27 – सूरए नम्ल – सातवाँ रूकू

27 – सूरए नम्ल – सातवाँ रूकू

وَيَوْمَ نَحْشُرُ مِن كُلِّ أُمَّةٍ فَوْجًا مِّمَّن يُكَذِّبُ بِآيَاتِنَا فَهُمْ يُوزَعُونَ
حَتَّىٰ إِذَا جَاءُوا قَالَ أَكَذَّبْتُم بِآيَاتِي وَلَمْ تُحِيطُوا بِهَا عِلْمًا أَمَّاذَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
وَوَقَعَ الْقَوْلُ عَلَيْهِم بِمَا ظَلَمُوا فَهُمْ لَا يَنطِقُونَ
أَلَمْ يَرَوْا أَنَّا جَعَلْنَا اللَّيْلَ لِيَسْكُنُوا فِيهِ وَالنَّهَارَ مُبْصِرًا ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِّقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ
وَيَوْمَ يُنفَخُ فِي الصُّورِ فَفَزِعَ مَن فِي السَّمَاوَاتِ وَمَن فِي الْأَرْضِ إِلَّا مَن شَاءَ اللَّهُ ۚ وَكُلٌّ أَتَوْهُ دَاخِرِينَ
وَتَرَى الْجِبَالَ تَحْسَبُهَا جَامِدَةً وَهِيَ تَمُرُّ مَرَّ السَّحَابِ ۚ صُنْعَ اللَّهِ الَّذِي أَتْقَنَ كُلَّ شَيْءٍ ۚ إِنَّهُ خَبِيرٌ بِمَا تَفْعَلُونَ
مَن جَاءَ بِالْحَسَنَةِ فَلَهُ خَيْرٌ مِّنْهَا وَهُم مِّن فَزَعٍ يَوْمَئِذٍ آمِنُونَ
وَمَن جَاءَ بِالسَّيِّئَةِ فَكُبَّتْ وُجُوهُهُمْ فِي النَّارِ هَلْ تُجْزَوْنَ إِلَّا مَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
إِنَّمَا أُمِرْتُ أَنْ أَعْبُدَ رَبَّ هَٰذِهِ الْبَلْدَةِ الَّذِي حَرَّمَهَا وَلَهُ كُلُّ شَيْءٍ ۖ وَأُمِرْتُ أَنْ أَكُونَ مِنَ الْمُسْلِمِينَ
وَأَنْ أَتْلُوَ الْقُرْآنَ ۖ فَمَنِ اهْتَدَىٰ فَإِنَّمَا يَهْتَدِي لِنَفْسِهِ ۖ وَمَن ضَلَّ فَقُلْ إِنَّمَا أَنَا مِنَ الْمُنذِرِينَ
وَقُلِ الْحَمْدُ لِلَّهِ سَيُرِيكُمْ آيَاتِهِ فَتَعْرِفُونَهَا ۚ وَمَا رَبُّكَ بِغَافِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ

और जिस दिन उठाएंगे हम हर गिरोह में से एक फ़ौज जो हमारी आयतों को झुटलाती है(1)
(1) जो कि हमने अपने नबियों पर उतारीं. फ़ौज से मुराद बड़ी जमाअत है.

तो उनके अगले रोके जाएंगे कि पिछले उनसे आ मिलें{83} यहां तक कि जब सब हाज़िर होंगे(2)
(2) क़यामत के रोज़ हिसाब के मैदान में.

फ़रमाएगा क्या तुम ने मेरी आयतें झूटलाई हालांकि तुम्हारा इल्म उन तक न पहुंचा था(3)
(3) और  तुमने उनकी पहचान हासिल न की थी. बग़ैर सोचे समझे ही उन आयतों का इन्कार कर दिया.

या क्या काम करते थे(4){84}
(4) जब तुमने उन आयतों को भी नहीं सोचा. तुम बेकार तो नहीं पैदा किये गए थे.

और बात पड़ चुकी उनपर (5)
(5) अज़ाब साबित हो चुका.

उनके ज़ुल्म के कारण तो वो अब कुछ नहीं बोलते (6){85}
(6) कि उनके लिये कोई हुज्जत और  कोई गुफ़्तगू बाक़ी नहीं है. एक क़ौल यह भी है कि अज़ाब उनपर इस तरह छा जाएगा कि वो बोल न सकेंगे.

क्या उन्होंने न देखा कि हमने रात बनाई कि उसमें आराम करें और दिन को बनाया सुझाने वाला, बेशक इसमें ज़रूर निशानियां हैं उन लोगों के लिये कि ईमान रखते हैं(7){86}
(7) और  आयत में मरने के बाद उठने पर दलील है इसलिये कि जो दिन की रौशनी को रात के अंधेरे से और  रात के अन्धेरे को दिन के उजाले से बदलने पर क़ादिर है वह मुर्दे को ज़िन्दा करने पर भी क़ादिर है. इसके अलावा रात और  दिन की तबदीली से यह भी मालूम होता है कि उसमें उनकी दुनियावी ज़िन्दगी का इन्तिज़ाम है. तो यह बेकार नहीं किया गया बल्कि इस ज़िन्दगानी के कर्मों पर अज़ाब और  सवाब का दिया जाना हिकमत पर आधारित है और  जब दुनिया कर्मभूमि है तो ज़रूरी है कि एक आख़िरत भी हो, वहाँ की ज़िन्दगानी में यहाँ के कर्मों का बदला मिले.

और जिस दिन फूंका जाएगा सूर(8)
(8) और  उसके फूंकने वाले इस्राफ़ील अलैहिस्सलाम होंगे.

तो घबराए जाएंगे जितने आसमानों में हैं और जितने ज़मीन में हैं(9)
(9) ऐसा घबराना जो मौत का कारण होगा.

मगर जिसे ख़ुदा चाहे(10)
(10) और  जिसके दिल को अल्लाह तआला सुकून अता फ़रमाए. हज़रत अबू हुरैरह रदियल्लाहो अन्हो से रिवायत है कि ये शहीद लोग है जो अपनी तलवारें गलों मे डाले अर्श के चारों तरफ़ हाज़िर होंगे. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया वो शहीद हैं इसलिये कि वो अपने रब के नज़दीक ज़िन्दा हैं. घबराना उनको न पहुंचेगा. एक क़ौल यह है कि सूर फूंके जाने के बाद हज़रत जिब्रईल व मीकाईल व इस्रफ़ील  और  इज्राईल ही बाक़ी रहंगे.

और सब उसके हुज़ूर हाज़िर हुए आजिज़ी (गिड़गिड़ाते) करते (11){87}
(11)  यानी क़यामत के रोज़ सब लोग मरने के बाद ज़िन्दा किये जाएंगे और  हिसाब के मैदान में अल्लाह तआला के सामने आजिज़ी करते हाज़िर होंगे. भूत काल से ताबीर फ़रमाना यक़ीनी तौर पर होने के लिये है.

और तू देखेगा पहाड़ों को, ख़याल करेगा कि वो जमे हुए हैं और वो चलते होंगे बादल की चाल(12)
(12) मानी ये है कि सूर फूंके जाने के समय पहाड़ देखने में तो अपनी जगह स्थिर मालूम होंगे और  हक़ीक़त में वो बादलों की तरह बहुत तेज़ चलते होंगे जैसे कि बादल वग़ैरह बड़े जिस्म चलते हैं, हरकत करते मालूम नहीं होते. यहाँ तक कि वो पहाड़ ज़मीन पर गिरकर उसके बराबर हो जाएंगे. फिर कण कण होकर बिखर जाएंगे.

यह काम है अल्लाह का जिसने हिकमत से बनाई हर चीज़, बेशक उसे ख़बर है तुम्हारे कामों की {88} जो नेकी लाए (13)
(13) नेकी से मुराद तौहीद के कलिमे की गवाही है. कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि अमल की सच्चाई और  कुछ ने कहा कि हर फ़रमाँबरदारी जो अल्लाह तआला के लिये की हो.

उसके लिये इससे बेहतर सिला है(14)
(14) जन्नत और  सवाब.

और उनको उस दिन की घबराहट से अमान है(15) {89}
(15) जो अल्लाह के डर से होगी. पहली घबड़ाहट जिसका ऊपर की आयत में बयान हुआ है, वह इसके अलावा है.

और जो बदी लाए(16)
(16)यानी  शिर्क.

तो उनके मुंह औंधाए गए आग में(17)
(17) यानी वो औंधे मुंह आग में डाले जाएंगे और  जहन्नम के ख़ाज़िन उनसे कहेंगे.

तुम्हें क्या बदला मिलेगा मगर उसी का जो करते थे(18){90}
(18) यानी शिर्क और  गुमराही और  अल्लाह तआला अपने रसूल से फ़रमाएगा कि आप कह दीजिये कि.

मुझे तो यही हुक्म हुआ है कि पूजूं इस शहर के रब को (19)
(19) यानी मक्कए मुकर्रमा के, और  अपनी इबादत उस रब के साथ ख़ास करूं. मक्कए मुकर्रमा का ज़िक्र इसलिये है कि वह नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का वतन और  वही उतरने की जगह है.

जिसने इसे हुर्मत वाला किया है(20)
(20) कि वहाँ न किसी इन्सान का ख़ून बहाया जाए, न कोई शिकार मारा जाए, न वहाँ की घास काटी जाए.

और सब कुछ उसी का है, और मुझे हुक्म हुआ है कि फ़रमांबरदारी में हूँ {91} और यह कि क़ुरआन की तिलावत(पाठ) करूं(21)
(21) अल्लाह की मख़लूक़ को ईमान की तरफ़ बुलाने के लिये.

तो जिसने राह पाई उसने अपने भले को राह पाई(22)
(22) उसका नफ़ा और  सवाब वह पाएगा.

और जो बहके (23)
(23) और अल्लाह के रसूल की फ़रमाँबरदारी न करे और  ईमान न लाए.

तो फ़रमा दो कि मैं तो यही डर सुनाने वाला हूँ(24){92}
(24) मेरे ज़िम्मे पहुंचा देना  था, वह मैंने पूरा किया.

और फ़रमाओ कि सब ख़ूबियां अल्लाह के लिये हैं, बहुत जल्द वह तुम्हें अपनी निशानियां दिखाएगा तो उन्हें पहचान लोगे(25)
(25) इन निशानियों से मुराद चाँद का दो टुकड़ों में बंट जाना वग़ैरह चमत्कार हैं और  वो मुसीबतें जो दुनिया में आई जैसे कि बद्र में काफ़िरों का क़त्ल होना, फ़रिश्तों का उन्हें मारना.
और ऐ मेहबूब तुम्हारा रब ग़ाफ़िल नहीं ऐ लोगो तुम्हारे कर्मों से{93}

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