26 – सूरए शुअरा – पाँचवां रूकू

26 – सूरए शुअरा – पाँचवां रूकू

وَٱتْلُ عَلَيْهِمْ نَبَأَ إِبْرَٰهِيمَ
إِذْ قَالَ لِأَبِيهِ وَقَوْمِهِۦ مَا تَعْبُدُونَ
قَالُوا۟ نَعْبُدُ أَصْنَامًۭا فَنَظَلُّ لَهَا عَٰكِفِينَ
قَالَ هَلْ يَسْمَعُونَكُمْ إِذْ تَدْعُونَ
أَوْ يَنفَعُونَكُمْ أَوْ يَضُرُّونَ
قَالُوا۟ بَلْ وَجَدْنَآ ءَابَآءَنَا كَذَٰلِكَ يَفْعَلُونَ
قَالَ أَفَرَءَيْتُم مَّا كُنتُمْ تَعْبُدُونَ
أَنتُمْ وَءَابَآؤُكُمُ ٱلْأَقْدَمُونَ
فَإِنَّهُمْ عَدُوٌّۭ لِّىٓ إِلَّا رَبَّ ٱلْعَٰلَمِينَ
ٱلَّذِى خَلَقَنِى فَهُوَ يَهْدِينِ
وَٱلَّذِى هُوَ يُطْعِمُنِى وَيَسْقِينِ
وَإِذَا مَرِضْتُ فَهُوَ يَشْفِينِ
وَٱلَّذِى يُمِيتُنِى ثُمَّ يُحْيِينِ
وَٱلَّذِىٓ أَطْمَعُ أَن يَغْفِرَ لِى خَطِيٓـَٔتِى يَوْمَ ٱلدِّينِ
رَبِّ هَبْ لِى حُكْمًۭا وَأَلْحِقْنِى بِٱلصَّٰلِحِينَ
وَٱجْعَل لِّى لِسَانَ صِدْقٍۢ فِى ٱلْءَاخِرِينَ
وَٱجْعَلْنِى مِن وَرَثَةِ جَنَّةِ ٱلنَّعِيمِ
وَٱغْفِرْ لِأَبِىٓ إِنَّهُۥ كَانَ مِنَ ٱلضَّآلِّينَ
وَلَا تُخْزِنِى يَوْمَ يُبْعَثُونَ
يَوْمَ لَا يَنفَعُ مَالٌۭ وَلَا بَنُونَ
إِلَّا مَنْ أَتَى ٱللَّهَ بِقَلْبٍۢ سَلِيمٍۢ
وَأُزْلِفَتِ ٱلْجَنَّةُ لِلْمُتَّقِينَ
وَبُرِّزَتِ ٱلْجَحِيمُ لِلْغَاوِينَ
وَقِيلَ لَهُمْ أَيْنَ مَا كُنتُمْ تَعْبُدُونَ
مِن دُونِ ٱللَّهِ هَلْ يَنصُرُونَكُمْ أَوْ يَنتَصِرُونَ
فَكُبْكِبُوا۟ فِيهَا هُمْ وَٱلْغَاوُۥنَ
وَجُنُودُ إِبْلِيسَ أَجْمَعُونَ
قَالُوا۟ وَهُمْ فِيهَا يَخْتَصِمُونَ
تَٱللَّهِ إِن كُنَّا لَفِى ضَلَٰلٍۢ مُّبِينٍ
إِذْ نُسَوِّيكُم بِرَبِّ ٱلْعَٰلَمِينَ
وَمَآ أَضَلَّنَآ إِلَّا ٱلْمُجْرِمُونَ
فَمَا لَنَا مِن شَٰفِعِينَ
وَلَا صَدِيقٍ حَمِيمٍۢ
فَلَوْ أَنَّ لَنَا كَرَّةًۭ فَنَكُونَ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ
إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَءَايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيم

और उनपर पढ़ो ख़बर इब्राहीम की(1){61}
(1) यानी मुश्रिकों पर.

जब उसने अपने बाप और अपनी क़ौम से फ़रमाया तुम क्या पूजते हो (2){70}
(2) हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम जानते थे कि वह लोग बुत परस्त है इसके बावुजूद आपका सवाल फ़रमाना इसलिये था ताकि उन्हें दिखा दें कि जिन चीज़ों को वो लोग पूजते हैं वो किसी तरह उसके मुस्तहिक़ नहीं.

बोले हम बुतों को पूजते हैं फिर उनके सामने आसन मारे रहते हैं{71} फ़रमाया क्या वो तुम्हारी सुनते हैं जब तुम पुकारो{72} या तुम्हारा कुछ भला बुरा करते हैं(3){73}
(3) जब यह कुछ नहीं तो उन्हें तुमने मअबूद कैसे ठहराया.

बोले बल्कि हमने अपने बाप दादा को ऐसा ही करते पाया {74} फ़रमाया तो क्या तुम देखते हो ये जिन्हें पूज रहे हो{75} तुम और तुम्हारे अगले बाप दादा (4){76}
(4) कि ये न इल्म रखते हैं न क़ुदरत, न कुछ सुनते हैं न कोई नफ़ा या नुक़सान पहुंचा सकते हैं.

बेशक वो सब मेरे दुश्मन हैं(5)
(5) मैं उनका पूजा जाना गवारा नहीं कर सकता.

मगर पर्वरदिगारे आलम(6){77}
(6) मेरा रब है, मेरे काम बनाने वाला है, मैं उसकी इबादत करता हूँ, वही इबादत के लायक़ है उसके गुण ये हैं.

वो जिसने मुझे पैदा किया(7)
(7) कुछ नहीं से सब कुछ फ़रमाया और अपनी इताअत के लिये बनाया.

तो वह मुझे राह देगा(8){78}
(8) दोस्ती के आदाब की, जैसी कि पहले हिदायत फ़रमा चुका है दीन और दुनिया की नेक बातों की.

और वह जो मुझे खिलाता और पिलाता है(9){79}
(9) और मेरा रोज़ी देने वाला है.

और जब मैं बीमार हूँ तो वही मुझे शिफ़ा देता है(10){80}
(10) मेरी बीमारियों को दूर करता है. इब्ने अता ने कहा, मानी ये है कि जब मैं ख़ल्क़ की दीद से बीमार होता है, और सच्चाई के अवलोकन से मुझे शिफ़ा यानी अच्छाई अता फ़रमाता है.

और वह मुझे वफ़ात (मृत्यु) देगा फिर मुझे ज़िन्दा करेगा(11){81}
(11)  मौत और ज़िन्दगी उसकी क़ुदरत के अन्तर्गत है.

और वह जिसकी मुझे आस लगी है कि मेरी ख़ताएं क़यामत के दिन बख़्शेगा(12){82}
(12) नबी मअसूम है. गुनाह उनसे होते ही नहीं, उनका इस्तिग़फ़ार यानी माफ़ी माँगना अपने रब के समक्ष विनम्रता है, और उम्मत के लिये माफ़ी माँगने की तालीम है, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का अल्लाह के इन गुणों को बयान करना अपनी क़ौम पर हुज्जत क़ायम करना है कि मअबूद वही हो सकता है जिसके ये गुण हैं.

ऐ मेरे रब मुझे हुक्म अता कर(13)
(13) हुक्म से या इल्म मुराद है या हिक़मत या नबुव्वत.

और मुझे उनसे मिला दे जो तेरे ख़ास कुर्ब (समीपता) के अधिकारी है (14){83}
(14) यानी नबी अलैहिमुस्सलाम. और आपकी यह दुआ क़ुबूल हुई. चुनान्चे अल्लाह तआला फ़रमाता है “व इन्नहू फ़िल आख़िरते लमिनस सॉलिहीन”.

और मेरी सच्ची नामवरी रख पिछलों में(15) {84}
(15) यानी उन उम्मतों में जो मेरे बाद आएं. चुनांन्चे अल्लाह तआला ने उनको यह अता फ़रमाया कि तमाम दीनों वाले उनसे महब्बत रखते हैं और उनकी तारीफ़ करते हैं.

और मुझे उनमें कर जो चैन के बाग़ों के वारिस हैं(16){85}
(16) जिन्हें तू जन्नत अता फ़रमाएगा.

और मेरे बाप को बख़्श दे(17)
(17) तौबह और ईमान अता फ़रमाकर, और यह दुआ आपने इस लिये फ़रमाई कि जुदाई के वक़्त आपके वालिद ने आपसे ईमान लाने का वादा किया था. जब ज़ाहिर हो गया कि वह ख़ुदा का दुश्मन है, उसका वादा झूठ था, तो आप उससे बेज़ार हो गए, जैसा कि सूरए बराअत में है “माकानस-तिग़फारो इब्राहीमा लिअबीहे इल्ला अन मौइदतिन वअदहा इय्याहो फ़लम्मा तबय्यना लहू अन्नहू अदुव्वुन लिल्लाहे तबर्रआ मिन्हो”. यानी और इब्राहीम का अपने बाप की बख़्शिश चाहना वह तो न था मगर एक वादे के सबब जो उससे कर चुका था, फिर जब इब्राहीम को खुल गया कि वह अल्लाह का दुश्मन है, उससे तिनका तोड़ दिया, बेशक इब्राहीम ज़रूर बहुत आहें करने वाला मुतहम्मिल है. (सूरए तौबह, आयत 114).

बेशक वह गुमराह है{86} और मुझे रूस्वा न करना जिस दिन सब उठाए जाएंगे (18){87}
(18) यानी क़यामत के दिन.

जिस दिन न माल काम आएगा न बेटे{88} मगर वह जो अल्लाह के हुज़ूर हाज़िर हुआ सलामत दिल लेकर (19){89}
(19) जो शिर्क, कुफ़्र  दोहरी प्रवृति से पाक हो उसको उसका माल भी नफ़ा देगा जो राहे ख़ुदा में ख़र्च किया हो  और औलाद भी जो सालेह हो, जैसा कि हदीस शरीफ़ में है कि आदमी मरता है, उसके अमल मुनक़ते हो जाते हैं सिवाय तीन के. एक सदक़ए जारिया, दूसरा वह माल जिससे लोग नफ़ा उठाएं, तीसरी नेक औलाद जो उसके लिये दुआ करे.

और क़रीब लाई जाएगी जन्नत पर परहेज़गारों के लिये(20){90}
(20) कि उसको देखेंगे.

और ज़ाहिर की जाएगी दोज़ख़ गुमराहों के लिये{91} और उनसे कहा जाएगा (21)
(21) मलामत और फटकार के तौर पर, उनके कुफ़्र व शिर्क पर.

कहां हैं वो जिन को तुम पूजते थे {92} अल्लाह के सिवा, क्या वो तुम्हारी मदद करेंगे(22)
(22) अल्लाह के अज़ाब से बचाकर.

या बदला लेंगे{93} तो औंधा दिये गए जहन्नम में वह और सब गुमराह (23){94}
(23) यानी बुत और उनके पुजारी सब औंधे करके जहन्नम में डाल दिये जाएंगे.

और इब्लीस के लश्कर सारे(24){95}
(24) यानी उसका अनुकरण  करने वाले जिन्न हों या इन्सान. कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा कि इब्लीस के लश्करों से उसकी सन्तान मुराद है.

कहेंगे और वो उसमें आपस में झगड़ते होंगे{96} ख़ुदा की क़सम बेशक हम खुली गुमराही में थे{97} जब कि तुम्हें सारे जगत के रब के बराबर ठहराते थे{98} और हमें न बहकाया मगर मुजरिमों ने(25){99}
(25) जिन्होंने बुत परस्ती की दावत दी या वो पहले लोग जिनका हमने अनुकरण किया या इब्लीस और उसकी सन्तान ने.

तो अब हमारा कोई सिफ़ारिशी नहीं(26){100}
(26) जैसे कि ईमान वालों के लिये अम्बिया और औलिया और फ़रिश्ते और मूमिनीन शफ़ाअत करने वाले हैं.

और न कोई ग़मख़्वार दोस्त(27) {101}
(27) जो काम आए, यह बात काफ़िर उस वक़्त कहेंगे जब देखेंगे कि अम्बिया और औलिया और फ़रिश्ते और नेक बन्दे ईमानदारों की शफ़ाअत कर रहे हैं और उनकी दोस्ती काम आ रही है. हदीस शरीफ़ में है कि जन्नती कहेगा, मेरे उस दोस्त का क्या हाल है और वह दोस्त गुनाहों की वजह से जहन्नम में होगा. अल्लाह तआला फ़रमाएगा कि इसके दोस्त को निकालों और जन्नत में दाख़िल करो तो जो लोग जहन्नम में बाक़ी रह जाएंगे वो ये कहेंगे कि हमारा कोई सिफ़ारशी नहीं है और न कोई दुख बाँटने वाला दोस्त, हसन रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया, ईमानदार दोस्त बढ़ाओ क्योंकि वो क़यामत के दिन शफ़ाअत करेंगे.

तो किसी तरह हमें फिर जाना होता(28)
(28) दुनिया में.
कि हम मुसलमान हो जाते {102} बेशक इसमें निशानी है, और उनमें बहुत ईमान वाले न थे{103} और बेशक तुम्हारा रब ही इज़्ज़त वाला मेहरबान है{104}

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