26 – सूरए शुअरा

26 – सूरए शुअरा

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
طسٓمٓ  تِلْكَ ءَايَٰتُ ٱلْكِتَٰبِ ٱلْمُبِينِ
لَعَلَّكَ بَٰخِعٌۭ نَّفْسَكَ أَلَّا يَكُونُوا۟ مُؤْمِنِينَ
إِن نَّشَأْ نُنَزِّلْ عَلَيْهِم مِّنَ ٱلسَّمَآءِ ءَايَةًۭ فَظَلَّتْ أَعْنَٰقُهُمْ لَهَا خَٰضِعِينَ
وَمَا يَأْتِيهِم مِّن ذِكْرٍۢ مِّنَ ٱلرَّحْمَٰنِ مُحْدَثٍ إِلَّا كَانُوا۟ عَنْهُ مُعْرِضِينَ
فَقَدْ كَذَّبُوا۟ فَسَيَأْتِيهِمْ أَنۢبَٰٓؤُا۟ مَا كَانُوا۟ بِهِۦ يَسْتَهْزِءُونَ
أَوَلَمْ يَرَوْا۟ إِلَى ٱلْأَرْضِ كَمْ أَنۢبَتْنَا فِيهَا مِن كُلِّ زَوْجٍۢ كَرِيمٍ
إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَءَايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ

सूरए शुअरा मक्का में उतरी, इसमें 227 आयतें, 11 रूकू हैं.
– पहला रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) सूरए शुअरा मक्के में उतरी, सिवाय आख़िर की चार आयतों के जो “वश्शुअराओ यत्तबिउहुम” से शुरू होती है. इस सूरत में ग्यारह रूकू, दो सौ सत्ताईस आयतें, एक हज़ार दो सौ उनासी कलिमे  और पाँच हज़ार पाँच सौ चालीस अक्षर हें.

तॉ-सीन-मीम {1} ये आयतें हैं रौशन किताब की(2){2}
(2) यानी क़ुरआने पाक की, जिसका चमत्कार ज़ाहिर है और जो सच्चाई को बातिल से अलग करने वाला हे. इसके बाद सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से मेहरबानी और करम के अन्दाज़ में सम्बोधन होता है.

कहीं तुम अपनी जान पर खेल जाओगे उनके ग़म में कि वो ईमान नहीं लाए(3){3}
(3) जब मक्का वाले ईमान न लाए और उन्होंने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को झुटलाया तो हुज़ूर पर उनकी मेहरूमी बहुत भारी गुज़री. इसपर अल्लाह तआला ने यह आयत उतारी कि आप इस क़दर ग़म न करें.

अगर हम चाहें तो आसमान से उनपर कोई निशानी उतारें कि उनके ऊंचे ऊंचे उसके हुज़ूर झुके रह जाएं (4){4}
(4) और कोई गुमराही और नाफ़रमानी के साथ गर्दन न उठा सके.

और नहीं आती उनके पास रहमान की तरफ़ से कोई नई नसीहत मगर उससे मुंह फेर लेते हैं (5){5}
(5) यानी दम-ब-दम उनका कुफ़्र बढ़ता जाता है कि जो नसीहत, ज़िक्र और जो वही उतरती है वो उसका इनकार करते चले जाते हैं.

तो बेशक उन्होंने झुटलाया तो अब आया चाहती हैं ख़बरें उनके ठट्टे की(6){6}
(6) यह चेतावनी है और इसमें डराना है कि बद्र के दिन या क़यामत के दिन रोज़ जब उन्हें अज़ाब पहुंचेगा तब उन्हें ख़बर होगी कि क़ुरआन और रसूल के झुटलाने का यह परिणाम है.

क्या उन्होंने ज़मीन को न देखा हमने उसमें कितने इज़्ज़त वाले जोड़े उगाए(7){7}
(7) यानी तरह तरह के बेहतरीन और नफ़ा देने वाले पेड़ पौधे पैदा किये. शअबी ने कहा कि आदमी ज़मीन की पैदावर है. जो जन्नती है वह इज़्ज़त वाला और करीम, और जो जहन्नमी है वो बदबख़्त और मलामत पाया हुआ है.

बेशक उसमें ज़रूर निशानी है(8)
(8) अल्लाह तआला की भरपूर क़ुदरत पर.

और उनके अक्सर ईमान लाने वाले नहीं{8} और बेशक तुम्हारा रब ज़रूर वही इज़्ज़त वाला मेहरबान है(9){9}
(9) काफ़िरों से बदला लेता और ईमान वालों पर मेहरबानी फ़रमाता है.

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