25 सूरए फ़ुरक़ान – तीसरा रूकू

उन्नीसवाँ पारा – व क़ालल्लज़ीना
सूरए फ़ुरक़ान (जारी)
25 सूरए फ़ुरक़ान – तीसरा रूकू

۞ وَقَالَ ٱلَّذِينَ لَا يَرْجُونَ لِقَآءَنَا لَوْلَآ أُنزِلَ عَلَيْنَا ٱلْمَلَٰٓئِكَةُ أَوْ نَرَىٰ رَبَّنَا ۗ لَقَدِ ٱسْتَكْبَرُوا۟ فِىٓ أَنفُسِهِمْ وَعَتَوْ عُتُوًّۭا كَبِيرًۭا
يَوْمَ يَرَوْنَ ٱلْمَلَٰٓئِكَةَ لَا بُشْرَىٰ يَوْمَئِذٍۢ لِّلْمُجْرِمِينَ وَيَقُولُونَ حِجْرًۭا مَّحْجُورًۭا
وَقَدِمْنَآ إِلَىٰ مَا عَمِلُوا۟ مِنْ عَمَلٍۢ فَجَعَلْنَٰهُ هَبَآءًۭ مَّنثُورًا
أَصْحَٰبُ ٱلْجَنَّةِ يَوْمَئِذٍ خَيْرٌۭ مُّسْتَقَرًّۭا وَأَحْسَنُ مَقِيلًۭا
وَيَوْمَ تَشَقَّقُ ٱلسَّمَآءُ بِٱلْغَمَٰمِ وَنُزِّلَ ٱلْمَلَٰٓئِكَةُ تَنزِيلًا
ٱلْمُلْكُ يَوْمَئِذٍ ٱلْحَقُّ لِلرَّحْمَٰنِ ۚ وَكَانَ يَوْمًا عَلَى ٱلْكَٰفِرِينَ عَسِيرًۭا
وَيَوْمَ يَعَضُّ ٱلظَّالِمُ عَلَىٰ يَدَيْهِ يَقُولُ يَٰلَيْتَنِى ٱتَّخَذْتُ مَعَ ٱلرَّسُولِ سَبِيلًۭا
يَٰوَيْلَتَىٰ لَيْتَنِى لَمْ أَتَّخِذْ فُلَانًا خَلِيلًۭا
لَّقَدْ أَضَلَّنِى عَنِ ٱلذِّكْرِ بَعْدَ إِذْ جَآءَنِى ۗ وَكَانَ ٱلشَّيْطَٰنُ لِلْإِنسَٰنِ خَذُولًۭا
وَقَالَ ٱلرَّسُولُ يَٰرَبِّ إِنَّ قَوْمِى ٱتَّخَذُوا۟ هَٰذَا ٱلْقُرْءَانَ مَهْجُورًۭا
وَكَذَٰلِكَ جَعَلْنَا لِكُلِّ نَبِىٍّ عَدُوًّۭا مِّنَ ٱلْمُجْرِمِينَ ۗ وَكَفَىٰ بِرَبِّكَ هَادِيًۭا وَنَصِيرًۭا
وَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لَوْلَا نُزِّلَ عَلَيْهِ ٱلْقُرْءَانُ جُمْلَةًۭ وَٰحِدَةًۭ ۚ كَذَٰلِكَ لِنُثَبِّتَ بِهِۦ فُؤَادَكَ ۖ وَرَتَّلْنَٰهُ تَرْتِيلًۭا
وَلَا يَأْتُونَكَ بِمَثَلٍ إِلَّا جِئْنَٰكَ بِٱلْحَقِّ وَأَحْسَنَ تَفْسِيرًا
ٱلَّذِينَ يُحْشَرُونَ عَلَىٰ وُجُوهِهِمْ إِلَىٰ جَهَنَّمَ أُو۟لَٰٓئِكَ شَرٌّۭ مَّكَانًۭا وَأَضَلُّ سَبِيلًۭا

और बोले वो जो(1)
(1) काफ़िर हैं. हश्र  और मरने के बाद दोबारा उठाए जाने को नहीं मानते इसी लिये….

हमारे मिलने की उम्मीद नहीं रखते, हम पर फ़रिश्ते क्यों न उतारे(2)
(2)  हमारे लिये रसूल बनाकर या सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत और रिसालत के गवाह बनाकर.

या हम अपने रब को देखते(3)
(3)  वह ख़ुद हमें ख़बर दे देता कि सैयदे आलम मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम उसके रसूल हैं.

बेशक अपने जी में बहुत ही ऊंची खींची और बड़ी सरकशी (नाफ़रमानी) पर आए (4){21}
(4) और उनका घमण्ड चरम सीमा को पहुंच गया सरकशी हद से गुज़र गई कि चमत्कारों का अवलोकन करने के बाद, फ़रिश्तों के अपने ऊपर उतरने और अल्लाह तआला को देखने का सवाल किया.

जिस दिन फ़रिश्तों को देखेंगे(5)
(5) यानी मौत के दिन या क़यामत के दिन.

वह दिन मुजरिमों की कोई ख़ुशी का न होगा(6)
(6)  क़यामत के दिन फ़रिश्ते ईमान वालों को ख़ुशख़बरी सुनाएंगे और काफ़िरों से कहेंगे कि तुम्हारे लिये कोई ख़ुशख़बरी नहीं. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि फ़रिश्ते कहेंगे कि मूमिन के सिवा किसी के लिये जन्नत में दाख़िल होना हलाल नहीं. इसलिये वह दिन काफ़िरों के वास्ते बहुत निराशा और दुख का होगा.

और कहेंगे, इलाही हम में उनमें कोई आड़ कर दे रूकी हुई(7){22}
(7) इस कलिमे से वो फ़रिश्तों से पनाह चाहेंगे.

और जो कुछ उन्होंने काम किये थे(8),
(8) कुफ़्र की हालत में,  जैसे रिश्तेदारों से अच्छा सुलूक, मेहमानदारी और अनाथों का ख़याल रखना वग़ैरह.

हमने क़स्द(इरादा) फ़रमाकर उन्हें बारीक़ बारीक़ ग़ुबार(धूल) के बिखरे हुए ज़र्रे कर दिया कि रौज़न (छेद) की धूप में नज़र आते हैं (9){23}
(9) न हाथ से छुए जाएं न उनका साया हो. मुराद यह है कि वो कर्म बातिल कर दिये गए. उनका कुछ फल और कोई फ़ायदा नहीं क्योंकि कर्मों की क़ुबूलियत के लिये ईमान शर्त है और वह उनके पास न था. इसके बाद जन्न्त वालों की बुज़ुर्गी बयान होती है.

जन्नत वालों का उस दिन अच्छा ठिकाना(10)
(10) और उनका स्थान उन घमण्डी मुश्रिकों से बलन्द और बेहतर.

और हिसाब के दोपहर के बाद अच्छी आराम की जगह {24} और जिस दिन फट जाएगा आसमान बादलों से और फ़रिश्ते उतारे जाएंगे पूरी तरह(11){25}
(11) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया, दुनिया का आसमान फटेगा और वहाँ के रहने वाले फ़रिश्ते उतरेंगे और वो सारे ज़मीन वालों से अधिक हैं, जिन्न और इन्सान सबसे. फिर  दूसरा आसमान फटेगा, वहाँ के रहने वाले उतरेंगे, वो दुनिया के आसमान के रहने वालों और जिन्न और इन्सान सब से ज़्यादा हैं. इसी तरह आसमान फटते जाएंगे और हर आसमान वालों की संख्या अपने मातहतों से ज़्यादा है, यहाँ तक कि सातवाँ आसमान फटेगा. फिर कर्रूबी फ़रिश्ते उतरेंगे, फिर अर्श उठाने वाले फ़रिश्ते और यह क़यामत का दिन होगा.

उस दिन सच्ची बादशाही रहमान की है, और वह दिन काफ़िरों पर सख़्त है(12){26}
(12) और अल्लाह के फ़ज़्ल से मुसलमानों पर आसान. हदीस शरीफ़ है कि क़यामत का दिन मुसलमानों पर आसान किया जाएगा यहाँ तक कि वो उनके लिये एक फ़र्ज़ नमाज़ से हल्का होगा जो दुनिया में पढी जाती थी.

और जिस दिन ज़ालिम अपने हाथ चबा चबा लेगा(13)
(13) निराशा और शर्मिन्दगी से. यह हाल अगरचे काफ़िरों के लिये आया है मगर अक़बह दिन अबी मुईत से इसका ख़ास सम्बन्ध है. अक़बह उबई बिन ख़लफ़ का गहरा दोस्त था. हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के फ़रमाने से उसने लाइलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह की गवाही दी और उसके बाद उबई बिन ख़लफ़ के ज़ोर डालने से फिर मुर्तद हो गया. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उसको मक़तूल होने की ख़बर दी. चुनाँन्चे बद्र में मारा गया. यह आयत उसके बारे में उतरी कि क़यामत के दिन उसको इन्तिहा दर्जे की हसरत और निदामत होगी. इस हसरत में वह अपने हाथ चाब चाब लेगा.

कि हाय किसी तरह से मैं ने रसूल के साथ राह ली होती(14){27}
(14) जन्नत और निजात की और उनका अनुकरण किया होता और उनकी हिदायत क़ुबूल की होती.

हाए, ख़राबी मेरी, हाय किसी तरह मैं ने फ़लाने(अमुक) को दोस्त न बनाया होता{28} बेशक उसने मुझे बहका दिया मेरे पास आई हुई नसीहत से,(15)
(15) यानी क़ुरआन और ईमान से.

और शैतान आदमी को बे मदद छोड़ देता है(16){29}
(16) और बला और अज़ाब उतरने के वक़्त उससे अलाहिदगी करता है. हज़रत अबू हुरैरह रदियल्लाहो अन्हो से अबू दाऊद और तिरमिज़ी में एक हदीस आई है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, आदमी अपने दोस्त के दीन पर होता है तो देखना चाहिये किस को दोस्त बनाता है. हज़रत अबू सईद खुदरी रदियल्लाहो अन्हो से रिवायत है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, हमनशीनी न करो मगर ईमानदार के साथ और खाना न खिलाओ मगर परहेज़गार को. बेदीन और बदमज़हब की दोस्ती और उसके साथ मिलना जुलना और महब्बत और सत्कार मना है.

और रसूल ने अर्ज़ की कि ऐ मेरे रब मेरी क़ौम ने इस क़ुरआन को छोड़ने के क़ाबिल ठहरा लिया(17){30}
(17) किसी ने उसको जादू कहा, किसी ने शेअर, और वो लोग ईमान लाने से मेहरूम रहे. इसपर अल्लाह तआला ने हुज़ूर को तसल्ली दी. और आपसे मदद का वादा फ़रमाया जैसा कि आगे इरशाद होता है.

और इसी तरह हमने हर नबी के लिये दुश्मन बना दिये थे मुजरिम लोग,(18)
(18) यानी नबियों के साथ बदनसीबों का यही सुलूक रहा है.

और तुम्हारा रब काफ़ी है हिदायत करने और मदद देने को{31} और काफ़िर बोले, क़ुरआन उनपर एक साथ क्यों न उतार दिया(19)
(19) जैसे कि तौरात व इन्जील व जुबूर में से हर एक किताब एक साथ उतरी थी. काफ़िरों की यह आलोचना बिल्कुल फ़ुज़ूल और निरर्थक है क्योंकि क़ुरआने मजीद का चमत्कारी होना हर हाल में एक सा है चाहे एक बार उतरे या थोड़ा थोड़ा करके, बल्कि थोड़ा थोड़ा उतारने में इसके चमत्कारी होने का और भी भरपूर प्रमाण है कि जब एक आयत उतरी और सृष्टि का उसके जैसा कलाम बनाने से आजिज़ होना ज़ाहिर हुआ, फिर दूसरी उतरी. इसी तरह इसका चमत्कार ज़ाहिर हुआ. इस तरह बराबर आयत-आयत होकर क़ुरआने पाक उतरता रहा और हर दम उसकी बेमिसाली और लोगों की आजिज़ी और लाचारी ज़ाहिर होती रही. ग़रज़ काफ़िरों का ऐतिराज़ केवल बेकार और व्यर्थ है. आयत में अल्लाह तआला थोड़ा थोड़ा करके उतारने की हिकमत ज़ाहिर फ़रमाता है.

हमने यूंही धीरे धीरे इसे उतारा है कि इससे तुम्हारा दिल मज़बूत करें(20)
(20) और संदेश का सिलसिला जारी रहने से आपके दिल को तस्कीन होती रहे और काफ़िरों को हर हर अवसरों पर जवाब मिलते रहें. इसके अलावा यह भी फ़ायदा है कि इसे याद करना सहल और आसान हो.

और हमने इसे ठहर ठहर कर पढ़ा(21){32}
(21) जिब्रईल की ज़बान से थोड़ा थोड़ा बीस या तेईस साल की मुद्दत में. या ये मानी हैं कि हमने आयत के बाद आयत थोड़ा थोड़ा करके उतारा. कुछ ने कहा कि अल्लाह तआला ने हमें क़िरअत में ठहर ठहर कर इत्मीनान से पढने और क़ुरआन शरीफ़ को अच्छी तरह अदा करने का हुक्म फ़रमाया जैसा कि दूसरी आयत में इरशाद हुआ व रत्तिलिल क़ुरआना तर्तीला (और क़ुरआन खूब ठहर ठहर कर पढो – सूरए मुज़्ज़म्मिल, आयत 4)

और वो कोई कहावत तुम्हारे पास न लाएंगे(22)
(22) यानी मुश्रिक आपके दीन के ख़िलाफ़ या आपकी नबुव्वत में आलोचना करने वाला कोई सवाल पेश न कर सकेंगे.

मगर हम हक़ (सत्य) और इससे बेहतर बयान ले आएंगे{33} वो जो जहन्नम की तरफ़ हांके जाएंगे अपने मुंह के बल, उनका ठिकाना सबसे बुरा(23)और वो सबसे गुमराह{34}
(23)  हदीस शरीफ़ में है कि आदमी क़यामत के दिन तीन तरीक़े पर उठाए जाएंगे. एक गिरोह सवारियों पर, एक समूह पैदल और एक जमाअत मुंह के बल घिसटती हुई. अर्ज़ किया गया या रसूलल्लाह, वो मुंह के बल कैसे चलेंगे. फ़रमाया जिसने पाँव पर चलाया हे वही मुंह के बल चलाएगा.

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