26 – सूरए शुअरा – दसवाँ रूकू

26 – सूरए शुअरा – दसवाँ रूकू

كَذَّبَ أَصْحَٰبُ لْـَٔيْكَةِ ٱلْمُرْسَلِينَ
إِذْ قَالَ لَهُمْ شُعَيْبٌ أَلَا تَتَّقُونَ
إِنِّى لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌۭ
فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ
وَمَآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِىَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ ٱلْعَٰلَمِينَ
۞ أَوْفُوا۟ ٱلْكَيْلَ وَلَا تَكُونُوا۟ مِنَ ٱلْمُخْسِرِينَ
وَزِنُوا۟ بِٱلْقِسْطَاسِ ٱلْمُسْتَقِيمِ
وَلَا تَبْخَسُوا۟ ٱلنَّاسَ أَشْيَآءَهُمْ وَلَا تَعْثَوْا۟ فِى ٱلْأَرْضِ مُفْسِدِينَ
وَٱتَّقُوا۟ ٱلَّذِى خَلَقَكُمْ وَٱلْجِبِلَّةَ ٱلْأَوَّلِينَ
قَالُوٓا۟ إِنَّمَآ أَنتَ مِنَ ٱلْمُسَحَّرِينَ
وَمَآ أَنتَ إِلَّا بَشَرٌۭ مِّثْلُنَا وَإِن نَّظُنُّكَ لَمِنَ ٱلْكَٰذِبِينَ
فَأَسْقِطْ عَلَيْنَا كِسَفًۭا مِّنَ ٱلسَّمَآءِ إِن كُنتَ مِنَ ٱلصَّٰدِقِينَ
قَالَ رَبِّىٓ أَعْلَمُ بِمَا تَعْمَلُونَ
فَكَذَّبُوهُ فَأَخَذَهُمْ عَذَابُ يَوْمِ ٱلظُّلَّةِ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍ
إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَءَايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ

बन वालों ने रसूलों को झुटलाया(1){176}
(1) यह वन मदयन के क़रीब था इसमें बहुत से दरख़्त और झाड़ियाँ थीं. अल्लाह तआला ने हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम को उनकी तरफ़ भेजा था जैसा कि मदयन वालों की तरफ़ भेजा था और ये लोग हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम की क़ौम के न थे.

जब उनसे शुएब ने फ़रमाया क्या डरते नहीं {177} बेशक मैं तुम्हारे लिये अल्लाह का अमानतदार रसूल हूँ {178} तो अल्लाह से डरो और मेरा हुक्म मानो{179} और मैं इस पर तुमसे कुछ उजरत नहीं मांगता मेरा अज्र तो उसी पर है जो सारे जगत का रब है(2){180}
(2) उन सारे नबियों की दावत का यही विषय रहा क्योंकि वो सब हज़रात अल्लाह तआला के ख़ौफ़ और उसकी फ़रमाँबरदारी और इबादत की सच्चे दिल से अदायगी का हुक्म देते और रिसालत की तबलीग़ पर कोई उजरत नहीं लेते थे लिहाज़ा सब ने यही फ़रमाया.

नाप पूरा करो और घटाने वालों में न हो (3){181}
(3) लोगों के अधिकार कम न करो नाप और तौल में.

और सीधी तराज़ू से तोलो {182} और लोगों की चीज़ें कम करके न दो और ज़मीन में फ़साद फैलाते न फिरो(4){183}
(4) रहज़नी और लूट मार करके और खेतियाँ तबाह करके, यही उन लोगों की आदतें थीं. हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम ने उन्हें उन से मना फ़रमाया.

और उससे डरो जिसने तुम को पैदा किया और अगली मख़लूक़ को{184} बोले तुम पर जादू हुआ है  {185} तुम तो नहीं मगर हम जैसे आदमी (5)
(5) नबुव्वत का इन्कार करने वाले, नबियों के बारे में आम तौर पर यही कहा करते थे जैसा कि आजकल के कुछ बुरे अक़ीदे वाले कहते हैं.

और बेशक हम तुम्हें झुटा समझते हैं{186} तो हमपर आसमान का कोई टुकड़ा गिरादो अगर तुम सच्चे हो(6){187}
(6) नबुव्वत के दावे में.

फ़रमाया मेरा रब ख़ूब जानता है जो तुम्हारे कौतुक हैं(7){188}
(7) और जिस अज़ाब के तुम मुस्तहिक़ हो वह जो अज़ाब चाहेगा तुम पर उतारेगा.

तो उन्होंने उसे झुटलाया तो उन्हें शामियाने वाले दिन के अज़ाब ने आ लिया, बेशक वह बड़े दिन का अज़ाब था (8){189}
(8) जो कि इस तरह हुआ कि उन्हें शदीद गर्मी पहुंची, हवा बन्द हुई और सात रोज़ गर्मी के अज़ाब में गिरफ़्तार रहे. तहख़ानों में जाते, वहाँ और ज़्यादा गर्मी पाते, इसके बाद एक बादल आया, सब उसके नीचे जमा हो गए. उससे आग बरसी और सब जल गए. इस घटना का बयान सूरए अअराफ़ में और सूरए हूद में गुज़र चुका है.
बेशक इसमें ज़रूर निशानी है, और उनमें बहुत मुसलमान न थे{190} और बेशक तुम्हारा रब ही इज़्ज़त वाला मेहरबान है{191}

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