29 – सूरए अन्कबूत- सातवाँ रूकू

29 – सूरए अन्कबूत- सातवाँ रूकू

وَمَا هَٰذِهِ الْحَيَاةُ الدُّنْيَا إِلَّا لَهْوٌ وَلَعِبٌ ۚ وَإِنَّ الدَّارَ الْآخِرَةَ لَهِيَ الْحَيَوَانُ ۚ لَوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ
فَإِذَا رَكِبُوا فِي الْفُلْكِ دَعَوُا اللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ فَلَمَّا نَجَّاهُمْ إِلَى الْبَرِّ إِذَا هُمْ يُشْرِكُونَ
لِيَكْفُرُوا بِمَا آتَيْنَاهُمْ وَلِيَتَمَتَّعُوا ۖ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ
أَوَلَمْ يَرَوْا أَنَّا جَعَلْنَا حَرَمًا آمِنًا وَيُتَخَطَّفُ النَّاسُ مِنْ حَوْلِهِمْ ۚ أَفَبِالْبَاطِلِ يُؤْمِنُونَ وَبِنِعْمَةِ اللَّهِ يَكْفُرُونَ
وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرَىٰ عَلَى اللَّهِ كَذِبًا أَوْ كَذَّبَ بِالْحَقِّ لَمَّا جَاءَهُ ۚ أَلَيْسَ فِي جَهَنَّمَ مَثْوًى لِّلْكَافِرِينَ
وَالَّذِينَ جَاهَدُوا فِينَا لَنَهْدِيَنَّهُمْ سُبُلَنَا ۚ وَإِنَّ اللَّهَ لَمَعَ الْمُحْسِنِينَ

और यह दुनिया की ज़िन्दगी तो नहीं मगर खेल कूद(1)
(1) कि जैसे बच्चे घड़ी भर खेलते हैं, खेल में दिल लगाते हैं फिर उस सब को छोड़कर चल देते हैं, यही हाल दुनिया का है. बहुत जल्दी इसका पतन होता है और मौत यहाँ से ऐसा ही अलग कर देती है जैसे खेल वाले बच्चे अलग हो जाते हैं.

और बेशक आख़िरत का घर ज़रूर वही सच्ची ज़िन्दगी है(2)
(2) कि वह ज़िन्दगी पायदार है, हमेशा की है. उसमें मौत नहीं. ज़िन्दगी कहलाते के लायक़ वही है.

क्या अच्छा था अगर जानते (3) {64}
(3) दुनिया और आख़िरत की हक़ीक़त, तो नश्वर संसार को आख़िरत की हमेशा रहने वाली ज़िन्दगी पर प्राथामिकता न देते.

फिर जब किश्ती में सवार होते हैं (4)
(4)  और डूबने का डर होता है तो अपने शिर्क और दुश्मनी के बावुजूद बुतों को नहीं पुकारते, बल्कि..

अल्लाह को पुकारते हैं एक उसी पर अक़ीदा (विश्वास) लाकर (5)
(5) कि इस मुसीबत से निजात वही देगा.

फिर जब वह उन्हें ख़ुश्की की तरफ़ बचा लाता है(6)
(6)  और डूबने का डर और परेशानी जाती रहती है, इत्मीनान हासिल होता है.

जभी वो शिर्क करते लगते हैं(7){65}
(7) जिहालत के ज़माने के लोग समन्दरी सफ़र करते वक़्त बुतों को साथ ले जाते थे. जब हवा मुख़ालिफ़ चलती और किश्ती ख़तरे में आती तो बुतों को पानी में फैंक देते और या रब, या रब, पुकारने लगते और अम्न पाने के बाद फिर उसी शिर्क की तरफ़ लौट जाते.

कि नाशुक्री करें हमारी दी हुई नेअमत की(8)
(8) यानी इस मुसीबत से निजात की.

और बरतें(9)
(9) और इससे फ़ायदा उठाएं, मूमिन और नेक बन्दों के विपरीत कि वो अल्लाह तआला की नेअमतों के सच्चे दिल के साथ आभारी रहते हैं और जब ऐसी सूरत पेश आती है और अल्लाह तआला उससे रिहाई देता है तो उसकी फ़रमाँबरदारी में और ज़्यादा लीन हो जाते हैं. मगर काफ़िरों का हाल इससे बिल्कुल मुख़्तिलिफ़ है.

तो अब जानना चाहते हैं(10){66}
(10) नतीजा अपने चरित्र अपने व्यवहार का.

और क्या उन्होंने (11)
(11) यानी मक्के वालों ने.

यह न देखा कि हमने(12)
(12) उनके शहर मक्कए मुकर्रमा की.

हुर्मत (इज़्ज़त) वाली ज़मीन पनाह बनाई(13)
(13) उनके लिये जो उसमें हों.

और उनके आस पास वाले लोग उचक लिये जाते हैं(14)
(14) क़त्ल किये जाते हैं, गिरफ़्तार किये जाते हैं.

तो क्या बातिल (असत्य) पर यक़ीन लाते है(15)
(15) यानी बुतों पर.

और अल्लाह की दी हुई नेअमत से(16)
(16) यानी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से और इस्लाम से कुफ्र करके.

नाशुक्री करते हैं {67} और उससे बढ़कर ज़ालिम कौन जो अल्लाह पर झूट बांधे(17)
(17) उसके लिये शरीक ठहराए.

या हक़ (सत्य) को झुटलाए (18)
(18) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत और क़ुरआन को न माने.

जब वह उसके पास आए, क्या जहन्नम में काफ़िरों का ठिकाना नहीं (19) {68}
(19) बेशक सारे काफ़िरों का ठिकाना जहन्नम ही है.

और जिन्हों ने हमारी राह में कोशिश की ज़रूर हम उन्हें अपने रास्ते दिखा देंगे(20)
(20) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि मानी ये हैं कि जिन्हों ने हमारी राह में कोशिश की हम उन्हें सवाब की राह देंगे. हज़रत जुनैद ने फ़रमाया जो तौबह में कोशिश करेंगे, उन्हें सच्चाई की राह देंगे. हज़रत फ़ुजैल बिन अयाज़ ने फ़रमाया जो इल्म की तलब में कोशिश करेंगे, उन्हें हम अमल की राह देंगे. हज़रत सअद बिन अब्दुल्लाह ने फ़रमाया, जो सुन्नत क़ायम करने में कोशिश करेंगे, हम उन्हें जन्नत की राह दिखा देंगे.

और बेशक अल्लाह नेकों के साथ है(21){69}
(21)  उनकी मदद और नुसरत फ़रमाता है.

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