27 – सूरए नम्ल -चौथा रूकू

27 – सूरए नम्ल -चौथा रूकू

وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا إِلَىٰ ثَمُودَ أَخَاهُمْ صَالِحًا أَنِ اعْبُدُوا اللَّهَ فَإِذَا هُمْ فَرِيقَانِ يَخْتَصِمُونَ
قَالَ يَا قَوْمِ لِمَ تَسْتَعْجِلُونَ بِالسَّيِّئَةِ قَبْلَ الْحَسَنَةِ ۖ لَوْلَا تَسْتَغْفِرُونَ اللَّهَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ
قَالُوا اطَّيَّرْنَا بِكَ وَبِمَن مَّعَكَ ۚ قَالَ طَائِرُكُمْ عِندَ اللَّهِ ۖ بَلْ أَنتُمْ قَوْمٌ تُفْتَنُونَ
وَكَانَ فِي الْمَدِينَةِ تِسْعَةُ رَهْطٍ يُفْسِدُونَ فِي الْأَرْضِ وَلَا يُصْلِحُونَ
قَالُوا تَقَاسَمُوا بِاللَّهِ لَنُبَيِّتَنَّهُ وَأَهْلَهُ ثُمَّ لَنَقُولَنَّ لِوَلِيِّهِ مَا شَهِدْنَا مَهْلِكَ أَهْلِهِ وَإِنَّا لَصَادِقُونَ
وَمَكَرُوا مَكْرًا وَمَكَرْنَا مَكْرًا وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ
فَانظُرْ كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ مَكْرِهِمْ أَنَّا دَمَّرْنَاهُمْ وَقَوْمَهُمْ أَجْمَعِينَ
فَتِلْكَ بُيُوتُهُمْ خَاوِيَةً بِمَا ظَلَمُوا ۗ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً لِّقَوْمٍ يَعْلَمُونَ
وَأَنجَيْنَا الَّذِينَ آمَنُوا وَكَانُوا يَتَّقُونَ
وَلُوطًا إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِ أَتَأْتُونَ الْفَاحِشَةَ وَأَنتُمْ تُبْصِرُونَ
أَئِنَّكُمْ لَتَأْتُونَ الرِّجَالَ شَهْوَةً مِّن دُونِ النِّسَاءِ ۚ بَلْ أَنتُمْ قَوْمٌ تَجْهَلُونَ
۞ فَمَا كَانَ جَوَابَ قَوْمِهِ إِلَّا أَن قَالُوا أَخْرِجُوا آلَ لُوطٍ مِّن قَرْيَتِكُمْ ۖ إِنَّهُمْ أُنَاسٌ يَتَطَهَّرُونَ
فَأَنجَيْنَاهُ وَأَهْلَهُ إِلَّا امْرَأَتَهُ قَدَّرْنَاهَا مِنَ الْغَابِرِينَ
وَأَمْطَرْنَا عَلَيْهِم مَّطَرًا ۖ فَسَاءَ مَطَرُ الْمُنذَرِينَ

और बेशक हमने समूद की तरफ़ उनके हमक़ौम सालेह को भेजा कि अल्लाह को पूजो(1)
(1) और किसी को उसका शरीक न करो.

तो जभी वो दो गिरोह हो गए (2)
(2) एक ईमानदार और एक काफ़िर.

झगड़ा करते (3){45}
(3) हर पक्ष अपने ही को सच्चाई पर कहता और दोनों आपस में झगड़ते. काफ़िर गिरोह ने कहा, ऐ सालेह, जिस अज़ाब का तुम वादा देते हो उसको लाओ अगर रसूलों में से हो.

सालेह ने फ़रमाया ऐ मेरी क़ौम क्यों बुराई की जल्दी करते हो (4)
(4) यानी बला और अज़ाब का.

भलाई से पहले (5)
(5) भलाई से मुराद आफ़ियत और रहमत है.

अल्लाह से बख़्शिश क्यों नहीं मांगते(6)
(6) अज़ाब उतरने से पहले, कुफ़्र से तौबह कर के, ईमान लाकर.

शायद तुम पर रहम हो (7){46}
(7) और दुनिया में अज़ाब न किया जाए.

बोले हमने बुरा शगुन लिया तुमसे और तुम्हारे साथियों से (8)
(8) हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम जब भेजे गए और क़ौम ने झुटलाया उसके कारण बारिश रूक गई. अकाल हो गया, लोग भूखों मरने लगे, उसको उन्होंने हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम की तशरीफ़ आवरी की तरफ़ निस्बत किया और आपकी आमद को बदशगुनी समझा.

फ़रमाया तुम्हारी बदशगुनी अल्लाह के पास हैं(9)
(9) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि बदशगुनी जो तुम्हारे पास आई, यह तुम्हारे कुफ़्र के कारण अल्लाह तआला की तरफ़ से आई.

बल्कि तुम लोग फ़ित्ने में पड़े हो(10){47}
(10) आज़माइश में डाले गए या अपने दीन के कारण अज़ाब में जकड़े हुए हो.

और शहर में नौ व्यक्ति थे (11)
(11) यानी समूद के शहर में जिसका नाम हजर है. उनके शरीफ़ज़ादों में से नौ व्यक्ति थे जिनका सरदार क़दार बिन सालिफ़ था. यही लोग हैं जिन्होंने ऊंटनी की कूंचें काटने की कोशिश की थी.

कि ज़मीन में फ़साद करते और संवार न चाहते {48} आपस में अल्लाह की क़समें खाकर बोले हम ज़रूर रात को छापा मारेंगे सालेह और उसके घरवालों पर(12)
(12) यानी रात के वक़्त उनको और उनकी औलाद को और उनके अनुयाइयों को जो उनपर ईमान लाए, क़त्ल कर देंगे.

फिर उसके वारिस से (13)
(13) जिसको उनके ख़ून का बदला तलब करने का हक़ होगा.

कहेंगे इस घर वालों के क़त्ल के वक़्त हम हाज़िर न थे बेशक हम सच्चे हैं{49} और उन्होंने अपना सा मक्र किया और हमने अपनी ख़फ़िया (छुपवा) तदबीर फ़रमाई(14)
(14) यानी उनके छलकपट का बदला यह दिया कि उनके अज़ाब में जल्दी फ़रमाई.

और वो ग़ाफ़िल रहे{50} तो देखो कैसा अंजाम हुआ उनके मक्र का हमने हलाक कर दिया उन्हें(15)
(15)यानी उन नौ व्यक्तियों को. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि अल्लाह तआला ने उस रात हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम के मकान की हिफ़ाज़त के लिये फ़रिश्ते भेजे तो वो नौ व्यक्ति हथियार बांध कर तलवारें खींच कर हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम के दरवाज़ें पर आए. फ़रिश्तों ने उनके पत्थर मारे. वो पत्थर लगते थे और मारने वाले नज़र नहीं आते थे. इस तरह उन नौ को हलाक किया.

और उनकी सारी क़ौम को(16){51}
(16) भयानक आवाज़ से.

तो ये हैं इनके घर ढे पड़े, बदला इनके ज़ुल्म का, बेशक इसमें निशानी है जानने वालों के लिये{52} और हमने उनको बचा लिया जो ईमान लाए(17)
(17) हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम पर.

और डरते थे (18) {53}
(18) उनकी नाफ़रमानी से. उन लोगों की तादाद चार हज़ार थी.

और लूत को जब उसने अपनी क़ौम से कहा क्या बेहयाई पर आते हो (19)
(19) इस बेहयाई से मुराद उनकी बदकारी है.

और तुम सूझ रहे हो(20){54}
(20) यानी इस काम की बुराई जानते हो या ये मानी हैं कि एक दूसरे के सामने बेपर्दा खुल्लम खुल्ला बुरा काम करते हो या ये कि तुम अपने से पहले नाफ़रमानी करने वालों की तबाही और उनके अज़ाब के आसार देखते हो फिर भी इस बुरे काम में लगे हो.

क्या तुम मर्दों के पास मस्ती से जाते हो औरतें छोड़कर (21)
(21) इसके बावुजूद कि मर्दों के लिये औरतें बनाई गई हैं. मर्दों के लिये मर्द और औरतों के लिये औरतें नहीं बनाई गई. इसलिये यह काम अल्लाह तआला की हिकमत का विरोध है.

बल्कि तुम जाहिल लोग हो(22){55}
(22) जो ऐसा काम करते हो.

तो उसकी क़ौम का कुछ जवाब न था मगर यह कि बोले लूत के घराने को अपनी बस्ती से निकाल दो, ये लोग तो सुथरापन चाहते हैं(23){56}
(23) और इस गन्दे काम को मना करते हैं.

तो हमने उसे और उसके घर वालों को निजात दी मगर उसकी औरत को हमने ठहरा दिया था वह रह जाने वालों में है(24) {57}
(24) अज़ाब में.

और हमने उनपर एक बरसाव बरसाया(25)
(25) पत्थरों का.
तो क्या बुरा बरसाव था डराए हुओं का {58}

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