सूरए रूम- छटा रूकू

30 – सूरए रूम- छटा रूकू

۞ اللَّهُ الَّذِي خَلَقَكُم مِّن ضَعْفٍ ثُمَّ جَعَلَ مِن بَعْدِ ضَعْفٍ قُوَّةً ثُمَّ جَعَلَ مِن بَعْدِ قُوَّةٍ ضَعْفًا وَشَيْبَةً ۚ يَخْلُقُ مَا يَشَاءُ ۖ وَهُوَ الْعَلِيمُ الْقَدِيرُ
وَيَوْمَ تَقُومُ السَّاعَةُ يُقْسِمُ الْمُجْرِمُونَ مَا لَبِثُوا غَيْرَ سَاعَةٍ ۚ كَذَٰلِكَ كَانُوا يُؤْفَكُونَ
وَقَالَ الَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ وَالْإِيمَانَ لَقَدْ لَبِثْتُمْ فِي كِتَابِ اللَّهِ إِلَىٰ يَوْمِ الْبَعْثِ ۖ فَهَٰذَا يَوْمُ الْبَعْثِ وَلَٰكِنَّكُمْ كُنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ
فَيَوْمَئِذٍ لَّا يَنفَعُ الَّذِينَ ظَلَمُوا مَعْذِرَتُهُمْ وَلَا هُمْ يُسْتَعْتَبُونَ
وَلَقَدْ ضَرَبْنَا لِلنَّاسِ فِي هَٰذَا الْقُرْآنِ مِن كُلِّ مَثَلٍ ۚ وَلَئِن جِئْتَهُم بِآيَةٍ لَّيَقُولَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا إِنْ أَنتُمْ إِلَّا مُبْطِلُونَ
كَذَٰلِكَ يَطْبَعُ اللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِ الَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ
فَاصْبِرْ إِنَّ وَعْدَ اللَّهِ حَقٌّ ۖ وَلَا يَسْتَخِفَّنَّكَ الَّذِينَ لَا يُوقِنُونَ

अल्लाह है जिसने तुम्हें शुरू में कमज़ोर बनाया(1)
(1) इसमें इन्सान के हालात की तरफ़ इशारा है कि पहले वह माँ के पेट में गोश्त का टुकड़ा था फिर  बच्चा होकर पैदा हुआ, दूध पीकर बड़ा हुआ. ये हालात बहुत कमज़ोरी के हैं.

फिर तुम्हें नातवानी से ताक़त बख़्शी (2)
(2) यानी बचपन की कमज़ोरी के बाद जवानी की क़ुव्वत अता फ़रमाई.

फिर क़ुव्वत के बाद(3)
(3) यान जवानी की क़ुव्वत के बाद.

कमज़ोरी और बुढ़ापा दिया, बनाता है जो चाहे (4)
(4) कमज़ोरी और क़ुव्वत और जवानी और बुढ़ापा, ये सब अल्लाह के पैदा किये से हैं.

और वही इल्म व क़ुदरत वाला है {54} और जिस दिन क़यामत क़ायम होगी मुजरिम क़सम खाएंगे कि न रहे थे मगर एक घड़ी(5)
(5) यानी आख़िरत को देखकर उसको दुनिया या क़ब्र में रहने की मुद्दत बहुत थोड़ी मालूम होती होगी इसलिये वो उस मुद्दत को एक पल से तअबीर करेंगे.

वो ऐसे ही औंधे जाते थे (6) {55}
(6) यानी ऐसे ही दुनिया में ग़लत और बातिल बातों पर जमते और सच्चाई से फिरते थे और दोबारा उठाए जाने का इन्कार करते थे जैसे कि अब क़ब्र या दुनिया में ठहरने की मुद्दत को क़सम खाकर एक घड़ी बता रहे हैं. उनकी इस क़सम से अल्लाह तआला उन्हें सारे मेहशर वालों के सामने रूस्वा करेगा और सब देखेंगे कि ऐसी आम भीड़ में क़सम खाकर ऐसा खुला झूट बोल रहे हैं.

और बोले वो जिन को इल्म और ईमान मिला (7)
(7) यानी नबी और फ़रिश्ते और ईमान वाले उनका रद करेंगे और फ़रमाएंगे कि तुम झूट कहते हो.

बेशक तुम रहे अल्लाह के लिखे हुए में(8)
(8) यानी जो अल्लाह तआला ने अपने इल्म में लौहे मेहफ़ूज़ में लिखा उसी के अनुसार तुम क़ब्रों में रहे.

उठने के दिन तक, तो यह है वह दिन उठने का(9)
(9) जिसके तुम दुनिया में इन्कारी थे.

लेकिन तुम न जानते थे(10){56}
(10) दुनिया में, कि वह हक़ है, ज़रूर वाक़े होगा. अब तुमने जाना कि वह दिन आ गया और उसका आना हक़ था तो इस वक़्त का जानना तुम्हें नफ़ा न देगा जैसा कि अल्लाह तआला फ़रमाता है.

तो उस दिन ज़ालिमों को नफ़ा न देगी उनकी मअज़िरत और न उनसे कोई राज़ी करना मांगे(11){57}
(11) यानी उससे यह कहा जाए कि तौबह करके अपने रब को राज़ी करो जैसा कि दुनिया में उनसे तौबह तलब की जाती थी.

और बेशक हमने लोगों के लिये इस क़ुरआन में हर क़िस्म की मिसाल बयान फ़रमाई(12)
(12)  ताकि उन्हें तस्बीह हो और डराना अपनी चरम-सीमा को पहुंचे. लेकिन उन्होंने अपने दिल की कालिख और सख़्त दिली के कारण कुछ भी फ़ायदा न उठाया बल्कि जब कोई क़ुरआनी आयत आई, उसको झुटलाया और उसका इन्कार किया.

और अगर तुम उनके पास कोई निशानी लाओ तो ज़रूर काफ़िर कहेंगे तुम तो नहीं मगर असत्य पर {58} यूंही मोहर कर देता है अल्लाह ज़ाहिलों के दिलों पर (13){59}
(13)जिन्हें जानता है कि वो गुमराही इख़्तियार करेंगे और हक़ वालों को बातिल पर बताएंगे.

तो सब्र करो (14)
(14)उनकी यातनाओं और दुश्मनी पर.

बेशक अल्लाह का वादा सच्चा है(15)
(15) आपकी मदद फ़रमाने का और दीने इस्लाम को सारे दीनों पर ग़ालिब करने का.

और तुम्हें सुबुक (नीचा दिखाना) न कर दें वो जो यक़ीन नहीं रखते(16){60}
(16) यानी ये लोग जिन्हें आख़िरत का यक़ीन नहीं है और उठाए जाने और हिसाब के इन्कारी हैं और उनकी नालायक हरकतें आपके लिये ग़ुस्से और दुख का कारण न हों और ऐसा न हो कि आप उनके हक़ में अज़ाब की दुआ करने में जल्दी फ़रमाएं.

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