23 सूरए मूमिनून-छटा रूकू

23 सूरए  मूमिनून-छटा रूकू

رَبِّ فَلَا تَجْعَلْنِى فِى ٱلْقَوْمِ ٱلظَّٰلِمِينَ
وَإِنَّا عَلَىٰٓ أَن نُّرِيَكَ مَا نَعِدُهُمْ لَقَٰدِرُونَ
ٱدْفَعْ بِٱلَّتِى هِىَ أَحْسَنُ ٱلسَّيِّئَةَ ۚ نَحْنُ أَعْلَمُ بِمَا يَصِفُونَ
وَقُل رَّبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنْ هَمَزَٰتِ ٱلشَّيَٰطِينِ
وَأَعُوذُ بِكَ رَبِّ أَن يَحْضُرُونِ
حَتَّىٰٓ إِذَا جَآءَ أَحَدَهُمُ ٱلْمَوْتُ قَالَ رَبِّ ٱرْجِعُونِ
لَعَلِّىٓ أَعْمَلُ صَٰلِحًۭا فِيمَا تَرَكْتُ ۚ كَلَّآ ۚ إِنَّهَا كَلِمَةٌ هُوَ قَآئِلُهَا ۖ وَمِن وَرَآئِهِم بَرْزَخٌ إِلَىٰ يَوْمِ يُبْعَثُونَ
فَإِذَا نُفِخَ فِى ٱلصُّورِ فَلَآ أَنسَابَ بَيْنَهُمْ يَوْمَئِذٍۢ وَلَا يَتَسَآءَلُونَ
فَمَن ثَقُلَتْ مَوَٰزِينُهُۥ فَأُو۟لَٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُفْلِحُونَ
وَمَنْ خَفَّتْ مَوَٰزِينُهُۥ فَأُو۟لَٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ خَسِرُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ فِى جَهَنَّمَ خَٰلِدُونَ
تَلْفَحُ وُجُوهَهُمُ ٱلنَّارُ وَهُمْ فِيهَا كَٰلِحُونَ
أَلَمْ تَكُنْ ءَايَٰتِى تُتْلَىٰ عَلَيْكُمْ فَكُنتُم بِهَا تُكَذِّبُونَ
قَالُوا۟ رَبَّنَا غَلَبَتْ عَلَيْنَا شِقْوَتُنَا وَكُنَّا قَوْمًۭا ضَآلِّينَ
رَبَّنَآ أَخْرِجْنَا مِنْهَا فَإِنْ عُدْنَا فَإِنَّا ظَٰلِمُونَ
قَالَ ٱخْسَـُٔوا۟ فِيهَا وَلَا تُكَلِّمُونِ
إِنَّهُۥ كَانَ فَرِيقٌۭ مِّنْ عِبَادِى يَقُولُونَ رَبَّنَآ ءَامَنَّا فَٱغْفِرْ لَنَا وَٱرْحَمْنَا وَأَنتَ خَيْرُ ٱلرَّٰحِمِينَ
فَٱتَّخَذْتُمُوهُمْ سِخْرِيًّا حَتَّىٰٓ أَنسَوْكُمْ ذِكْرِى وَكُنتُم مِّنْهُمْ تَضْحَكُونَ
إِنِّى جَزَيْتُهُمُ ٱلْيَوْمَ بِمَا صَبَرُوٓا۟ أَنَّهُمْ هُمُ ٱلْفَآئِزُونَ
قَٰلَ كَمْ لَبِثْتُمْ فِى ٱلْأَرْضِ عَدَدَ سِنِينَ
قَالُوا۟ لَبِثْنَا يَوْمًا أَوْ بَعْضَ يَوْمٍۢ فَسْـَٔلِ ٱلْعَآدِّينَ
قَٰلَ إِن لَّبِثْتُمْ إِلَّا قَلِيلًۭا ۖ لَّوْ أَنَّكُمْ كُنتُمْ تَعْلَمُونَ
أَفَحَسِبْتُمْ أَنَّمَا خَلَقْنَٰكُمْ عَبَثًۭا وَأَنَّكُمْ إِلَيْنَا لَا تُرْجَعُونَ
فَتَعَٰلَى ٱللَّهُ ٱلْمَلِكُ ٱلْحَقُّ ۖ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ رَبُّ ٱلْعَرْشِ ٱلْكَرِيمِ
وَمَن يَدْعُ مَعَ ٱللَّهِ إِلَٰهًا ءَاخَرَ لَا بُرْهَٰنَ لَهُۥ بِهِۦ فَإِنَّمَا حِسَابُهُۥ عِندَ رَبِّهِۦٓ ۚ إِنَّهُۥ لَا يُفْلِحُ ٱلْكَٰفِرُونَ
وَقُل رَّبِّ ٱغْفِرْ وَٱرْحَمْ وَأَنتَ خَيْرُ ٱلرَّٰحِمِينَ

तुम अर्ज़ करो कि ऐ मेरे रब अगर तू मुझे दिखाए(1)
(1) वह अज़ाब.

जो उन्हें वादा दिया जाता है{93} तो ऐ मेरे रब मुझे इन ज़ालिमों के साथ  न करना(2){94}
(2) और उनका क़रीन और साथी न बनाना. यह दुआ तवाज़ो और बन्दगी के इज़हार के तरीक़े पर है, जब कि मालूम है कि अल्लाह तआला आपको उनका साथी न करेगा. इसी तरह मअसूम नबी इस्तिग़फ़ार किया करते हैं. जबकि उन्हें मोक्ष और अल्लाह की मेहरबानी का यक़ीनी इल्म होता है.  यह सब विनम्रता और बन्दगी का इज़हार है.

और बेशक हम क़ादिर (सक्षम) है कि तुम्हें दिखा दें जो उन्हें वादा दे रहे हैं(3){95}
(3) यह जवाब है उन काफ़िरों का जो अज़ाब का इन्कार करते और उसकी हंसी उड़ाते थे. उन्हें बताया गया कि अगर तुम ग़ौर करो तो समझ लोगे कि अल्लाह तआला इस वादे के पूरा करने में सक्षम है. फिर इन्कार की वजह और हंसी बनाने का कारण क्या?  और अज़ाब में जो विलम्ब हो रहा है उसमें अल्लाह की हिकमतें हैं कि उनमें से जो ईमान वाले हैं वो ईमान ले आएं और जिनकी नसलें ईमान लाने वाली हैं, उन से वो नस्लें पैदा हो लें.

सब से अच्छी भलाई से बुराई को दफ़ा करो (4)
(4) इस वाक्य के मानी बहुत फैले हुए हैं. इसके ये मानी भी हैं कि तौहीद जो आला बेहतरी है उससे शिर्क की बुराई को दफ़ा फ़रमाए, और यह भी कि फ़रमाँबरदारी और परहेज़गारी को रिवाज देकर गुनाह और बुराई दफ़ा कीजिये, और यह भी कि अपने सदव्यवहार से ख़ताकारों पर इस तरह मेहरबानी और रहमत फ़रमाए जिससे दीन में सुस्ती न हो.

हम ख़ूब जानते हैं जो बातें ये बनाते हैं (5){96}
(5) अल्लाह और उसके रसूल की शान में, तो हम उसका बदला देंगे.

और तुम अर्ज़ करो कि ऐ  मेरे रब तेरी पनाह शैतान के वसवसों से(6){97}
(6) जिनसे वो लोगो को धोखा देकर बुराई और पापों में जकड़ते हैं.

और ऐ मेरे रब तेरी पनाह कि वो मेरे पास आएं{98} यहां तक कि जब उनमें किसी को मौत आए(7)
(7) यानी काफ़िर मौत के वक़्त तक तो अपने कुफ्र और सरकशी और ख़ुदा और रसूल के झुटलाने और मरने के बाद दोबारा ज़िन्दा किये जाने के इन्कार पर अड़ा रहता है और जब मौत का वक़्त आता है और उसको जहन्नम में उसका जो स्थान है दिखाया जाता है और जन्नत का वह स्थान भी दिखाया जाता है जो ईमान लाने की सूरत में उसे मिल सकता था.

तो कहता है कि ऐ मेरे रब मुझे वापस फेर दीजिये (8){99}
(8) दुनिया की तरफ़.

शायद अब मैं कुछ भलाई कमाऊं उसमें जो छोड़ आया हूँ(9)
(9) और नेक कर्म करके अपने गुनाहों का प्रायश्चित करूं. इसपर उसको फ़रमाया जाएगा.

हिश्त! यह तो एक बात है जो वह अपने मुंह से कहता है(10)
(10) हसरत और शर्मिन्दगी से, यह होने वाली नहीं और इसका कुछ फ़ायदा नहीं.

और उनके आगे एक आड़ है(11)
(11) जो उन्हें दुनिया की तरफ़ वापस होने से रोकती है और वह मौत है. (खाज़िन) कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा कि बरजख़ मौत के वक़्त से ज़िन्दा उठाए जाने तक की मुद्दत की कहते हैं.

उस दिन तक जिसमें उठाए जाएंगे{100} तो जब सूर फूंका जाएगा(12)
(12) पहली बार, जिसे नफ़ख़ए ऊला (सूर का पहली बार फूँका जाना) कहते हैं, जैसा कि हज़रत इब्ने अब्बास से रिवायत है.

तो न उनमें रिश्ते रहेंगे(13)
(13) जिन पर दुनिया में गर्व किया करते थे और आपस के ख़ून और ख़ानदान के तअल्लुक़ात टूट जाएंगे और रिश्ते की महब्बतें बाक़ी न रहेंगी और यह हाल होगा कि आदमी अपने भाई और माँ बाप और बीबी और बेटों से भागेगा.

और न एक दूसरे की बात पूछे(14){101}
(14) जैसे कि दुनिया में पूछते थे, क्योंकि हर एक अपने ही हाल में जकड़ा होगा. फिर दूसरी बार सूर फूँका जाएगा और हिसाब के बाद लोग एक दूसरे का हाल पूछेंगे.

तो जिनकी तौलें(15)
(15) नेक कर्म और अच्छी बातों से.

भारी हो लीं वही मुराद को पहुंचे{102} और जिनकी तौलें हलकी पड़ीं (16)
(16) नेकियाँ न होने के कारण, और वो काफ़िर हैं.

वही है जिन्होंने अपनी जानें घाटे में डालीं हमेशा दोज़ख़ में रहेंगे{103} उनके मुंह पर आग लपट मारेगी और वो उसमें मुंह चिड़ाए होंगे(17){104}
(17) तिरमिज़ी की हदीस है कि आग उनको भून डालेगी और ऊपर का होंट सुकड़कर आधे सर तक पहुंचेगा और नीचे का नाफ़ तक लटक जाएगा, दांत खुले रह जाएंगे और उनसे फ़रमाया जाएगा.

क्या तुम पर मेरी आयतें न पढ़ी जाती थीं (18)
(18) दुनिया में.

तो तुम उन्हें झुटलाते थे{105} कहेंगे ऐ हमारे रब हम पर हमारी बदबख़्ती ग़लिब आई और हम गुमराह लोग थे{106} ऐ हमारे रब हमको दोज़ख़ से निकाल दे फिर अगर हम वैसे ही करें तो हम ज़ालिम हैं(19){107}
(19) तिरमिज़ी की हदीस है कि दोज़ख़ी लोग जहन्नम के दारोग़ा मालिक को चालीस बरस तक पुकारते रहेंगे. इसके बाद वह कहेगा कि तुम जहन्नम में ही पड़े रहोगे, फिर वो रब को पुकारेंगे और कहेंगे कि ऐ हमारे रब हमें दोज़ख़ से निकाल, और यह पुकार उनकी दुनिया से दूनी उम्र की मुद्दत तक जारी रहेगी. इसके बाद उन्हें यह जवाब दिया जाएगा जो अगली आयत में हैं. (ख़ाज़िन) और दुनिया की उम्र कितनी है इसमें कई क़ौल है. कुछ ने कहा कि दुनिया की उम्र सात हज़ार बरस है, कुछ ने कहा, बारह हज़ार बरस, कुछ ने कहा, तीन लाख साठ बरस, असल मुद्दत अल्लाह तआला को ही मालूम है. (तज़किरह क़र्तबी)

रब फ़रमाएगा दुत्कारे पड़े रहो इसमें और मुझसे बात न करो(20){108}
(20) अब उनकी उम्मीदें टूट जाएंगी और यह जहन्नम वालों का अन्तिम कलाम होगा, फिर इसके बाद उन्हें कलाम करना नसीब न होगा, रोते चीखते, डकराते, भौंकते रहेंगे.

बेशक मेरे बन्दों का एक गिरोह कहता था ऐ हमारे रब हम ईमान लाए तू हमें बख़्श दे और हम पर रहम कर और तू सबसे बेहतर रहम करने वाला है{109} तो तुमने उन्हें ठट्टा बना लिया(21)
(21) ये आयतें क़ुरैश के काफ़िरों के बारे में उतरीं जो हज़रत बिलाल और हज़रत अम्मार और हज़रत सुहैब और हज़रत ख़ब्बाब वग़ैरह रदियल्लाहो अन्हुम, ग़रीब सहाबा से ठठोल करते थे.

यहाँ तक कि उन्हें बनाने के शग़ल (काम) में(22)
(22) यानी उनके साथ ठठोल करने में इतने लीन हुए कि—-

मेरी याद भूल गए और तुम उनसे हंसा करते{110} बेशक आज मैं ने उनके सब्र का उन्हें यह बदला दिया कि वही कामयाब हैं{111} फ़रमाया(23)
(23)  अल्लाह तआला ने काफ़िरों से.

तुम ज़मीन में कितना ठहरे(24)
(24) यानी दुनिया में, और क़ब्र में.

बरसों की गिनती से{112} बोले हम एक दिन रहे या दिन का हिस्सा(25)
(25) यह जवाब इस वजह से देंगे कि उस दिन की दहशत और अज़ाब की हैबत से उन्हें अपने दुनिया में रहने की अवधि याद न रहेंगी और उन्हें शक हो जाएगा, इसीलिये कहेंगे.

तो गिनती वालों से दर्याफ्त फ़रमा(26){113}
(26) यानी उन फ़रिश्तों से , जिन को तूने बन्दों की उम्रें और उनके कर्म लिखने पर नियुक्त किया. इसपर अल्लाह तआला ने.

फ़रमाया तुम न ठहरे मगर थोड़ा(27)
(27) और आख़िरत की अपेक्षा.

अगर तुम्हे इल्म होता{114} तो क्या यह समझते हो कि हमने तुम्हें बेकार बनाया और तुम्हें हमारी तरफ़ फिरना नहीं(28){115}
(28)  और आख़िरत में जज़ा के लिये उठना नहीं बल्कि तुम्हें इबादत के लिये पैदा किया कि तुम पर इबादत लाज़िम करें और आख़िरत में तुम हमारी तरफ़ लौट कर आओ तो तुम्हारे कर्मों का बदला दें.

तो बहुत बलन्दी वाला है अल्लाह सच्चा बादशाह, कोई मअबूद नहीं सिवा उसके, इज़्ज़त वाले अर्श का मालिक {116}और जो अल्लाह के साथ किसी दूसरे ख़ुदा को पूजे जिस की उसके पास कोई सनद(प्रमाण) नहीं(29)
(29) यानी अल्लाह के सिवा किसी की पूजा मात्र बातिल और प्रमाण रहित है.

तो उसका हिसाब उसके रब के यहाँ है बेशक काफ़िरों का छुटकारा नहीं{117} और तुम अर्ज़ करो ऐ मेरे रब बख़्श दे (30)
(30) ईमान वालों को.
और रहम फ़रमा और तू सबसे बरतर रहम करने वाला{118}