27 – सूरए नम्ल – दूसरा रूकू

27 – सूरए नम्ल – दूसरा रूकू

وَلَقَدْ آتَيْنَا دَاوُودَ وَسُلَيْمَانَ عِلْمًا ۖ وَقَالَا الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي فَضَّلَنَا عَلَىٰ كَثِيرٍ مِّنْ عِبَادِهِ الْمُؤْمِنِينَ
وَوَرِثَ سُلَيْمَانُ دَاوُودَ ۖ وَقَالَ يَا أَيُّهَا النَّاسُ عُلِّمْنَا مَنطِقَ الطَّيْرِ وَأُوتِينَا مِن كُلِّ شَيْءٍ ۖ إِنَّ هَٰذَا لَهُوَ الْفَضْلُ الْمُبِينُ
وَحُشِرَ لِسُلَيْمَانَ جُنُودُهُ مِنَ الْجِنِّ وَالْإِنسِ وَالطَّيْرِ فَهُمْ يُوزَعُونَ
حَتَّىٰ إِذَا أَتَوْا عَلَىٰ وَادِ النَّمْلِ قَالَتْ نَمْلَةٌ يَا أَيُّهَا النَّمْلُ ادْخُلُوا مَسَاكِنَكُمْ لَا يَحْطِمَنَّكُمْ سُلَيْمَانُ وَجُنُودُهُ وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ
فَتَبَسَّمَ ضَاحِكًا مِّن قَوْلِهَا وَقَالَ رَبِّ أَوْزِعْنِي أَنْ أَشْكُرَ نِعْمَتَكَ الَّتِي أَنْعَمْتَ عَلَيَّ وَعَلَىٰ وَالِدَيَّ وَأَنْ أَعْمَلَ صَالِحًا تَرْضَاهُ وَأَدْخِلْنِي بِرَحْمَتِكَ فِي عِبَادِكَ الصَّالِحِينَ
وَتَفَقَّدَ الطَّيْرَ فَقَالَ مَا لِيَ لَا أَرَى الْهُدْهُدَ أَمْ كَانَ مِنَ الْغَائِبِينَ
لَأُعَذِّبَنَّهُ عَذَابًا شَدِيدًا أَوْ لَأَذْبَحَنَّهُ أَوْ لَيَأْتِيَنِّي بِسُلْطَانٍ مُّبِينٍ
فَمَكَثَ غَيْرَ بَعِيدٍ فَقَالَ أَحَطتُ بِمَا لَمْ تُحِطْ بِهِ وَجِئْتُكَ مِن سَبَإٍ بِنَبَإٍ يَقِينٍ
إِنِّي وَجَدتُّ امْرَأَةً تَمْلِكُهُمْ وَأُوتِيَتْ مِن كُلِّ شَيْءٍ وَلَهَا عَرْشٌ عَظِيمٌ
جَدتُّهَا وَقَوْمَهَا يَسْجُدُونَ لِلشَّمْسِ مِن دُونِ اللَّهِ وَزَيَّنَ لَهُمُ الشَّيْطَانُ أَعْمَالَهُمْ فَصَدَّهُمْ عَنِ السَّبِيلِ فَهُمْ لَا يَهْتَدُونَ
أَلَّا يَسْجُدُوا لِلَّهِ الَّذِي يُخْرِجُ الْخَبْءَ فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَيَعْلَمُ مَا تُخْفُونَ وَمَا تُعْلِنُونَ
اللَّهُ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ رَبُّ الْعَرْشِ الْعَظِيمِ ۩
۞ قَالَ سَنَنظُرُ أَصَدَقْتَ أَمْ كُنتَ مِنَ الْكَاذِبِينَ
اذْهَب بِّكِتَابِي هَٰذَا فَأَلْقِهْ إِلَيْهِمْ ثُمَّ تَوَلَّ عَنْهُمْ فَانظُرْ مَاذَا يَرْجِعُونَ
قَالَتْ يَا أَيُّهَا الْمَلَأُ إِنِّي أُلْقِيَ إِلَيَّ كِتَابٌ كَرِيمٌ
إِنَّهُ مِن سُلَيْمَانَ وَإِنَّهُ بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
أَلَّا تَعْلُوا عَلَيَّ وَأْتُونِي مُسْلِمِينَ

और बेशक हमने दाऊद और सुलैमान को बड़ा इल्म अता फ़रमाया(1)
(1) यानी क़ज़ा का इल्म और राजनीति. हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम को पहाड़ों और पक्षियों की तस्बीह का इल्म दिया और हज़रत सुलैमान को चौपायों और पक्षियों की बोलियों का. (खाज़िन)

और दोनो ने कहा सब ख़ूबियां अल्लाह को जिसने हमें अपने बहुत से ईमान वाले बन्दों पर बुज़ुर्गी बख़्शी (2){15}
(2) नबुव्वत और हुकूमत अता फ़रमा कर और जिन्न व इन्सान और शैतानों को उनके आधीन करके.

और सुलैमान दाऊद का जानशीन हुआ(3)
(3) नबुव्वत और इल्म और मुल्क में.

और कहा ऐ लोगों हमें परिन्दों की बोली सिखाई गई और हर चीज़ में से हमको अता हुआ(4)
(4) यानी दुनिया और आख़िरत की नेअमतें बहुतात से हमको अता की गई.

बेशक यही ज़ाहिर फ़ज़्ल है (5){16}
(5) रिवायत है कि हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम को अल्लाह तआला ने पू्र्व और पश्चिम की धरती की हुकूमत अता की. चालीस साल आप उसके मालिक रहे फिर सारी दुनिया की हुकमत दी गई. जिन्न, इन्सान, शैतान, पक्षी, चौपाए, जानवर, सब पर आपकी हुकूमत थी और हर एक चीज़ की ज़बान आप को अता फ़रमाई और अजीब अनोखी सनअतें आप के ज़माने में काम में लाईं गईं.

और जमा किये गए, सुलैमान के लिये उसके लश्कर, जिन्नों और आदमियों और परिन्दों से, तो वो रोके जाते थे(6){17}
(6) आगे बढ़ने से ताकि सब इकट्ठे हो जाएं, फिर चलाए जाते थे.

यहां तक कि जब च्यूंटियों के नाले पर आए(7)
(7) यानी ताइफ़ या शाम में उस वादी पर गुज़रें जहाँ चूंटियाँ बहुत थीं.

एक च्यूंटी बोली(8)
(8) जो चूंटीयों की रानी थी, वह लंगड़ी थी. जब हज़रत क़तादह रदियल्लाहो अन्हो कूफ़ा में दाखिल हुए और वहाँ के लोग आपके आशिक़ हो गए तो आपने लोगों से कहा जो चाहो पूछो. हज़रत इमाम अबू हनीफ़ा उस वक़्त नौ जवान थे, आपने पूछा कि हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम की चूंटी मादा थी या नर. हज़रत क़तादह ख़ामोश हो गए तो इमाम साहिब ने फ़रमाया कि वह मादा थी आपसे पूछा गया कि यह आप को किस तरह मालूम हुआ. आपने फ़रमाया क़ुरआन शरीफ़ में इरशाद हुआ “क़ालत नम्लतुन”  अगर नर होती तो “क़ाला नम्लतुन” आता (सुब्हानल्लाह, इससे हज़रत इमाम की शाने इल्म मालूम होती है) ग़रज़ जब उस चूंटी की रानी ने हज़रत सुलैमान के लश्कर को देखा तो कहने लगी.

ऐ च्यूंटियों, अपने घरों में चली जाओ तुम्हें कुचल न डालें सुलैमान और उनके लश्कर बेख़बरी में(9){18}
(9) यह उसने इसलिये कहा कि वह जानती थी कि हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम नबी हैं, इन्साफ़ वाले हैं, अत्याचार और ज़ियादती आपकी शान नहीं है. इसलिये अगर आप के लश्कर से चूंटियाँ कुचल जाएंगी तो बेख़बरी ही में कुचल जाएंगी कि वो गुज़रते हों और इस तरफ़ तवज्जोह न करें. चूंटी की यह बात हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम ने तीन मील से सुन ली और हवा हर शख़्स का कलाम आपके मुबारक कानों तक पहुंचाती थी. जब आप चूंटियों की घाटी पर पहुंचे तो आपने अपने लश्करों को ठहरने का हुक्म दिया यहाँ तक कि चूंटियाँ अपने घरों में दाख़िल हो गईं. हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम का सफ़र अगरचे हवा पर था मगर दूर नहीं कि ये मका़म आपके उतरने की जगह हो.

तो उसकी बात से मुस्कुरा कर हंसा(10)
(10) नबियों का हंसना तबस्सुम ही होता है जैसा कि हदीसों में आया है. वो हज़रात क़हक़हा मार कर नहीं हंसते थे.

और अर्ज़ की ऐ मेरे रब मुझे तौफ़िक़ (सामर्थ्य) दे कि मैं शुक्र करूं तेरे एहसान का जो तूने (11)
(11) नबुव्वत और हुकूमत और इल्म अता फ़रमाकर.

मुझपर और मेरे माँ बाप पर किये और यह कि मैं वह भला काम कर सकूं जो तुझे पसन्द आए और मुझे अपनी रहमत से अपने उन बन्दों में शामिल कर जो तेरे ख़ास क़ुर्ब के हक़दार हैं(12){19}
(12) नबी और औलिया हज़रात.

और परिन्दों का जायज़ा लिया तो बोला मुझे क्या हुआ कि मैं हुदहुद को नहीं देखता या वह वाक़ई हाज़िर नहीं{20} ज़रूर मैं उसे सख़्त अज़ाब करूंगा(13)
(13) उसके पर उखाड़कर, या उसको उसके प्यारों से अलग करके या उसको उसके क़रीब वालों का ख़ादिम बनाकर या उसको ग़ैर जानवरों के साथ क़ैद करके और हुदहुद को मसलिहत के अनुसार अज़ाब करना आपके लिये हलाल था और जब पक्षी आप के आधीन किये गए थे तो उनको अदब और सियासत सिखाना इसकी ज़रूरत है.

या ज़िब्ह करूंगा या कोई रौशन सनद (प्रमाण) मेरे पास लाए(14){21}
(14) जिससे उसकी मअज़ूरी और लाचारी ज़ाहिर हो.

तो हुदहुद कुछ ज़्यादा देर न ठहरा और आकर (15)
(15) बहुत विनम्रता और इन्किसारी और अदब के साथ माफ़ी चाह कर.

अर्ज़ की कि मैं वह बात देख आया हूँ जो हुज़ूर ने न देखी और मैं सबा शहर से हुज़ूर के पास एक यक़ीनी ख़बर लाया हँ {22} मैं ने एक औरत देखी (16)
(16) जिसका नाम बिल्क़ीस है.

कि उनपर बादशाही कर रही है और उसे हर चीज़ में से मिला है(17)
(17) जो बादशाहों की शान के लायक़ होता है.

और उसका बड़ा तख़्त है (18){23}
(18) जिसकी लम्बाई अस्सी गज, चौड़ाई चालीस गज, सोने चाँदी का, जवाहिरात से सजा हुआ.

मैं ने उसे और उसकी क़ौम को पाया कि अल्लाह को छोड़कर सूरज को सज्दा करते हैं (19)
(19) क्योंकि वो लोग सूरज परस्त मजूसी थे.

और शैतान ने उनके कर्म उनकी निगाह में सवार कर उनको सीधी राह से रोक दिया(20)
(20)सीधी राह से मुराद सच्चाई का तरीक़ा और दीने इस्लाम है.

तो वो राह नहीं पाते {24} क्यों नहीं सज्दा करते अल्लाह को जो निकालता है आसमानों और ज़मीन की छुपी चीज़ें (21)
(21) आसमान की छुपी चीज़ों से मेंह और ज़मीन की छुपी चीज़ों से पेड़ पौदें मुराद हैं.

और जानता है जो कुछ तुम छुपाते और ज़ाहिर करते हो(22){25}
(22) इसमें सूरज के पुजारियों बल्कि सारे बातिल परस्तों का रद है जो अल्लाह तआला के सिवा किसी को भी पूजे, मक़सूद यह है कि इबादत का मुस्तहिक़ सिर्फ़ वही है जो आसमान और ज़मीन की सृष्टि पर क़ुदरत रखता हो और सारी जानकारी का मालिक हो, जो ऐसा नहीं, वह किसी तरह इबादत का मुस्तहिक़ नहीं.

अल्लाह है कि उसके सिवा कोई सच्चा मअबूद नहीं, वह बड़े अर्श का मालिक है {26} सुलैमान ने फ़रमाया, अब हम देखेंगे कि तूने सच कहा या तू झूटों में है (23) {27}
(23) फिर हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम ने एक खत लिखा जिसका मज़मून यह था कि “अल्लाह के बन्दे, दाऊद के बेटे सुलैमान की तरफ़ से शहरे सबा की रानी बिल्कीस के लिये… अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला… उसपर सलाम जो हिदायत क़ुबूल करे, उसके बाद मुद्दआ यह कि तुम मुझ पर बलन्दी न चाहो और मेरे हुज़ूर फ़रमाँबरदार होकर हाज़िर हो, उसपर आपने अपनी मोहर लगाई और हुदहुद से फ़रमाया.”

मेरा यह फ़रमान ले जाकर उनपर डाल फिर उनसे अलग हट कर देख कि वो क्या जवाब देते हैं(24){28}
(24) चुनांन्चे हुदहुद वह मुबारक खत लेकर बिल्क़ीस के पास पहुंचा, उस वक़्त बिल्क़ीस के चारों तरफ़ उसके वज़ीरों और सलाहकारों की भीड़ थी. हुदहुद ने वह खत बिल्कीस की गोद में डाल दिया और वह उसको देखकर खौफ़ से लरज़ गई और फिर उस पर मोहर देखकर.

वह औरत बोली, ऐ सरदारो बेशक मेरी तरफ़ एक इज़्ज़त वाला ख़त डाला गया(25){29}
(25) उसने उस खत को इज़्ज़त वाला या तो इसलिये कहा कि उसपर मोहर लगी हुई थी. उसने जाना कि किताब का भेजने वाला बड़ी बुज़ुर्गी वाला बादशाह है. या इसलिये कि उस खत की शुरूआत अल्लाह तआला के नामे पाक से थी फिर उसने बताया कि वह ख़त किस की तरफ़ से आया है. चुंनान्चे कहा.

बेशक वह सुलैमान की तरफ़ से है और बेशक वह अल्लाह के नाम से है जो बहुत मेहरबान रहम वाला {30} यह कि मुझ पर बलन्दी न चाहो(26)
(26) यानी मेरे हुक्म को पूरा करो और घमण्ड न करो जैसा कि कुछ बादशाह किया करते हैं.

और गर्दन रखते मेरे हुज़ूर हाज़िर हो(27) {31}
(27) फ़रमाँबरदारी की शान से, खत का यह मज़मून सुनाकर बिल्क़ीस अपने सलाहकारों वज़ीरों की तरफ़ मुतवज्जह हुई.

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