26 – सूरए शुअरा – सातवाँ रूकू

26 – सूरए शुअरा – सातवाँ रूकू

كَذَّبَتْ عَادٌ ٱلْمُرْسَلِينَ
إِذْ قَالَ لَهُمْ أَخُوهُمْ هُودٌ أَلَا تَتَّقُونَ
إِنِّى لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌۭ
فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ
وَمَآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِىَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ ٱلْعَٰلَمِينَ
أَتَبْنُونَ بِكُلِّ رِيعٍ ءَايَةًۭ تَعْبَثُونَ
وَتَتَّخِذُونَ مَصَانِعَ لَعَلَّكُمْ تَخْلُدُونَ
وَإِذَا بَطَشْتُم بَطَشْتُمْ جَبَّارِينَ
فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ
وَٱتَّقُوا۟ ٱلَّذِىٓ أَمَدَّكُم بِمَا تَعْلَمُونَ
أَمَدَّكُم بِأَنْعَٰمٍۢ وَبَنِينَ
وَجَنَّٰتٍۢ وَعُيُونٍ
إِنِّىٓ أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍۢ
قَالُوا۟ سَوَآءٌ عَلَيْنَآ أَوَعَظْتَ أَمْ لَمْ تَكُن مِّنَ ٱلْوَٰعِظِينَ
إِنْ هَٰذَآ إِلَّا خُلُقُ ٱلْأَوَّلِينَ
وَمَا نَحْنُ بِمُعَذَّبِينَ
فَكَذَّبُوهُ فَأَهْلَكْنَٰهُمْ ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَءَايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ

आद ने रसूलों को झुटलाया(1){123}
(1) आद एक क़बीला है और अस्ल में यह एक शख़्स का नाम है जिसकी सन्तान से यह क़बीला है.

जबकि उनसे उनके हक़ क़ौम हूद ने फ़रमाया क्या तुम डरते नहीं{124} बेशक मैं तुम्हारे लिये अमानत दार रसूल हूँ {125} तो अल्लाह से डरो(2)
(2) और मेरी तकज़ीब न करो यानी मूझे न झुटलाओ.

और मेरा हुक्म मानो{126} और मैं तुम से इस पर कुछ उजरत नहीं मांगता, मेरा अज्र तो उसी पर है जो सारे जगत का रब है{127} क्या हर बलन्दी पर एक निशान बनाते हो राहगीरों से हंसने को (3) {128}
(3) कि उस पर चढ़कर गुज़रने वालों से ठठ्ठा करो और यह उस क़ौम की आदत थी. उन्होंने रास्ते पर ऊंची बुनियादें बना ली थीं वहाँ बैठकर राहगीरों को परेशान करते और खेल करते.

और मज़बूत महल चुनते हो इस उम्मीद पर कि तुम हमेशा रहोगे(4){129}
(4) और कभी न मरोगे.

और जब किसी पर गिरफ़्त करते हो तो बड़ी बेदर्दी से गिरफ़्त करते हो (5){130}
(5) तलवार से क़त्ल करके, कोड़े मारकर, बहुत बेरहमी से.

तो अल्लाह से डरो और मेरा हुक्म मानो{131} और उससे डरो जिसने तुम्हारी मदद की उन चीज़ों से कि तुम्हें मालूम हैं(6){132}
(6) यानी वो नेअमतें जिन्हें तुम जानते हो, आगे उनका बयान फ़रमाया जाता है.

तुम्हारी मदद की चौपायों और बेटों {133} और बाग़ों और चश्मों (झरनों) से {134} बेशक मुझे तुम पर डर है एक बड़े दिन के अज़ाब का(7){135}
(7) अगर तुम मेरी नाफ़रमानी करो. इसका जवाब उनकी तरफ़ से यह हुआ कि…

बोले हमें बराबर है चाहे तुम नसीहत करो या नसीहत करने वालों में न हो(8){136}
(8) हम किसी तरह तुम्हारी बात न मानेंगे और तुम्हारी दावत क़ुबूल न करेंगे.

यह तो नहीं मगर वही अगलों की रीति(9){137}
(9) यानी जिन चीज़ों का आपने ख़ौफ़ दिलाया. यह पहलों का दस्तूर है, वो भी ऐसी ही बातें कहा करते थे. इससे उनकी मुराद यह थी कि हम उन बातों का ऐतिबार नहीं करते, उन्हें झूट जानते हैं. या आयत के मानी ये हैं कि मौत और ज़िन्दगी और ईमारतें बनाना पहलों का तरीक़ा है.

और हमें अज़ाब होना नहीं(10){138}
(10) दुनिया में न मरने के बाद उठना न आख़िरत में हिसाब.

तो उन्होंने उसे झुटलाया (11)
(11) यानी हूद अलैहिस्सलाम को.

तो हमने उन्हें हलाक किया(12)
(12) हवा के अज़ाब से.

बेशक इसमें ज़रूर निशानी है और उनमें बहुत मुसलमान न थे{139} और बेशक तुम्हारा रब ही इज़्ज़त वाला मेहरबान है{140}

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