26 – सूरए शुअरा – आठवाँ रूकू

26 – सूरए शुअरा – आठवाँ रूकू

كَذَّبَتْ ثَمُودُ ٱلْمُرْسَلِينَ
إِذْ قَالَ لَهُمْ أَخُوهُمْ صَٰلِحٌ أَلَا تَتَّقُونَ
إِنِّى لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌۭ
فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ
وَمَآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِىَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ ٱلْعَٰلَمِينَ
أَتُتْرَكُونَ فِى مَا هَٰهُنَآ ءَامِنِينَ
فِى جَنَّٰتٍۢ وَعُيُونٍۢ
وَزُرُوعٍۢ وَنَخْلٍۢ طَلْعُهَا هَضِيمٌۭ
وَتَنْحِتُونَ مِنَ ٱلْجِبَالِ بُيُوتًۭا فَٰرِهِينَ
فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ
وَلَا تُطِيعُوٓا۟ أَمْرَ ٱلْمُسْرِفِينَ
ٱلَّذِينَ يُفْسِدُونَ فِى ٱلْأَرْضِ وَلَا يُصْلِحُونَ
قَالُوٓا۟ إِنَّمَآ أَنتَ مِنَ ٱلْمُسَحَّرِينَ
مَآ أَنتَ إِلَّا بَشَرٌۭ مِّثْلُنَا فَأْتِ بِـَٔايَةٍ إِن كُنتَ مِنَ ٱلصَّٰدِقِينَ
قَالَ هَٰذِهِۦ نَاقَةٌۭ لَّهَا شِرْبٌۭ وَلَكُمْ شِرْبُ يَوْمٍۢ مَّعْلُومٍۢ
وَلَا تَمَسُّوهَا بِسُوٓءٍۢ فَيَأْخُذَكُمْ عَذَابُ يَوْمٍ عَظِيمٍۢ
فَعَقَرُوهَا فَأَصْبَحُوا۟ نَٰدِمِينَ
فَأَخَذَهُمُ ٱلْعَذَابُ ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَءَايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ

समूद ने रसूलों को झुटलाया {141} जब कि उनसे उनके हमक़ौम सालेह ने फ़रमाया क्या डरते नहीं {142} बेशक मैं तुम्हारे लिये अल्लाह का अमानतदार रसूल हूँ {143} तो अल्लाह से डरो और मेरा हुक्म मानो{144} और मैं तुमसे कुछ इसपर उजरत नहीं मांगता मेरा अज्र तो उसी पर है जो सारे जगत का रब है{145} क्या तुम यहाँ की( 1)
(1) यानी दुनिया की.

नेअमतों में चैन से छोड़ दिये जाओगे (2){146}
(2) कि ये नेअमतें कभी ज़ायल न हों और कभी अज़ाब न आए, कभी मौत न आए. आगे उन नेअमतों का बयान है.

बाग़ों और झरनों {147} और खेतों और ख़ज़ूरों में जिनका शग़ूफ़ा (कली) नर्म नाज़ुक{148} और पहाड़ों में से घर तराशते हो उस्तादी से(3){149}
(3) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि “उस्तादी से” का मतलब घमण्ड है. मानी ये हुए कि कारीगरी पर घमण्ड करते, इतराते.

तो अल्लाह से डरो और मेरा हुक्म मानो{150} और हद से बढ़ने वालों के कहने पर न चलो(4){151}
(4) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि हद से बढ़ने वालों से मुराद मुश्रिक लोग हैं. कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा – वो नौ व्यक्ति हें जिन्होंने ऊंटनी को क़त्ल किया.

वो जो ज़मीन में फ़साद फैलाते हैं(5)
(5) कुफ़्र और ज़ुल्म और गुनाहों के साथ.

और बनाव नहीं करते(6){152}
(6) ईमान लाकर और न्याय स्थापित करके और अल्लाह के फ़रमाँबरदार होकर. मानी ये है कि उसका फ़साद ठोस है जिसमें किसी तरह की नेकी का शायबा भी नहीं और कुछ फ़साद करने वाले ऐसे भी होते हैं कि कुछ फ़साद भी करते हैं, कुछ नेकी भी उनमें होती है. मगर ये ऐसे नहीं हैं.

बोले तुम पर तो जादू हुआ है(7){153}
(7) यानी बार बार बहुतात से जादू हुआ है. जिसकी वजह से अक़्ल ठिकाने पर नहीं रही. (मआज़ल्लाह)

तुम तो हमीं जैसे आदमी हो, तो कोई निशानी लाओ (8)
(8)  अपनी सच्चाई की.

अगर सच्चे हो(9){154}
(9) रिसालत के दावे में.

फ़रमाया ये ऊंटनी है एक दिन इसके पीने की बारी (10)
(10) इसमें उससे मज़ाहिमत मत करो, यह एक ऊंटनी थी जो उनके चमत्कार तलब करने पर उनकी ख़्वाहिश के अनुसार हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम की दुआ से पत्थर से निकली थी. उसका सीना साठ गज़ का था. जब उसके पीने का दिन होता तो वह वहाँ का सारा पानी पी जाती और जब लोगों के पीने का दिन होता तो उस दिन न पीती. (मदारिक)

और एक निश्चित दिन तुम्हारी बारी{155} और इसे बुराई के साथ न छुओ (11)
(11) न उसको मारो और न उसकी कूंचें काटो.

कि तुम्हें बड़े दिन का अज़ाब आ लेगा(12){156}
(12) अज़ाब उतरने की वजह से उस दिन को बड़ा फ़रमाया गया ताकि मालूम हो कि वह अज़ाब इस क़दर बड़ा और सख़्त था कि जिस दिन उतरा उसको उसकी वजह से बड़ा फ़रमाया गया.

इस पर उन्होंने उसकी कूंचें काट दी(13)
(13) कूंचें काटने वाले व्यक्ति का नाम क़िदार था और वो लोग उसके करतूत से राज़ी थे इसलिये कूंचें काटने की निस्बत उन सब की तरफ़ की गई.

फिर सुब्ह को पछताते रह गए(14){157}
(14) कूंचें काटने पर अज़ाब उतरने के डर से न कि गुनाहों पर तौबह करने हेतु शर्मिन्दा हुए हों, या यह बात कि अज़ाब के निशान देखकर शर्मिन्दा हुए. ऐसे वक़्त की शर्मिन्दगी लाभदायक नहीं.

तो उन्हें अज़ाब ने आ लिया, (15)
(15)जिसकी उन्हें ख़बर दी गई थी, तो हलाक हो गए.
बेशक इसमें ज़रूर निशानी है, और उनमें बहुत मुसलमान न थे{158} और बेशक तुम्हारा रब ही इज़्ज़त वाला मेहरबान है{159}

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