26 – सूरए शुअरा -तीसरा रूकू

26 – सूरए शुअरा -तीसरा रूकू

قَالَ لِلْمَلَإِ حَوْلَهُۥٓ إِنَّ هَٰذَا لَسَٰحِرٌ عَلِيمٌۭ
يُرِيدُ أَن يُخْرِجَكُم مِّنْ أَرْضِكُم بِسِحْرِهِۦ فَمَاذَا تَأْمُرُونَ
قَالُوٓا۟ أَرْجِهْ وَأَخَاهُ وَٱبْعَثْ فِى ٱلْمَدَآئِنِ حَٰشِرِينَ
يَأْتُوكَ بِكُلِّ سَحَّارٍ عَلِيمٍۢ
فَجُمِعَ ٱلسَّحَرَةُ لِمِيقَٰتِ يَوْمٍۢ مَّعْلُومٍۢ
وَقِيلَ لِلنَّاسِ هَلْ أَنتُم مُّجْتَمِعُونَ
لَعَلَّنَا نَتَّبِعُ ٱلسَّحَرَةَ إِن كَانُوا۟ هُمُ ٱلْغَٰلِبِينَ
فَلَمَّا جَآءَ ٱلسَّحَرَةُ قَالُوا۟ لِفِرْعَوْنَ أَئِنَّ لَنَا لَأَجْرًا إِن كُنَّا نَحْنُ ٱلْغَٰلِبِينَ
قَالَ نَعَمْ وَإِنَّكُمْ إِذًۭا لَّمِنَ ٱلْمُقَرَّبِينَ
قَالَ لَهُم مُّوسَىٰٓ أَلْقُوا۟ مَآ أَنتُم مُّلْقُونَ
فَأَلْقَوْا۟ حِبَالَهُمْ وَعِصِيَّهُمْ وَقَالُوا۟ بِعِزَّةِ فِرْعَوْنَ إِنَّا لَنَحْنُ ٱلْغَٰلِبُونَ
فَأَلْقَىٰ مُوسَىٰ عَصَاهُ فَإِذَا هِىَ تَلْقَفُ مَا يَأْفِكُونَ
فَأُلْقِىَ ٱلسَّحَرَةُ سَٰجِدِينَ
قَالُوٓا۟ ءَامَنَّا بِرَبِّ ٱلْعَٰلَمِينَ
رَبِّ مُوسَىٰ وَهَٰرُونَ
قَالَ ءَامَنتُمْ لَهُۥ قَبْلَ أَنْ ءَاذَنَ لَكُمْ ۖ إِنَّهُۥ لَكَبِيرُكُمُ ٱلَّذِى عَلَّمَكُمُ ٱلسِّحْرَ فَلَسَوْفَ تَعْلَمُونَ ۚ لَأُقَطِّعَنَّ أَيْدِيَكُمْ وَأَرْجُلَكُم مِّنْ خِلَٰفٍۢ وَلَأُصَلِّبَنَّكُمْ أَجْمَعِينَ
قَالُوا۟ لَا ضَيْرَ ۖ إِنَّآ إِلَىٰ رَبِّنَا مُنقَلِبُونَ
إِنَّا نَطْمَعُ أَن يَغْفِرَ لَنَا رَبُّنَا خَطَٰيَٰنَآ أَن كُنَّآ أَوَّلَ ٱلْمُؤْمِنِينَ

बोला अपने गिर्द के सरदारों से कि बेशक ये जानकार जादूगर हैं{34} चाहते हैं कि तुम्हें तुम्हारे मुल्क से निकाल दें अपने जादू के ज़ोर से, तब तुम्हारी क्या सलाह है(1){35}
(1) क्योंकि उस ज़माने में जादू का बहुत रिवाज़ था इसलिये फ़िरऔन ने ख़याल किया यह बात चल जाएगी और उसकी क़ौम के लोग इस धोखे में आकर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से नफ़रत करने लगेंगे और उनकी बात क़ुबूल न करेंगे.

वो बोले इन्हें और इनके भाई को ठहराए रहो और शहरों में जमा करने वाले भेजो{36} कि वो तरे पास ले आएं , हर बड़े जानकार जादूगर को (2){37}
(2) जो जादू के इल्म में उनके कहने के मुताबिक मूसा अलैहिस्सलाम से बढ़ कर हो और वो लोग अपने जादू से हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के चमत्कारों का मुकाबला करें ताकि हज़रत मूसा के लिये हुज्जत बाक़ी न रहे और फ़िरऔन के लोगों को यह कहने का मौक़ा मिल जाए कि यह काम जादू से हो जाते हैं लिहाज़ा नबुव्वत की दलील नहीं.

तो जमा किये गए जादूगर एक मुक़र्रर दिन के वादे पर(3){38}
(3) वह दिन फ़िरऔन की क़ौम की ईद का था और इस मुक़ाबले के लिये चाश्त का समय निर्धारित किया गया था.

और लोगों से कहा गया क्या तुम जमा हो गए(4){39}
(4) ताकि देखो कि दोनों पक्ष क्या करते हैं और उनमें कोन जीतता है.

शायद हम उन जादूगरों ही की पैरवी करें अगर ये ग़ालिब आएं (5){40}
(5) हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर. इससे उनका तात्पर्य जादूगरों का अनुकरण करना न था बल्कि ग़रज़ यह थी कि इस बहाने लोगों को हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के अनुकरण से रोकें.

फिर जब जादूगर आए फ़िरऔन से बोले क्या हमें कुछ मजदूरी मिलेगी अगर हम ग़ालिब आए{41} बोला हाँ और उस वक़्त तुम मेरे मुकर्रर (नज़दीकी) हो जाओगे(6){42}
(6) तुम्हें दरबारी बनाया जाएगा, तुम्हें विशेष उपाधियाँ दी जाएगी, सब से पहले दाख़िल होने की इजाज़त दी जाएगी, सबसे बाद तक दरबार में रहोगे. इसके बाद जादूगरों ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से अर्ज़ किया कि क्या हज़रत अपनी लाठी पहले डालेंगे या हमें इजाज़त है कि हम अपना जादूई सामान डालें.

मूसा ने उनसे फ़रमाया डालो जो तुम्हें डालना है(7){43}
(7) ताकि तुम उसका अंजाम देख लो.

तो उन्होनें अपनी रस्सियां और लाठियां डालीं और बोले फ़िरऔन की इज़्ज़त की क़सम बेशक हमारी ही जीत है(8){44}
(8) उन्हें अपनी जीत का इत्मीनान था क्योंकि जादू के कामों में जो इन्तिहा के काम थे ये उनको काम में लाए थे और पूरा यक़ीन रखते थे कि अब कोई जादू इसका मुक़ाबला नहीं कर सकता.

तो मूसा ने अपना असा डाला जभी वह उनकी बनावटों को निगलने लगा(9){45}
(9)  जो उन्होंने जादू के ज़रिये बनाई थीं यानी उनकी रस्सियाँ और लाठियाँ जो जादू से अजगर बनकर दौड़ते नज़र आ रहे थे. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की लाठी अजगर बनकर उन सब को निगल गई फिर उसको हज़रत मूसा ने अपने मुबारक हाथ में लिया तो वह पहले की तरह हो गई. जब जादूगरों ने यह देखा तो उन्हें यक़ीन हो गया कि यह जादूगर नहीं है.

अब सज्दे में गिरे {46} जादूगर बोले हम ईमान लाए उसपर जो सारे जगत का रब है{47} जो मूसा और हारून का रब है{48} फ़िरऔन बोला क्या तुम उसपर ईमान लाए पहले इसके कि मैं तुम्हें इजाज़त दूँ बेशक वह तुम्हारा बड़ा है जिसने तुम्हें जादू सिखाया, (10)
(10) यानी हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम तुम्हारे उस्ताद हैं इसीलिये वह तुम से बढ गए.

तो अब जानना चाहते हो(11){49}
(11)  कि तुम्हारे साथ क्या किया जाए.

मुझे क़सम है बेशक मैं तुम्हारे हाथ और दूसरी तरफ़ के पाँव काटूंगा और तुम सब को सूली दूंगा (12)
(12) इससे उद्देश यह था कि आम लोग डर जाएं और जादूगरों को देखकर लोग हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर ईमान न ले आएं.

वो बोले कुछ नुक़सान नहीं(13)
(13) चाहे दुनिया में कुछ भी पेश आए क्योंकि.

हम अपने रब की तरफ़ पलटने वाले हैं(14){50}
(14) ईमान के साथ और हमें अल्लाह तआला से रहमत की उम्मीद है.

हमें तमअ (लालच) है कि हमारा रब हमारी खताएं बख़्श दे इसपर कि हम सबसे पहले ईमान लाएं(15) {51}
(15) फ़िरऔन की जनता में से या उस भीड़ में से. उस वाक़ए के बाद हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने कई साल वहाँ क़याम फ़रमाया और उन लोगों को हक़ की दावत देते रहे लेकिन उनकी सरकशी बढ़ती गई.

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