25 सूरए फ़ुरक़ान – छटा रूकू

25 सूरए फ़ुरक़ान – छटा रूकू

تَبَارَكَ ٱلَّذِى جَعَلَ فِى ٱلسَّمَآءِ بُرُوجًۭا وَجَعَلَ فِيهَا سِرَٰجًۭا وَقَمَرًۭا مُّنِيرًۭا
وَهُوَ ٱلَّذِى جَعَلَ ٱلَّيْلَ وَٱلنَّهَارَ خِلْفَةًۭ لِّمَنْ أَرَادَ أَن يَذَّكَّرَ أَوْ أَرَادَ شُكُورًۭا
وَعِبَادُ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلَّذِينَ يَمْشُونَ عَلَى ٱلْأَرْضِ هَوْنًۭا وَإِذَا خَاطَبَهُمُ ٱلْجَٰهِلُونَ قَالُوا۟ سَلَٰمًۭا
وَٱلَّذِينَ يَبِيتُونَ لِرَبِّهِمْ سُجَّدًۭا وَقِيَٰمًۭا
وَٱلَّذِينَ يَقُولُونَ رَبَّنَا ٱصْرِفْ عَنَّا عَذَابَ جَهَنَّمَ ۖ إِنَّ عَذَابَهَا كَانَ غَرَامًا
إِنَّهَا سَآءَتْ مُسْتَقَرًّۭا وَمُقَامًۭا
وَٱلَّذِينَ إِذَآ أَنفَقُوا۟ لَمْ يُسْرِفُوا۟ وَلَمْ يَقْتُرُوا۟ وَكَانَ بَيْنَ ذَٰلِكَ قَوَامًۭا
وَٱلَّذِينَ لَا يَدْعُونَ مَعَ ٱللَّهِ إِلَٰهًا ءَاخَرَ وَلَا يَقْتُلُونَ ٱلنَّفْسَ ٱلَّتِى حَرَّمَ ٱللَّهُ إِلَّا بِٱلْحَقِّ وَلَا يَزْنُونَ ۚ وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ يَلْقَ أَثَامًۭا
يُضَٰعَفْ لَهُ ٱلْعَذَابُ يَوْمَ ٱلْقِيَٰمَةِ وَيَخْلُدْ فِيهِۦ مُهَانًا
إِلَّا مَن تَابَ وَءَامَنَ وَعَمِلَ عَمَلًۭا صَٰلِحًۭا فَأُو۟لَٰٓئِكَ يُبَدِّلُ ٱللَّهُ سَيِّـَٔاتِهِمْ حَسَنَٰتٍۢ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ غَفُورًۭا رَّحِيمًۭا
وَمَن تَابَ وَعَمِلَ صَٰلِحًۭا فَإِنَّهُۥ يَتُوبُ إِلَى ٱللَّهِ مَتَابًۭا
وَٱلَّذِينَ لَا يَشْهَدُونَ ٱلزُّورَ وَإِذَا مَرُّوا۟ بِٱللَّغْوِ مَرُّوا۟ كِرَامًۭا
وَٱلَّذِينَ إِذَا ذُكِّرُوا۟ بِـَٔايَٰتِ رَبِّهِمْ لَمْ يَخِرُّوا۟ عَلَيْهَا صُمًّۭا وَعُمْيَانًۭا
وَٱلَّذِينَ يَقُولُونَ رَبَّنَا هَبْ لَنَا مِنْ أَزْوَٰجِنَا وَذُرِّيَّٰتِنَا قُرَّةَ أَعْيُنٍۢ وَٱجْعَلْنَا لِلْمُتَّقِينَ إِمَامًا
أُو۟لَٰٓئِكَ يُجْزَوْنَ ٱلْغُرْفَةَ بِمَا صَبَرُوا۟ وَيُلَقَّوْنَ فِيهَا تَحِيَّةًۭ وَسَلَٰمًا
خَٰلِدِينَ فِيهَا ۚ حَسُنَتْ مُسْتَقَرًّۭا وَمُقَامًۭا
قُلْ مَا يَعْبَؤُا۟ بِكُمْ رَبِّى لَوْلَا دُعَآؤُكُمْ ۖ فَقَدْ كَذَّبْتُمْ فَسَوْفَ يَكُونُ لِزَامًۢا

बड़ी बरकत वाला है जिसने आसमान में बुर्ज बनाए (1)
(1) हज़रत इब्ने  अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि बुर्ज से सात ग्रहों की मंज़िलें मुराद है जिनकी तादाद बारह है- (1) हमल(मेष),(2)सौर (वृषभ), (3) जौज़ा (मिथुन), (4) सरतान (कर्क), (5)असद (सिंह), (6) सुंबुला (कन्या), (7) मीज़ान (तुला), (8) अक़रब(वृश्चिक), (9) क़ौस (धनु), (10) जदी (मकर), (11)दलव (कुम्भ),  (12) हूत (मीन).

उनमें चिराग़ रखा(2)
(2) चिराग से यहाँ सूरज मुराद है.

और चमकता चाँद {61} और वही है जिसने रात और दिन की बदली रखी (3)
(3) कि उनमें एक के बाद दूसरा आता है और उसका क़ायम मुकाम होता है कि जिसका अमल रात या दिन में से किसी एक में क़ज़ा हो जाए तो दूसरे में अदा करे, ऐसा ही फ़रमाया हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने. और रात दिन का एक दूसरे के बाद आना और क़ायम मुकाम होना अल्लाह तआला की क़ुदरत और हिकमत का प्रमाण है.

उसके लिये जो ध्यान करना चाहे या शुक्र का इरादा करे{62} और रहमान के वो बन्दे कि ज़मीन पर आहिस्ता चलते हैं(4)
(4) इत्मीनान और विक़ार के साथ, विनम्रता की शान से, कि घमण्डी तरीक़े से जूते खटखटाते, पाँव ज़ोर से मारते, इतराते कि यह घमण्डियों का तरीक़ा है और शरीअत ने इसे मना फ़रमाया है.

और जब ज़ाहिल उनसे बात करते हैं(5)
(5) और कोई नागवार कलिमा या बेहूदा या अदब और तहज़ीब के ख़िलाफ़ बात कहते हैं…

तो कहते हैं बस सलाम(6){63}
(6) यह सलाम मुतारिकत का है यानी जाहिलों के साथ बहस या लड़ाई झगड़ा करने से परहेज़ करते हैं या ये मानी है कि ऐसी बात कहते हैं जो दुरूस्त हो और उसमें कष्ट और गुनाह से मेहफ़ूज़ रहें. हसन बसरी ने फ़रमाया कि यह तो उन बन्दों के दिन का हाल है. और उनकी रात का बयान आगे आता है. मुराद यह है कि उसकी मजलिसी ज़िन्दगी और लोगों के साथ व्यवहार ऐसा पाकीज़ा है. और उनकी एकान्त की ज़िन्दगी और सच्चाई के साथ सम्बन्ध यह है जो आगे बयान किया जाता है.

और वो जो रात काटते हैं अपने रब के लिये सज्दे और क़याम में(7){64}
(7) यानी नमाज़ और इबादत में रात भर जागते हैं और रात अपने रब की इबादत में गुज़ारते हैं और अल्लाह तआला अपने करम से थोड़ी इबादत वालों को भी रात भर जागने का सवाब अता फ़रमाता है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि जिस किसी ने इशा के बाद दो रकअत या ज़्यादा नफ़्ल पढे वह रात भर जागने वालों मे दाख़िल है. मुस्लम शरीफ़ में हज़रत उस्मान ग़नी रदियल्लाहो अन्हो से रिवायत है कि जिसने इशा की नमाज़ जमाअत से अदा की उसने आधी रात के क़याम का सवाब पाया और जिसने फ़ज्र भी जमाअत के साथ अदा की वह सारी रात इबादत करने वाले की तरह है.

और वो जो अर्ज़ करते हैं ऐ हमारे रब हमसे फेर दे जहन्नम का अज़ाब, बेशक उसका अज़ाब गले का गिल {फन्दा} है(8){65}
(8) यानी लाज़िम, जुदा न होने वाला. इस आयत में उन बन्दों की शब-बेदारी और इबादत का ज़िक्र फ़रमाने के बाद उनकी उस दुआ का बयान किया. इससे यह ज़ाहिर करना मक़सूद है कि वो इतनी ज़्यादा इबादत करने के बावुजूद अल्लाह तआला का ख़ौफ़ खाते हैं और उसके समक्ष गिड़गिड़ाते हैं.

बेशक वह बहुत ही बुरी ठहरने की जगह है{66} और वो कि जब ख़र्च करते हैं, न हद से बढ़ें और न तंगी करें(9)
(9) इसराफ़ गुनाहों में ख़र्च करने को कहते हैं. एक बुज़ुर्ग ने कहा कि इसराफ़ में भलाई नहीं, दूसरे बुज़ुर्ग ने कहा नेकी में इसराफ़ ही नहीं. और तंगी करना यह है कि अल्लाह तआला के निर्धारित   अधिकारों को अदा करने में कमी करे. यही हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया. हदीस शरीफ़ में है, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया  जिस ने किसी हक़ को मना किया उसने तंगी की और जिसने नाहक़ में ख़र्च किया उसने इसराफ़ किया. यहाँ उन बन्दों के ख़्रर्च करने का हाल बयान फ़रमाया जा रहा है कि वो इसराफ़ और तंगी के दोनों बुरे तरीक़ों से बचते हैं.

और इन दोनों के बीच एतिदाल {संतुलन} पर रहें(10){67}
(10) अब्दुल मलिक बिन मरवान ने हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रदियल्लाहो अन्हो से अपनी बेटी ब्याहते वक़्त ख़र्च का हाल पूछा तो हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ ने फ़रमाया कि नेकी दो बुराइयों के बीच है. इससे मुराद यह थी कि ख़र्च में बीच का तरीक़ा इख़्तियार करना नेकी है और वह इसराफ़ यानी हद से अधिक खर्च करने और तंगी के बीच है जो दोनों बुराईयाँ है. इससे अब्दुल मलिक ने पहचान लिया कि वह इस आयत के मज़मून की तरफ़ इशारा कर रहे हैं. मुफ़स्सिरों का क़ौल है कि इस आयत में जिन हज़रात का ज़िक्र है वो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के बड़े सहाबा हैं जो न स्वाद के लिये खाते हैं, न ख़ूबसूरती और ज़ीनत (श्रंगार) के लिये पहनते हैं. भूख रोकना, तन ढाँपना, सर्दी गर्मी की तकलीफ़ से बचना, इतना ही उनका मक़सद है.

और वो जो अल्लाह के साथ किसी दूसरे मअबूद को नहीं पूजते(11)
(11) शिर्क से बरी और बेज़ार हैं.

और उस जान को जिसकी अल्लाह ने हुरमत{इज़्ज़त} रखी(12)
(12) और उसका ख़ून मुबाह न किया जैसे कि मूमिन और एहद वाले उसको…

नाहक़ नहीं मारते और बदकारी नहीं करते, (13)
(13) नेकों से. इन बड़े गुनाहों की नफ़ी फ़रमाने में काफ़िरों पर तअरीज़ है जो इन बुराइयों में जकड़े हुए थे.

और जो वह काम करे वह सज़ा पाएगा, बढाया जाएगा उसपर अज़ाब क़यामत के दिन(14)
(14) यानी वह शिर्क के अज़ाब में भी गिरफ़्तार होगा और इन गुनाहों का अज़ाब उसपर और ज़्यादा किया जाएगा.

और हमेशा उसमें ज़िल्लत से रहेगा{69} मगर जो तौबह करे(15)
(15) शिर्क और बड़े गुनाहों से.

और ईमान लाए(16)
(16) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर.

और अच्छा काम करे(17)
(17) यानी तौबह के बाद नेकी अपनाए.

तो ऐसों की बुराइयों को अल्लाह भलाइयों में बदल देगा, (18)
(18) यानी बुराई करने के बाद नेकी की तोफ़ीक़ देकर या ये मानी कि बुराईयों को तौबह से मिटा देगा और उनकी जगह ईमान और फ़रमाँबरदारी वग़ैरह नेकियाँ क़ायम फ़रमाएगा. (मदारिक) मुस्लिम की हदीस में है कि क़यामत के दिन एक व्यक्ति हाज़िर किया जाएगा. फ़रिश्ते अल्लाह के हुक्म से उसके छोटे गुनाह एक एक करके उसको याद दिलाते जाएंगे. वह इक़रार करता जाएगा और अपने बड़े गुनाहों के पेश होने से डरता होगा. इसके बाद कहा जाएगा कि हर एक बुराई के बदले तुझे नेकी दी गई. यह बयान फ़रमाते हुए सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को अल्लाह तआला की बन्दानवाज़ी और उसकी करम की शान पर ख़ुशी हुई और नूरानी चेहरे पर सुरूर से तबस्सुम के निशान ज़ाहिर हुए.

और अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है{70} और जो तौबह करे और अच्छा काम करे तो वह अल्लाह की तरफ़ रूजू लाया जैसी चाहिये थी{71} और जो झूठी गवाही नहीं देते (19)
(19) और झूठों की मजलिस से अलग रहते हैं और उनके साथ मुख़ालिफ़त नहीं करते.

और जब बेहूदा पर गुज़रते हैं अपनी इज़्ज़त संभाले गुज़र जाते हैं(20){72}
(20) और अपने आए को लहव (व्यर्थ् कर्म) और बातिल से प्रभावित नहीं होने देते. ऐसी मजलिसों से परहेज़ करते हैं.

और वो कि जब उन्हें उनके रब की आयतें याद दिलाई जाएं तो उनपर (21)
(21)  अनजाने तरीक़े से. अज्ञानता के अन्दाज़ में.

बहरे अंधे होकर नहीं गिरते(22){73}
(22) कि न सोचें न समझें बल्कि होश के कानों से सुनते हैं और देखने वाली आँख से देखते हैं और नसीहत से फ़ायदा उठाते हैं. और इन आयतों पर फ़रमाँबरदारी के साथ अमल करते हैं.

और वो जो अर्ज़ करते हैं ऐ हमरे रब हमें दे हमारी बीबियों और हमारी औलाद से आँखों की ठण्डक(23)
(23) यानी फ़रहत और सुरूर. मुराद यह है कि हमें बीबियाँ और नेक औलाद, परहेज़ग़ार और अल्लाह से डरने वाली, अता फ़रमा कि उनके अच्छे कर्म, अल्लाह व रसूल के अहकाम का पालन देखकर हमारी आँखें ठण्डी और दिल ख़ुश हों.

और हमें परहेज़गारों का पेशवा बना(24){74}
(24) यानी हमें ऐसा परहेज़गार और ऐसा इबादत वाला और ख़ुदापरस्त बना कि हम परहेज़गारों की पेशवाई के क़ाबिल हों और वो दीन के कामों में हमारा अनुकरण करें. कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि इसमें दलील है कि आदमी को दीनी पेशवाई और सरदारी की रग़बत और तलब चाहिये. इन आयतों में अल्लाह तआला ने अपने नेक बन्दों के गुण बयान फ़रमाए. इसके बाद उनकी जज़ा ज़िक्र फ़रमाई जाती हैं.

उनको जन्नत का सब से ऊँचा बालाख़ाना इनाम मिलेगा बदला उनके सब्र का और वहां मुजरे और सलाम के साथ उनकी पेशवाई होगी(25){75}
(25) फ़रिश्ते अदब के साथ उनका सत्कार करेंगे या अल्लाह तआला उनकी तरफ़ सलाम भेजेगा.

हमेशा उसमें रहेंगे, क्या ही अच्छी ठहरने और बसने की जगह{76} तुम फ़रमाओ (26)
(26) ऐ नबियों के सरदार, मक्के वालों से कि….

तुम्हारी कुछ क़द्र नहीं मेरे रब के यहाँ अगर तुम उसे न पूजो तो तुमने झुटलाया(27)
(27) मेरे रसूल और मेरी किताब को…

तो अब होगा वह अज़ाब कि लिपट रहेगा(28){77}
(28) यानी हमेशा का अज़ाब और लाज़मी हलाकत.

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