهِ حِينَ تُمْسُونَ وَحِينَ تُصْبِحُونَ
وَلَهُ الْحَمْدُ فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَعَشِيًّا وَحِينَ تُظْهِرُونَ
يُخْرِجُ الْحَيَّ مِنَ الْمَيِّتِ وَيُخْرِجُ الْمَيِّتَ مِنَ الْحَيِّ وَيُحْيِي الْأَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَا ۚ وَكَذَٰلِكَ تُخْرَجُونَ

अल्लाह पहले बनाता है फिर दोबारा बनाएगा(1)
(1) यानी मौत के बाद ज़िन्दा करके.

फिर उसकी तरफ़ फिरोगे (2){11}
(2) तो कर्मो की जज़ा देगा.

और जिस दिन क़यामत क़ायम होगी मुजरिमों की आस टूट जाएगी(3){12}
(3)  और किसी नफ़ा और भलाई की उम्मीद बाक़ी न रहेगी. कुछ मुफ़स्सिरों ने ये मानी बयान किये हैं कि उनका कलाम टूट जाएगा और वो चुप रह जाएंगे क्योंकि उनके पास पेश करने के क़ाबिल कोई हुज्जत न होगी. कुछ मुफ़स्सिरों ने ये मानी बयान किये हैं कि वो रूस्वा होंगे.

और उनके शरीक(4)
(4) यानी बुत, जिन्हें वो पूजते थे.

उनके सिफ़ारिशी न होंगे और वो अपने शरीकों से इनकारी हो जाएंगे {13} और जिस दिन क़यामत क़ायम होगी उस दिन अलग हो जाएंगे (5){14}
(5) मूमिन और काफ़िर फिर भी जमा न होंगे.

तो वो जो ईमान लाए और अच्छे काम किये बाग़ की कियारी में उनकी ख़ातिरदारी होगी(6){15}
(6) यानी जन्नत में उनका सत्कार किया जाएगा जिससे वो ख़ुश होंगे. यह ख़ातिरदारी जन्नती नेअमतों के साथ होगी. एक क़ौल यह भी है कि इससे मुराद समाअ है कि उन्हें ख़ुशियों भरे गीत सुनाए जाएंगे जो अल्लाह तआला की तस्बीह पर आधारित होंगे.

और वो जो काफ़िर हुए और हमारी आयतें और आख़िरत का मिलना झुटलाया(7)
(7) मरने के बाद उठाए जाने और हिसाब किताब के इन्कारी हुए.

वो अज़ाब में ला धरे (डाल दिये) जाएंगे(8){16}
(8) न उस अज़ाब में कटौती हो न उस से कभी निकले.

तो अल्लाह की पाकी बोलो(9)
(9) पाकी बोलने से या तो अल्लाह तआला की तस्बीह और स्तुति मुराद है, और इसकी हदीसों में बहुत फ़ज़ीलतें आई है या इससे नमाज़ मुराद है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से पूछा गया कि क्या पाँचों वक़्तों की नमाज़ों का बयान क़ुरआन शरीफ़ में है. फ़रमाया हाँ और ये आयतें पढ़ीं और फ़रमाया कि इन में पाँचों नमाज़ें और उनके औक़ात बयान किये गए हैं.

जब शाम करो(10)
(10) इसमें मग़रिब और इशा की नमाज़ें आ गई.

और जब सुब्ह हो(11){17}
(11)  यह फ़ज्र की नमाज़ हुई.

और उसी की तारीफ़ है आसमानों, और ज़मीन में(12)
(12) यानी आसमान और ज़मीन वालों पर उसकी हम्द लाज़िम है.

और कुछ दिन रहे(13)
(13) यानी तस्बीह करो कुछ दिन रहे. यह नमाज़ें अस्र हुई.

और जब तुम्हें दोपहर हो(14){18}
(14) यह ज़ोहर की नमाज़ हुई. नमाज़ के लिये ये पाँच वक़्त निर्धारित फ़रमाए गए, इसलिये कि सबसे बेहतर काम वह है जो हमेशा होता है, और इन्सान यह क़ुदरत नहीं रखता कि अपने सारे औक़ात सारा समय नमाज़ में खर्च करे क्योंकि उसके साथ खाने पीने वग़ैरह की ज़रूरतें हैं तो अल्लाह तआला ने बन्दे पर इबादत में कटौती फ़रमाई और दिन के शुरू, मध्य और अंत में और रात के शुरू और अन्त में नमाज़ें मुक़र्रर कीं ताकि उस समय में नमाज़ में लगे रहना हमेशा की इबादत के हुक्म में हो (मदारिक व ख़ाज़िन)

वह ज़िन्दा को निकालता है मुर्दे से (15)
(15) जैसे कि पक्षी को अन्डे से, और इन्सान को नुत्फ़े से, और मूमिन को काफ़िर से.

और मुर्दे को निकालता है ज़िन्दा से(16)
(16) जैसे कि अन्डे को पक्षी से, नुत्फ़े को इन्सान से, काफ़िर को मूमिन से.

और ज़मीन को जिलाता है उसके मरे पीछे(17)
(17) यानी सूख जाने के बाद मेंह बरसाकर सब्ज़ा उगा कर.

और यूंही तुम निकाले जाओगे (18){19}
(18) कब्रों से उठाए जाने और हिसाब के लिये.

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