सूरए रूम- चौथा रूकू

30 – सूरए रूम- चौथा रूकू

ضَرَبَ لَكُم مَّثَلًا مِّنْ أَنفُسِكُمْ ۖ هَل لَّكُم مِّن مَّا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُم مِّن شُرَكَاءَ فِي مَا رَزَقْنَاكُمْ فَأَنتُمْ فِيهِ سَوَاءٌ تَخَافُونَهُمْ كَخِيفَتِكُمْ أَنفُسَكُمْ ۚ كَذَٰلِكَ نُفَصِّلُ الْآيَاتِ لِقَوْمٍ يَعْقِلُونَ
بَلِ اتَّبَعَ الَّذِينَ ظَلَمُوا أَهْوَاءَهُم بِغَيْرِ عِلْمٍ ۖ فَمَن يَهْدِي مَنْ أَضَلَّ اللَّهُ ۖ وَمَا لَهُم مِّن نَّاصِرِينَ
فَأَقِمْ وَجْهَكَ لِلدِّينِ حَنِيفًا ۚ فِطْرَتَ اللَّهِ الَّتِي فَطَرَ النَّاسَ عَلَيْهَا ۚ لَا تَبْدِيلَ لِخَلْقِ اللَّهِ ۚ ذَٰلِكَ الدِّينُ الْقَيِّمُ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ
۞ مُنِيبِينَ إِلَيْهِ وَاتَّقُوهُ وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَلَا تَكُونُوا مِنَ الْمُشْرِكِينَ
مِنَ الَّذِينَ فَرَّقُوا دِينَهُمْ وَكَانُوا شِيَعًا ۖ كُلُّ حِزْبٍ بِمَا لَدَيْهِمْ فَرِحُونَ
وَإِذَا مَسَّ النَّاسَ ضُرٌّ دَعَوْا رَبَّهُم مُّنِيبِينَ إِلَيْهِ ثُمَّ إِذَا أَذَاقَهُم مِّنْهُ رَحْمَةً إِذَا فَرِيقٌ مِّنْهُم بِرَبِّهِمْ يُشْرِكُونَ
لِيَكْفُرُوا بِمَا آتَيْنَاهُمْ ۚ فَتَمَتَّعُوا فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ
أَمْ أَنزَلْنَا عَلَيْهِمْ سُلْطَانًا فَهُوَ يَتَكَلَّمُ بِمَا كَانُوا بِهِ يُشْرِكُونَ
وَإِذَا أَذَقْنَا النَّاسَ رَحْمَةً فَرِحُوا بِهَا ۖ وَإِن تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ إِذَا هُمْ يَقْنَطُونَ
أَوَلَمْ يَرَوْا أَنَّ اللَّهَ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَن يَشَاءُ وَيَقْدِرُ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِّقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ
فَآتِ ذَا الْقُرْبَىٰ حَقَّهُ وَالْمِسْكِينَ وَابْنَ السَّبِيلِ ۚ ذَٰلِكَ خَيْرٌ لِّلَّذِينَ يُرِيدُونَ وَجْهَ اللَّهِ ۖ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ
وَمَا آتَيْتُم مِّن رِّبًا لِّيَرْبُوَ فِي أَمْوَالِ النَّاسِ فَلَا يَرْبُو عِندَ اللَّهِ ۖ وَمَا آتَيْتُم مِّن زَكَاةٍ تُرِيدُونَ وَجْهَ اللَّهِ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُضْعِفُونَ
اللَّهُ الَّذِي خَلَقَكُمْ ثُمَّ رَزَقَكُمْ ثُمَّ يُمِيتُكُمْ ثُمَّ يُحْيِيكُمْ ۖ هَلْ مِن شُرَكَائِكُم مَّن يَفْعَلُ مِن ذَٰلِكُم مِّن شَيْءٍ ۚ سُبْحَانَهُ وَتَعَالَىٰ عَمَّا يُشْرِكُونَ

तुम्हारे लिये(1)
(1) ऐ मुश्रिकों!

एक कहावत बयान फ़रमाता है ख़ुद तुम्हारे अपने हाल से(2)
(2) वह कहावत यह है.

क्या तुम्हारे हाथ के माल ग़ुलामों में से कुछ शरीक हैं (3)
(3) यानी क्या तुम्हारे ग़ुलाम तुम्हारे साझी हैं.

उसमें जो हमने तुम्हें रोज़ी दी(4)
(4) माल-मत्ता वग़ैरह.

तो तुम सब उसमें बराबर हो (5)
(5) यानी मालिक और सेवक को उस माल -मत्ता में बराबर का अधिकार हो ऐसा कि…

तुम उनसे डरो(6)
(6) अपने माल-मत्ता में, बग़ैर उन ग़ुलामों की इजाज़त के ख़र्च करने से.

जैसे आपस में एक दूसरे से डरते हो(7)
(7) मक़सद यह है कि तुम किसी तरह अपने ग़ुलामों को अपना शरीक बनाना गवारा नहीं करते तो कितना ज़ुल्म है कि अल्लाह तआला के ग़ुलामों को उसका शरीक क़रार दो. ऐ मुश्रिकों! तुम अल्लाह तआला के सिवा जिन्हें अपना मअबूद ठहराते हो वो उसके बन्दे और ममलूक हैं.

हम ऐसी मुफ़स्सल निशानियां बयान फ़रमाते हैं अक़्ल वालों के लिये{28} बल्कि ज़ालिम(8)
(8) जिन्हों ने शिर्क करके अपनी जानों पर बड़ा भारी ज़ुल्म किया है.

अपनी ख्वाहिशों के पीछे हो लिये बेजाने(9)
(9) जिहालत से.

तो उसे कौन हिदायत करे जिसे ख़ुदा ने गुमराह किया(10)
(10) यानी कोई उसका हिदायत करने वाला नहीं.

और उनका कोई मददगार नहीं(11){29}
(11) जो उन्हें अल्लाह के अज़ाब से बचा सके.

तो अपना मुंह सीधा करो अल्लाह की इताअत (फ़रमाँबरदारी) के लिये एक अकेले उसी के होकर (12)
(12)  यानी सच्चे दिल से अल्लाह के दीन पर दृढ़ता के साथ क़ायम रहो.

अल्लाह की डाली हुई बिना (नींव) जिस पर लोगों को पैदा किया(13)
(13) फ़ितरत से मुराद दीने इस्लाम है. मानी ये हैं कि अल्लाह तआला ने सृष्टि को ईमान पर पैदा किया जैसा कि बुख़ारी और मुस्लिम की हदीस में है कि हर बच्चा फ़ितरत पर पैदा किया जाता है यानी उस एहद पर जो ” लस्तो बिरब्बिकुम”  यानी क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ फ़रमाकर लिया गया है. बुख़ारी शरीफ़ की हदीस में है फिर उसके माँ बाप उसे यहूदी, ईसाई  या मजूसी बना लेते हें. इस आयत में हुक्म दिया गया कि अल्लाह के दीन पर क़ायम रहो जिसपर अल्लाह तआला ने सृष्टि को पैदा किया है.

अल्लाह की बनाई चीज़ न बदलना(14)
(14) यानी अल्लाह के दीन पर क़ायम रहना.

यही सीधा दीन है, मगर बहुत लोग नहीं जानते(15) {30}
(15) उसकी हक़ीक़त को, तो इस दीन पर क़ायम रहो.

उसकी तरफ़ रूजू (तवज्जह) लाते हुए(16)
(16) यानी अल्लाह तआला की तरफ़ तौबह और फ़रमाँबरदारी के साथ.

और उससे डरो और नमाज़ क़ायम रखो और मुश्रिकों से न हो{31} उनमें से जिन्होंने अपने दीन को  टुकड़े टुकड़े कर दिया(17)
(17) मअबूद के बारे में मतभेद करके.

और हो गए गिरोह गिरोह, हर गिरोह जो उसके पास है उसी पर ख़ुश है (18){32}
(18) और बातिल को सच्चाई गुमान करता है.

और जब लोगों को तकलीफ़ पहुंचती है (19)
(19) बीमारी की या दुष्काल की या इसके सिवा और कोई.

तो अपने रब को पुकारते हें उसकी तरफ़ रूजू लाते हुए फिर जब वह उन्हें अपने पास से रेहमत का मज़ा दता है(20)
(20) उस तकलीफ़ से छुटकारा दिलाता है और राहत अता फ़रमाता है.

जभी उनमें से एक गिरोह अपने रब का शरीक ठहराने लगता है {33} कि हमारे दिये की नाशुक्री करें तो बरत लो (21)
(21)  दुनियावी नेअमतों को थोड़े दिन.

अब क़रीब जानना चाहते हो(22){34}
(22) कि आख़िरत में तुम्हारा क्या हाल होता है और इस दुनिया के चाहने का नतीजा क्या निकलने वाला है.

या हमने उनपर कोई सनद उतारी (23)
(23) कोई हुज्जत या कोई किताब.

कि वह उन्हें हमारे शरीक बता रही है(24) {35}
(24) और शिर्क करने का हुक्म देती है़ ऐसा नहीं है. न कोई हुज्जत है न कोई सनद (प्रमाण)

और जब हम लोगों को रहमत का मज़ा देते हैं  (25)
(25) यानी तन्दुरूस्ती और रिज़्क़ की ज़ियादती का.

उस पर ख़ुश हो जाते हैं(26)
(26) और इतराते हैं.

और अगर उन्हें कोई बुराई पहुंचे (27)
(27) दुष्काल या डर या और कोई बदला.

बदला उसका जो उनके हाथों ने भेजा(28)
(28) यानी गुमराहियों और उनके गुनाहों का.

जभी वो नाऊम्मीद हो जाते हैं(29){36}
(29) अल्लाह तआला की रहमत से और यह बात मूमिन की शान के ख़िलाफ़ है क्योंकि मूमिन का हाल यह है कि जब उसे नेअमत मिलती हैं तो शुक्र-गुज़ारी करता है और सख़्ती होती है तो अल्लाह तआला की रहमत का उम्मीदवार रहता है.

और क्या उन्होंने न देखा कि अल्लाह रिज़्क़ वसीअ फ़रमाता है जिसके लिये चाहे और तंगी फ़रमाता है जिसके लिये चाहे, बेशक इसमें निशानियाँ हैं ईमान वालों के लिये {37} तो रिश्तेदारों को उसका हक़ दो(30)
(30)उसके साथ सुलूक और एहसान करो.

और मिस्कीन (दरिद्र) और मुसाफ़िर को(31)
(31) उनके हक़ दो, सदक़ा देकर और मेहमान नवाज़ी करके. इस आयत से महारिम के नफ़क़े का वुजूब साबित होता है. (मदारिक)

यह बेहतर है उनके लिये जो अल्लाह की रज़ा चाहते हैं(32)
(32) और अल्लाह तआला से सवाब के तालिब हैं.

और उन्हीं का काम बना {38} और तुम जो चीज़ ज़्यादा लेने को दो कि देने वाले के माल बढ़ें तो वह अल्लाह के यहाँ न बढ़ेगी (33)
(33) लोगों का तरीक़ा था कि वो दोस्त अहबाब और पहचान वालों को या और किसी शख़्स को इस नियत से हदिया देते थे कि वह उन्हें उससे ज़्यादा देगा. यह जायज़ तो है लेकिन इसपर सवाब न मिलेगा और इसमें बरकत न होगी क्योंकि यह अमल केवल अल्लाह तआला की ख़ुशी के लिये नहीं हुआ.

और जो तुम ख़ैरात दो अल्लाह की रज़ा चाहते हुए (34)
(34) न उससे बदला लेना उद्देश्य हो न ज़ाहिरी दिखावा.

तो उन्हीं के दूने हैं(35) {39}
(35) उनका अज्र और सवाब ज़्यादा होगा. एक नेकी का दस गुना ज़्यादा दिया जाएगा.

अल्लाह है जिसने तुम्हें पैदा किया फिर तुम्हें रोज़ी दी फिर तुम्हें मारेगा फिर तुम्हें जिलाएगा(36)
(36) पैदा करना, रोज़ी देना, मारना, जिलाना ये सब काम अल्लाह ही के हैं.

क्या तुम्हारे शरीकों में(37)
(37) यानी बुतों में जिन्हें तुम अल्लाह तआला का शरीक ठहराते हो उन में….

भी कोई ऐसा है जो इन कामों में से कुछ करे(38)
(38) उसके जवाब से. मुश्रिक आजिज़ हुए और उन्हें दम मारने की मजाल न हुई, तो फ़रमाता है.
पाकी और बरतरी है उसे उनके शिर्क से{40}

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