26 – सूरए शुअरा – छटा रूकू

26 – सूरए शुअरा – छटा रूकू

كَذَّبَتْ قَوْمُ نُوحٍ ٱلْمُرْسَلِينَ
إِذْ قَالَ لَهُمْ أَخُوهُمْ نُوحٌ أَلَا تَتَّقُونَ
إِنِّى لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌۭ
فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ
وَمَآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِىَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ ٱلْعَٰلَمِينَ
فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ
۞ قَالُوٓا۟ أَنُؤْمِنُ لَكَ وَٱتَّبَعَكَ ٱلْأَرْذَلُونَ
قَالَ وَمَا عِلْمِى بِمَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
إِنْ حِسَابُهُمْ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّى ۖ لَوْ تَشْعُرُونَ
وَمَآ أَنَا۠ بِطَارِدِ ٱلْمُؤْمِنِينَ
إِنْ أَنَا۠ إِلَّا نَذِيرٌۭ مُّبِينٌۭ
قَالُوا۟ لَئِن لَّمْ تَنتَهِ يَٰنُوحُ لَتَكُونَنَّ مِنَ ٱلْمَرْجُومِينَ
قَالَ رَبِّ إِنَّ قَوْمِى كَذَّبُونِ
فَٱفْتَحْ بَيْنِى وَبَيْنَهُمْ فَتْحًۭا وَنَجِّنِى وَمَن مَّعِىَ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ
فَأَنجَيْنَٰهُ وَمَن مَّعَهُۥ فِى ٱلْفُلْكِ ٱلْمَشْحُونِ
ثُمَّ أَغْرَقْنَا بَعْدُ ٱلْبَاقِينَ
إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَءَايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ

नूह की क़ौम ने पैग़म्बरों कोझुटलाया (1){105}
(1) यानी नूह अलैहिस्सलाम का झुटलाना सारे पैग़म्बरों का झुटलाना है क्योंकि दीन सारे रसूलों का एक है और हर एक नबी लोगों को तमाम नबियों पर ईमान लाने की दावत देते हैं.

जबकि उनसे उनके हम क़ौम नूह ने कहा क्या तुम डरते नहीं(2){106}
(2) अल्लाह तआला से, कि कुफ़्र और गुनाह का त्याग करो.

बेशक मैं तुम्हारे लिए अल्लाह का भेजा हुआ अमीन हूँ (3){107}
(3) उसकी वही और रिसालत की तबलीग़ पर, और आपकी अमानत आपकी क़ौम मानती थी जैसे कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के अमीन और ईमानदार होने पर सारा अरब सहमत था.

तो अल्लाह से डरो और मेरा हुक्म मानो(4){108}
(4) जो मैं तौहीद और ईमान और अल्लाह की फ़रमाँबरदारी के बारे में देता हूं.

और मैं उस पर तुम से कुछ उजरत नहीं मांगता, मेरा अज्र तो उसी पर है जो सारे जगत का रब है {109} तो अल्लाह से डरो और मेरा हुक्म मानो{110} बोले क्या हम तुम पर ईमान ले आएं और तुम्हारे साथ कमीने हुए हैं (5){111}
(5) यह बात उन्होंने घमण्ड से कही. ग़रीबों के पास बैठना उन्हें गवारा न था. इसमें वो अपना अपमान समझते थे. इसलिये ईमान जैसी नेअमत से मेहरूम रहे. कमीने से उनकी मुराद ग़रीब और व्यवसायी लोग थे और उनको ज़लील, तुच्छ और कमीना कहना, यह काफ़िरों का घमण्ड था वरना वास्तव में व्यवसाय और पेशा हैसियत दीन से आदमी को ज़लील नहीं करता. ग़िना अस्ल में दीनी अमीरी है और नसब तक़वा का नसब. मूमिन को ज़लील कहना जाइज़ नहीं, चाहे वह कितना ही मोहताज और नादार हो या वह किसी नसब का हो. (मदारिक).

फ़रमाया मुझे क्या ख़बर उनके काम क्या हैं(6){112}
(6) वे क्या पेशा करते हैं, मुझे इससे क्या मतलब , मैं उन्हें अल्लाह की तरफ़ दावत देता हूँ.

उनका हिसाब तो मेरे रब ही पर है(7)
(7) वही उन्हें जज़ा देगा.

अगर तुम्हें हिस (ज्ञान) हो (8){113}
(8) तो न तुम उन्हें ऐब लगाओ, न पेशों के कारण उनसे मुंह फेरो. फिर क़ौम ने कहा कि आप कमीनों को अपनी मजलिस से निकाल दीजिये ताकि हम आप के पास आएं और आपकी बात मानें. इसके जवाब में फ़रमाया.

और मैं मुसलमानों को दूर करने वाला नहीं(9){114}
(9) यह मेरी शान नहीं कि मैं तुम्हारी ऐसी इच्छाओ को पूरा करूं और तुम्हारे ईमान के लालच में मुसलमानों को अपने पास से निकाल दूं.

मैं तो नहीं मगर साफ़ डर सुनाने वाला(10){115}
(10) खुले प्रमाण के साथ, जिस से सच्चाई और बातिल में फ़र्क़ हो जाए तो जो ईमान लाए वही मेरे क़रीब है और जो ईमान न लाए, वही दूर.

बोले ऐ नूह अगर तुम बाज़ न आए (11)
(11)  दावत और डराने से.

तो ज़रूर संगसार (पथराव) किये जाओगे (12){116}
(12)  हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने अल्लाह की बारगाह में.

अर्ज़ की ऐ मेरे रब मेरी क़ौम ने मुझे झुटलाया (13){117}
(13) तेरी वही और रिसालत में. मुराद आपकी यह थी कि मैं जो उन के हक़ में बददुआ करता हूँ उसका कारण यह नहीं है कि उन्होंने मुझे संगसार करने की धमकी दी. न यह कि उन्होंने मेरे मानने वालों को ज़लील समझा. बल्कि मेरी दुआ का कारण यह है कि उन्हों ने तेरे कलाम को झुटलाया और तेरी रिसालत को क़ुबूल करने से इन्कार किया.

तो मुझ में और उनमें पूरा फ़ैसला करदे और मुझे मेरे साथ वाले मुसलमानों को निजात दे(14){118}
(14) उन लोगों की शामतें आमाल से.

तो हमने बचा लिया उसे और उसके साथ वालों को भरी हुई किश्ती में(15) {119}
(15) जो आदमियों, पक्षियों और जानवरों से भरी हुई थी.

फिर उसके बाद(16)
(16)यानी हज़रत नूह अलैहिस्सलाम और उनके साथियों को निजात देने के बाद.

हमने बाक़ियों को डुबो दिया {120} बेशक इसमें ज़रूर निशानी है, और उनमें अकसर मुसलमान न थे{121} और बेशक तुम्हारा रब ही इज़्ज़त वाला मेहरबान है{122}

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