27 – सूरए नम्ल – पाँचवां रूकू

27 – सूरए नम्ल – पाँचवां रूकू

قُلِ الْحَمْدُ لِلَّهِ وَسَلَامٌ عَلَىٰ عِبَادِهِ الَّذِينَ اصْطَفَىٰ ۗ آللَّهُ خَيْرٌ أَمَّا يُشْرِكُونَ
أَمَّنْ خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ وَأَنزَلَ لَكُم مِّنَ السَّمَاءِ مَاءً فَأَنبَتْنَا بِهِ حَدَائِقَ ذَاتَ بَهْجَةٍ مَّا كَانَ لَكُمْ أَن تُنبِتُوا شَجَرَهَا ۗ أَإِلَٰهٌ مَّعَ اللَّهِ ۚ بَلْ هُمْ قَوْمٌ يَعْدِلُونَ
أَمَّن جَعَلَ الْأَرْضَ قَرَارًا وَجَعَلَ خِلَالَهَا أَنْهَارًا وَجَعَلَ لَهَا رَوَاسِيَ وَجَعَلَ بَيْنَ الْبَحْرَيْنِ حَاجِزًا ۗ أَإِلَٰهٌ مَّعَ اللَّهِ ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
أَمَّن يُجِيبُ الْمُضْطَرَّ إِذَا دَعَاهُ وَيَكْشِفُ السُّوءَ وَيَجْعَلُكُمْ خُلَفَاءَ الْأَرْضِ ۗ أَإِلَٰهٌ مَّعَ اللَّهِ ۚ قَلِيلًا مَّا تَذَكَّرُونَ
مَّن يَهْدِيكُمْ فِي ظُلُمَاتِ الْبَرِّ وَالْبَحْرِ وَمَن يُرْسِلُ الرِّيَاحَ بُشْرًا بَيْنَ يَدَيْ رَحْمَتِهِ ۗ أَإِلَٰهٌ مَّعَ اللَّهِ ۚ تَعَالَى اللَّهُ عَمَّا يُشْرِكُونَ
أَمَّن يَبْدَأُ الْخَلْقَ ثُمَّ يُعِيدُهُ وَمَن يَرْزُقُكُم مِّنَ السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ ۗ أَإِلَٰهٌ مَّعَ اللَّهِ ۚ قُلْ هَاتُوا بُرْهَانَكُمْ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
قُل لَّا يَعْلَمُ مَن فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ الْغَيْبَ إِلَّا اللَّهُ ۚ وَمَا يَشْعُرُونَ أَيَّانَ يُبْعَثُونَ
بَلِ ادَّارَكَ عِلْمُهُمْ فِي الْآخِرَةِ ۚ بَلْ هُمْ فِي شَكٍّ مِّنْهَا ۖ بَلْ هُم مِّنْهَا عَمُونَ

तुम कहो सब ख़ूबियां अल्लाह को(1)
(1) यह सम्बोधन है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को कि पिछली उम्मतों के हलाक पर अल्लाह तआला की हम्द बजा लाएं.

और सलाम उसके चुने हुए बन्दों पर(2)
(2) यानी अम्बिया व मुरसलीन पर. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि चुने हुए बन्दों से हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सहाबा मुराद हैं.

क्या अल्लाह बेहतर(3)
(3) ख़ुदा परस्तों के लिये, जो ख़ास उसकी इबादत करें और उस पर ईमान लाएं और वह उन्हें अज़ाब और हलाकत से बचाए.

या उनके बनाए हुए शरीक(4){59}
(4) यानी बुत, जो अपने पुजारियों के कुछ काम न आ सकें. तो जब उनमें कोई भलाई नहीं, वो कोई नफ़ा नहीं पहुंचा सकते तो उनको पूजना और मअबूद मानना बिल्कुल बेजा है. और इसके बाद कुछ क़िस्में बयान की जाती है जो अल्लाह तआला के एक होने और उसकी सम्पूर्ण क़ुदरत को प्रमाणित करती हैं.

पारा उन्नीस समाप्त
 
बीसवाँ पारा – अम्मन ख़लक़
(सूरए नम्ल – पाँचवां रूकू जारी)

या वह जिसने आसमान और ज़मीन बनाए(5)
(5) अज़ीम-तरीन चीज़ें, जो देखने में आती हैं और अल्लाह तआला की महानता, क्षमता और भरपूर क़ुदरत की दलील हैं, उनका बयान फ़रमाना. मानी ये हैं कि क्या बुत बेहतर हैं या वह जिसने आसमान और ज़मीन जैसी अज़ीम और अजीब मख़लूक़ बनाई.

और तुम्हारे लिये आसमान से पानी उतारा, तो हमने उससे बाग़ उगाए रौनक वाले, तुम्हारी ताक़त न थी कि उनके पेड़ उगाते(6)
(6) यह तुम्हारी क़ुदरत में न था.

क्या अल्लाह के साथ कोई और ख़ुदा है(7)
(7) क्या क़ुदरत के ये प्रमाण देखकर ऐसा कहा जा सकता है. हरगिज़ नहीं. वह वाहिद है, उसके सिवा कोई मअबूद नहीं.

बल्कि वो लोग राह से कतराते हैं(8){60}
(8) जो उसके लिये शरीक ठहराते हैं.

या वह जिसने ज़मीन बसने को बनाई और उसके बीच में नेहरें, निकालीं और उसके लिये लंगर बनाए(9)
(9) भारी पहाड़, जो उसे हरकत से रोकते हैं.

और दोनों समन्दरों मे आड़ रखी(10)
(10) कि ख़ारी मीठे मिलने न पाएं.

क्या अल्लाह के साथ कोई और ख़ुदा है बल्कि उनमें अक्सर ज़ाहिल है(11){61}
(11)  जो अपने रब की तौहीद और उसकी क़ुदरत और शक्ति को नहीं जानते और उस पर ईमान नहीं लाते.

या वह जो लाचार की सुनता है(12)
(12) और हाजत दूर फ़रमाता है.

जब उसे पुकारे और दूर कर देता है बुराई और तुम्हें ज़मीन का वारिस करता है(13)
(13) कि तुम उसमें रहो और एक ज़माने के बाद दूसरे ज़माने में उसका इस्तेमाल करो.

क्या अल्लाह के साथ कोई और ख़ुदा है, बहुत ही कम ध्यान करते हो{62} या वह जो तुम्हें राह दिखाता है(14)
(14) तुम्हादे उद्देश्य और मक़सदों की.

अंधेरियों में ख़ुश्की और तरी की (15)
(15) सितारों से और चिन्हों या निशानियों से.

और वह कि हवाएं भेजता है अपनी रहमत के आगे ख़ुशख़बरी सुनाती(16)
(16) रहमत से मुराद यहाँ बारिश है.

क्या अल्लाह के साथ कोई और ख़ुदा है, बरतर है अल्लाह उनके शिर्क से{63} या वह जो ख़ल्क़(सृष्टि) की शुरूआत फ़रमाता है फिर उसे दोबारा बनाएगा (17)
(17) उसकी मौत के बाद. अगरचे मौत के बाद ज़िन्दा किये जाने को काफ़िर नहीं मानते थे लेकिन जब कि इसपर तर्क और प्रमाण क़ायम हैं तो उनका इक़रार न करना कुछ लिहाज़ के क़ाबिल नहीं बल्कि जब वो शुरू की पैदाइश के क़ाइल हैं तो उन्हें दोबारा पैदाइश या दोहराए जाने को मानना पड़ेगा क्योंकि शुरूआत दोहराए जाने पर भारी प्रमाण रखती है. तो अब उनके लिये इनकार के किसी बहाने की कोई जगह बाक़ी न रही.

और वह जो तुम्हें आसमानों और ज़मीन से रोज़ी देता है, (18)
(18) आसमान से बारिश और ज़मीन से हरियाली.

क्या अल्लाह के साथ कोई और ख़ुदा है, तुम फ़रमाओ कि अपनी दलील लाओ अगर तुम सच्चे हो (19){64}
(19) अपने इस दावे में कि अल्लाह तआला के सिवा और भी मअबूद हैं. तो बताओ जो जो गुण और कमालात ऊपर बयान किये गए वो किस में हैं. और जब अल्लाह के सिवा ऐसा कोई नहीं तो फिर किसी दूसरे को किस तरह मअबूद ठहराते हो. यहाँ “हातू बुरहानकुम” यानी अपनी दलील लाओ फ़रमाकर उनकी लाचारी और बातिल होने का इज़हार मन्ज़ूर है.

तुम फ़रमाओ ग़ैब नहीं जानते जो कोई आसमानों और ज़मीन में है मगर अल्लाह (20)
(20) वही जानने वाला है ग़ैब यानी अज्ञात का. उसको इख़्तियार है जिसे चाहे बताए. चुनांन्चे अपने प्यारे नबियों को बताता है जैसा कि सूरए आले इमरान में है “वमा कानल्लाहो लियुत लिअकुम अलल ग़ैबे वलाकिन्नल्लाहा यजतबी मिर रूसुलिही मैंय यशाओ” यानी अल्लाह की शान नहीं कि तुम्हें गै़ब का इल्म दे. हाँ अल्लाह चुन लेता है अपने रसूलों में से जिसे चाहे. और बहुत सी आयतों में अपने प्यारे रसूलों को ग़ैबी उलूम अता फ़रमाने का बयान फ़रमाया गया और ख़ुद इसी पारे में इससे अगले रूकू में आया है “वमा मिल ग़ाइबतिन फ़िस्समाए वल अर्दे इल्ला फ़ी किताबिम मुबीन” यानी जितने गै़ब हैं आसमान और ज़मीन के सब एक बताने वाली किताब में हैं. यह आयत मुश्रिकों के बारे में उतरी जिन्होंने रसूल करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से क़यामत के आने का वक़्त पूछा था.

और उन्हें ख़बर नहीं कि कब उठाए जाएंगे {65} क्या उनके इल्म का सिलसिला आख़िरत के जानने तक पहुंच गया(21)
(21) और उन्हें क़यामत होने का इल्म और यक़ीन हासिल हो गया, जो वो उसका वक़्त पूछते हैं.

कोई नहीं वो उसकी तरफ़ से शक में हैं(22)बल्कि वो उससे अंधे हैं{66}
(22) उन्हें अब तक क़यामत के आने का यक़ीन नहीं है.

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