27 – सूरए नम्ल – छटा रूकू

27 – सूरए नम्ल – छटा रूकू

وَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا أَإِذَا كُنَّا تُرَابًا وَآبَاؤُنَا أَئِنَّا لَمُخْرَجُونَ
لَقَدْ وُعِدْنَا هَٰذَا نَحْنُ وَآبَاؤُنَا مِن قَبْلُ إِنْ هَٰذَا إِلَّا أَسَاطِيرُ الْأَوَّلِينَ
قُلْ سِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَانظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُجْرِمِينَ
وَلَا تَحْزَنْ عَلَيْهِمْ وَلَا تَكُن فِي ضَيْقٍ مِّمَّا يَمْكُرُونَ
وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَٰذَا الْوَعْدُ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
قُلْ عَسَىٰ أَن يَكُونَ رَدِفَ لَكُم بَعْضُ الَّذِي تَسْتَعْجِلُونَ
وَإِنَّ رَبَّكَ لَذُو فَضْلٍ عَلَى النَّاسِ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَشْكُرُونَ
وَإِنَّ رَبَّكَ لَيَعْلَمُ مَا تُكِنُّ صُدُورُهُمْ وَمَا يُعْلِنُونَ
وَمَا مِنْ غَائِبَةٍ فِي السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ إِلَّا فِي كِتَابٍ مُّبِينٍ
إِنَّ هَٰذَا الْقُرْآنَ يَقُصُّ عَلَىٰ بَنِي إِسْرَائِيلَ أَكْثَرَ الَّذِي هُمْ فِيهِ يَخْتَلِفُونَ
وَإِنَّهُ لَهُدًى وَرَحْمَةٌ لِّلْمُؤْمِنِينَ
إِنَّ رَبَّكَ يَقْضِي بَيْنَهُم بِحُكْمِهِ ۚ وَهُوَ الْعَزِيزُ الْعَلِيمُ
فَتَوَكَّلْ عَلَى اللَّهِ ۖ إِنَّكَ عَلَى الْحَقِّ الْمُبِينِ
إِنَّكَ لَا تُسْمِعُ الْمَوْتَىٰ وَلَا تُسْمِعُ الصُّمَّ الدُّعَاءَ إِذَا وَلَّوْا مُدْبِرِينَ
وَمَا أَنتَ بِهَادِي الْعُمْيِ عَن ضَلَالَتِهِمْ ۖ إِن تُسْمِعُ إِلَّا مَن يُؤْمِنُ بِآيَاتِنَا فَهُم مُّسْلِمُونَ
۞ وَإِذَا وَقَعَ الْقَوْلُ عَلَيْهِمْ أَخْرَجْنَا لَهُمْ دَابَّةً مِّنَ الْأَرْضِ تُكَلِّمُهُمْ أَنَّ النَّاسَ كَانُوا بِآيَاتِنَا لَا يُوقِنُونَ

और काफ़िर बोले क्या जब हम और हमारे बाप दादा मिट्टी हो जाएंगे क्या हम फिर निकाले जाएंगे(1){67}
(1) अपनी क़ब्रों से ज़िन्दा.

बेशक उसका वादा दिया गया  हमको और हमसे पहले हमारे बाप दादाओ को यह तो नहीं मगर अगलों की कहानियाँ (2){68}
(2) यानी (मआज़ल्लाह) झूठी बातें.

तुम फ़रमाओ ज़मीन में चलकर देखो कैसा हुआ अंजाम मुजरिमों का(3){69}
(3) कि वो इन्कार के कारण अज़ाब से हलाक किये गए.

और तुम उनपर ग़म न खाओ  (4)
(4) उनके मुंह फेरने और झुटलाने और इस्लाम से मेहरूम रहने के कारण.

और उनके मक्र{कपट} से दिल तंग न हो(5){70}
(5) क्योंकि अल्लाह आपका हाफ़िज़ और मददगार है.

और कहते हैं कब आएगा यह वादा(6)
(6) यानी यह अज़ाब का वादा कब पूरा होगा.

अगर तुम सच्चे हो {71} तुम फ़रमाओ क़रीब है कि तुम्हारे पीछे आ लगी हो कुछ वो चीज़ जिसकी तुम जल्दी मचा रहे हो(7){72}
(7)  यानी अल्लाह का अज़ाब, चुंनान्चे वह अज़ाब बद्र के दिन उन पर आ ही गया और बाक़ी को मौत के बाद पाएंगे.

और बेशक तेरा रब फ़ज़्ल वाला है आदमियों पर(8)
(8) इसीलिये अज़ाब में देरी करता है.

लेकिन अक्सर आदमी हक़ {सत्य} नहीं मानते(9){73}
(9) और शुक्रगुज़ारी नहीं करते और अपनी जिहालत से अज़ाब की जल्दी करते हैं.

और बेशक तुम्हारा रब जानता है जो उनके सीनों में छुपी है और जो वो ज़ाहिर करते हैं(10){74}
(10) यानी रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ दुश्मनी रखना और आपके विरोध में छलकपट करना सब कुछ अल्लाह को मालूम है, व उसकी सज़ा देगा.

और जितने ग़ैब हैं आसमानों और ज़मीन के सब एक बताने वाली किताब में हैं (11){75}
(11) यानी लौहे मेहफ़ूज़ में दर्ज़ हैं और अल्लाह के फ़ज़्ल से जिन्हें उनका देखना मयस्सर है उनके लिये ज़ाहिर हैं.

बेशक यह क़ुरआन ज़िक्र फ़रमाता है बनी इस्राईल से अक्सर वो बातें जिसमें वो इख़्तिलाफ़ (मदभेद) करते हैं(12){76}
(12) दीनी कामों में किताब वालों ने आपस में मतभेद किया, उनके बहुत से सम्प्रदाय हो गए और आपस में बुरा भला कहने लगे तो क़ुरआने करीम ने उसका बयान फ़रमाया. ऐसा बयान किया कि अगर वो इन्साफ़ करें और उसको क़ुबूल करें और इस्लाम लाएं तो उनमें यह आपसी मतभेद बाक़ी न रहे.

और बेशक वह हिदायत और रहमत है मुसलमानों के लिये {77} बेशक तुम्हारा रब उनके आपस में फै़सला फ़रमाता है अपने हुक्म से और वही है इज़्ज़त वाला इल्म वाला {78} तो तुम अल्लाह पर भरोसा करो, बेशक तुम रौशन हक़ पर हो{79} बेशक तुम्हारे सुनाए नहीं सुनते मुर्दें(13)
(13) मुर्दों से मुराद यहाँ काफ़िर लोग हैं जिनके दिल मुर्दा हैं. चुनांन्चे इसी आयत में उनके मुक़ाबले में ईमान वालों का बयान फ़रमाया “तुम्हारे सुनाए तो वही सुनते हैं जो हमारी आयतों पर ईमान लाते हैं”. जो लोग इस आयत से मुर्दों के न सुनने पर बहस करते हैं उनका तर्क ग़लत है. चूंकि यह मु्र्दा काफ़िर को कहा गया है और उन से भी बिल्कुल ही हर कलाम के सुनने का इन्कार मुराद नहीं है बल्कि नसीहत और उपदेश और हिदायत की बातें क़ुबूल करने वाले कानों से सुनने की नफ़ी है और मुराद यह है कि काफ़िर मुर्दा दिल हैं कि नसीहत से फ़ायदा नहीं उठाते. इस आयत के मानी ये बताना कि मुर्दे नहीं सुनते, बिल्कुल ग़लत है. सही हदीसों से मु्र्दों का सुनना साबित है.

और न तुम्हारे सुनाए बेहरे पुकार सुनें जब फिरें पीठ दे कर(14){80}
(14) मानी ये हैं कि काफ़िर मुंह फेरने और न मानने की वजह से मुर्दे और बहरे जैसे हो गए हैं कि उन्हें पुकारना और सच्चाई की तरफ़ बुलाना किसी तरह लाभदायक नहीं होता.

और अंधों को(15)
(15)जिनकी नज़र या दृष्टि जाती रही और दिल अन्धे हो गए.

गुमराही से तुम हिदायत करने वाले नहीं तुम्हारे सुनाएं तो वही सुनते हैं जो हमारी आयतों पर ईमान लाते हैं(16)
(16) जिनके पास समझने वाले दिल हैं और जो अल्लाह के इल्म में ईमान की सआदत से लाभान्वित होने वाले हैं. (बैज़ावी व कबीर व अबूसऊद व मदारिक)

और वो मुसलमान हैं{81} और जब बात उनपर आ पड़ेगी(17)
(17) यानी उनपर अल्लाह का ग़ज़ब होगा और अज़ाब वाजिब हो जाएगा और हुज्जत पूरी हो चुकेगी इस तरह कि लोग अच्छाई पर अमल और बुराई से दूर रहना छोड़ देंगे और उनकी दुरूस्ती की कोई उम्मीद बाक़ी न रहेगी यानी क़यामत क़रीब हो जाएगी और उसकी निशानियाँ ज़ाहिर होने लगेंगी और उस वक़्त तौबह का कोई फ़ायदा न होगा.

हम ज़मीन से उनके लिये एक चौपाया निकालेंगे (18)
(18) इस चौपाए को दाव्वतुल -अर्ज़ कहते हैं. यह अजीब शक्ल का जानवर होगा जो सफ़ा पहाड़ से निकल कर सारे शहरों में बहुत जल्द फिरेगा. फ़साहत के साथ कलाम करेगा. हर व्यक्ति के माथे पर एक निशान लगाएगा. ईमान वालों की पेशानी पर हज़रत मूसा की लाठी से नूरानी लकीर खींचेगा. काफ़िर की पेशानी पर हज़रत सुलैमान की अंगूठी से काली मोहर लगाएगा.

जो लोगों से कलाम करेगा(19)
(19) साफ़ सुथरी ज़बान में, और कहेगा यह मूमिन है, यह काफ़िर है.

इसलिये कि लोग हमारी आयतों पर ईमान न लाते थे(20){82}
(20) यानी क़ुरआने पाक पर ईमान न लाते थे जिसमें मरने के बाद उठाए जाने और हिसाब व अज़ाब और दाव्वतुल-अर्ज़ के निकलने का बयान है. इसके बाद की आयत में क़यामत का बयान फ़रमाया जाता है.

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