25 सूरए फ़ुरक़ान – पाँचवां रूकू

25 सूरए फ़ुरक़ान – पाँचवां रूकू

أَلَمْ تَرَ إِلَىٰ رَبِّكَ كَيْفَ مَدَّ ٱلظِّلَّ وَلَوْ شَآءَ لَجَعَلَهُۥ سَاكِنًۭا ثُمَّ جَعَلْنَا ٱلشَّمْسَ عَلَيْهِ دَلِيلًۭا
ثُمَّ قَبَضْنَٰهُ إِلَيْنَا قَبْضًۭا يَسِيرًۭا
وَهُوَ ٱلَّذِى جَعَلَ لَكُمُ ٱلَّيْلَ لِبَاسًۭا وَٱلنَّوْمَ سُبَاتًۭا وَجَعَلَ ٱلنَّهَارَ نُشُورًۭا
وَهُوَ ٱلَّذِىٓ أَرْسَلَ ٱلرِّيَٰحَ بُشْرًۢا بَيْنَ يَدَىْ رَحْمَتِهِۦ ۚ وَأَنزَلْنَا مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءًۭ طَهُورًۭا
لِّنُحْۦِىَ بِهِۦ بَلْدَةًۭ مَّيْتًۭا وَنُسْقِيَهُۥ مِمَّا خَلَقْنَآ أَنْعَٰمًۭا وَأَنَاسِىَّ كَثِيرًۭا
وَلَقَدْ صَرَّفْنَٰهُ بَيْنَهُمْ لِيَذَّكَّرُوا۟ فَأَبَىٰٓ أَكْثَرُ ٱلنَّاسِ إِلَّا كُفُورًۭا
وَلَوْ شِئْنَا لَبَعَثْنَا فِى كُلِّ قَرْيَةٍۢ نَّذِيرًۭا
فَلَا تُطِعِ ٱلْكَٰفِرِينَ وَجَٰهِدْهُم بِهِۦ جِهَادًۭا كَبِيرًۭا
۞ وَهُوَ ٱلَّذِى مَرَجَ ٱلْبَحْرَيْنِ هَٰذَا عَذْبٌۭ فُرَاتٌۭ وَهَٰذَا مِلْحٌ أُجَاجٌۭ وَجَعَلَ بَيْنَهُمَا بَرْزَخًۭا وَحِجْرًۭا مَّحْجُورًۭا
وَهُوَ ٱلَّذِى خَلَقَ مِنَ ٱلْمَآءِ بَشَرًۭا فَجَعَلَهُۥ نَسَبًۭا وَصِهْرًۭا ۗ وَكَانَ رَبُّكَ قَدِيرًۭا
وَيَعْبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَا لَا يَنفَعُهُمْ وَلَا يَضُرُّهُمْ ۗ وَكَانَ ٱلْكَافِرُ عَلَىٰ رَبِّهِۦ ظَهِيرًۭا
وَمَآ أَرْسَلْنَٰكَ إِلَّا مُبَشِّرًۭا وَنَذِيرًۭا
قُلْ مَآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ إِلَّا مَن شَآءَ أَن يَتَّخِذَ إِلَىٰ رَبِّهِۦ سَبِيلًۭا
وَتَوَكَّلْ عَلَى ٱلْحَىِّ ٱلَّذِى لَا يَمُوتُ وَسَبِّحْ بِحَمْدِهِۦ ۚ وَكَفَىٰ بِهِۦ بِذُنُوبِ عِبَادِهِۦ خَبِيرًا
ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا فِى سِتَّةِ أَيَّامٍۢ ثُمَّ ٱسْتَوَىٰ عَلَى ٱلْعَرْشِ ۚ ٱلرَّحْمَٰنُ فَسْـَٔلْ بِهِۦ خَبِيرًۭا
وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ ٱسْجُدُوا۟ لِلرَّحْمَٰنِ قَالُوا۟ وَمَا ٱلرَّحْمَٰنُ أَنَسْجُدُ لِمَا تَأْمُرُنَا وَزَادَهُمْ نُفُورًۭا

ऐ मेहबूब क्या तुमने अपने रब को न देखा(1)
(1) कि उसकी सनअत(सृजन-शक्ति) और क़ुदरत कितनी अजीब है.

कि कैसा फैलाया साया(2)
(2) सुब्हे सादिक़ के निकलने के बाद से सूर्योदय तक, कि उस वक़्त सारी धरती पर साया ही साया होता है, न धूप है न अंधेरा

और अगर चाहता तो उसे ठहराया हुआ कर देता(3)
(3) कि सूरज के निकलने से भी न मिटता.

फिर हमने सूरज को उसपर दलील किया{45} फिर हमने आहिस्ता आहिस्ता उसे अपनी तरफ़ समेटा (4){46}
(4) कि उदय होने के बाद सूरज जितना ऊपर होता गया, साया सिमटता गया.

और वही है जिसने रात को तुम्हारे लिये पर्दा किया और नींद को आराम, और दिन बनाया उठने के लिये(5){47}
(5)  कि उसमें रोज़ी तलाश करो और कामों में जुट जाओ. हज़रत लुक़मान ने अपने बेटे से फ़रमाया, जैसे सोते हो फिर उठते हो ऐसे ही मरोगे और मौत के बाद फिर उठोगे.

और वही है जिसने हवाएं भेजी अपनी रहमत के आगे, ख़ुशख़बरी सुनाती हुई,(6)
(6) यहाँ रहमत से मुराद बारिश है.

और हमने आसमान से पानी उतारा पाक करने वाला{48} ताकि हम उससे ज़िन्दा करें किसी मुर्दा शहर को(7)
(7) जहाँ की ज़मीन ख़ुश्की से बेजान हो गई.

और उसे पिलाएं अपने बनाए हुए बहुत से चौपाए और आदमियों को{49} और बेशक हमने उनमें पानी के फेरे रखे(8)
(8) कि कभी किसी शहर में बारिश हो कभी किसी में, कभी कहीं ज़्यादा हो कभी कहीं अलग तौर से, अल्लाह की हिकमत के अनुसार. एक हदीस में है कि आसमान से रात दिन की तमाम घड़ियों में बारिश होती रहती है, अल्लाह तआला उसे जिस प्रदेश की तरफ़ चाहता है फेरता है और जिस धरती को चाहता है सैराब करता है.

कि वो ध्यान करें,(9)
(9) और अल्लाह तआला की क़ुदरत और नेअमत में ग़ौर करें.

तो बहुत लोगों ने न माना नाशुक्री करना{50} और हम चाहते तो हर बस्ती में एक डर सुनाने वाला भेजते (10){51}
(10) और आप पर से डराने का बोझ कम कर देते लेकिन हमने सारी बस्तियों को डराने का बोझ आप ही पर रखा ताकि आप सारे जगत के रसूल होकर कुल रसूलों की फ़ज़ीलतों और बुज़ुर्गियों के संगम हो और नबुव्वत आप पर खत्म हो कि आप के बाद फिर कोई नबी न हो.

तो काफ़िरों का कहा न मान और इस क़ुरआन से उनपर जिहाद कर, बड़ा जिहाद{52} और वही है जिसने मिले हुए बहाए दो समन्दर, यह मीठा है बहुत मीठा और यह खारी है बहुत तल्ख़, और इन के बीच में पर्दा रखा और रोकी हुई आड़(11){53}
(11) कि न मीठा खारी हो, न खारी मीठा न कोई किसी के स्वाद को बदल सके जैसे कि दजलह, दरियाए शोर में मीलो तक चला जाता है और उसके पानी के स्वाद में कोई परिवर्तन नहीं आता, यह अल्लाह की अजीब शान है.

और वही है जिसने पानी से(12)
(12) यानी नुत्फ़े से.

बनाया आदमी, फिर उसके रिश्ते और ससुराल मुक़र्रर की(13)
(13) कि नस्ल चले.

और तुम्हारा रब क़ुदरत वाला है (14){54}
(14) कि उसने एक नुत्फ़े से दो क़िस्म के इन्सान पैदा किए, नर और मादा, फिर भी काफ़िरों का यह हाल है कि उसपर ईमान नहीं लाते.

और अल्लाह के सिवा ऐसों को पूजते हैं(15)
(15) यानी बुतों को.

जो उनका भला बुरा कुछ न करें, और काफ़िर अपने रब के मुक़ाबिल शैतान को मदद देता है(16){55}
(16) क्योंकि बुत परस्ती करना शैतान को मदद देना है.

और हमने तुम्हे न भेजा मगर(17)
(17) ईमान और फ़रमाँबरदारी पर जन्नत की.

ख़ुशी और (18)
(18) कुफ़्र और गुमराही पर जहन्नम के अज़ाब का.

डर सुनाता{56} तुम फ़रमाओ मैं इस(19)
(19) तबलीग़ और हिदायत.

पर तुम से कुछ उजरत (वेतन)नहीं मांगता मगर जो चाहे कि अपने रब की तरफ़ राह ले(20){57}
(20) और उसका क़ु्र्ब और उसकी रज़ा हासिल करे. मुराद यह है कि ईमानदारों का ईमान लाना और उनका अल्लाह की फ़रमाँबरदारी में जुट जाना ही मेरा बदला है क्योंकि अल्लाह तआला मुझे उसपर जज़ा अता फ़रमाएगा, इसीलिये कि उम्मत के नेक लोगों के ईमान और उनकी नेकियों के सवाब उन्हें मिलते हैं और उसके नबियों को भी जिनकी हिदायत से वो इस दर्जे पर पहुंचे.

और भरोसा करो उस ज़िन्दा पर जो कभी न मरेगा(21)
(21) उसी पर भरोसा करना चाहिये क्योंकि मरने वाले पर भरोसा करना समझ वाले की शान नहीं है.

और उसे सराहते हुए उसकी पाकी बोलो,(22)
(22) उसकी तस्बीह और तारीफ़ करो, उसकी फ़रमाँबरदारी करो और शुक्र अदा करो.

और वही काफ़ी है अपने बन्दों के गुनाहों पर ख़बरदार(23){58}
(23) न उससे किसी का गुनाह छुपे, न कोई उसकी पकड़ से अपने को बचा सके.

जिसने आसमान और ज़मीन और जो कुछ इन के बीच है छ दिन में बनाए(24)
(24) यानी उतनी मात्रा में, क्योंकि रात और दिन और सूरज तो थे ही नहीं और उतनी मात्रा में पैदा करना अपनी मख़लूक़ को आहिस्तगी और इत्मीनान सिखाने के लिये है, वरना वो एक पल में सब कुछ पैदा करने की क़ुदरत रखता है.

फिर अर्श पर इस्तिवा फ़रमाया जैसा उसकी शान के लायक़ है(25)
(25) बुज़ुर्गो का मज़हब यह है कि इस्तिवा और इस जैसे जो भी शब्द आए हैं हम उन पर ईमान रखते हैं और उनकी कैफ़ियत के पीछे नहीं पड़ते, उसको अल्लाह ही जाने. कुछ मुफ़स्सिरों ने इस्तिवा को बलन्दी और बरतरी के मानी में लिया है और यही बेहतर है…

वह बड़ी मेहर वाला, तो किसी जानने वाले से उसकी तअरीफ़ पूछ(26){59}
(26) इसमें इन्सान को सम्बोधन है कि हज़रत रहमान की विशेषताएं और सिफ़ात पहचानने वाले शख़्स से पूछे…

और जब उनसे कहा जाए(27)
(27) यानी जब सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम मुश्रिकों से फ़रमाएं कि…

रहमान को सज्दा करो कहते हैं रहमान क्या है क्या हम सज्दा कर लें जिसे तुम कहो(28)
(28) इससे उनका मक़सद यह है कि रहमान को जानते नहीं और यह बातिल है जो उन्होंने दुश्मनी के तहत कहा क्योंकि अरबी ज़बान जानने वाला ख़ूब जानता है कि रहमान का अर्थ बहुत रहमत वाला है और यह अल्लाह तआला ही की विशेषता है.

और इस हुक्म ने उन्हें और बिदकना बढ़ाया(29){60}
(29) यानी सज्दे का हुक्म उनके लिये और ज़्यादा ईमान से दूरी का कारण हुआ.

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