22 सूरए हज -पहला रूकू

22 सूरए हज -पहला रूकू


सूरए हज मदीने में उतरी, इसमें 78 आयतें, दस रूकू हैं.

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) सूरए हज हज़रत इब्ने अब्बास और मुजाहिद के क़ौल के अनुसार मक्का में उतरी, सिवा छ आयतों के जो “हाज़ाने ख़स्माने” से शुरू होती हैं. इस सूरत में दस रूकू, 78 आयतें, एक हज़ार दो सौ इक्यानवे कलिमात और पाँच हज़ार पछत्तर अक्षर हैं.

ऐ लोगों अपने रब से डरो(2)
(2) उसके अज़ाब का ख़ौफ़ करो और उसकी फ़रमाँबरदारी में लग जाओ.

बेशक क़यामत का ज़लज़ला(3)
(3)  जो क़यामत की निशानियों में से है और क़यामत के क़रीब सूरज के पश्चिम से निकलने के नज़दीक वाक़े होगा.

बड़ी सख़्त चीज़ है{1} जिस दिन तुम उसे देखोगे हर दूध पिलाने वाली(4)
(4)  उसकी दहशत से.

अपने दूध पीते को भूल जाएगी और हर गाभिनी(5)
(5) यानी गर्भ वाली उस दिन के हौल से.

अपना गाभ डाल देगी(6)
(6) गर्भ गिर जाएंगे.

और तू लोगों को देखेगा जैसे नशे में हैं और वो नशे में न होंगे(7)
(7) बल्कि अल्लाह के अज़ाब के ख़ौफ़ से लोगों के होश जाते रहेंगे.

मगर यह कि अल्लाह की मार कड़ी है{2} और कुछ लोग वो हैं कि अल्लाह के मामले में झगड़ते हैं वे जाने बूझे और हर सरकश शैतान के पीछे हो लेते हैं(8){3}
(8) यह आयत नज़र बिन हारिस के बारें में उतरी जो बड़ा ही झगड़ालू था और फ़रिश्तों को ख़ुदा की बेटियाँ और क़ुरआन को पहलो के किस्से बताता था और मौत के बाद उठाए जाने का इन्कार करता था.

जिस पर लिख दिया गया है कि जो इसकी दोस्ती करेगा तो यह ज़रूर उसे गुमराह कर देगा और उसे दोज़ख़ के अज़ाब की राह बताएगा(9){4}
(9) शैतान के अनुकरण के नुक़सान बताकर दोबारा उठाए जाने वालों पर हुज्जत क़ायम फ़रमाई जाती हैं.

ऐ लोगो अगर तुम्हें क़यामत के दिन जीने में कुछ शक हों तो यह ग़ौर करो कि हमने तुम्हें पैदा किया मिट्टी से(10)
(10) तुम्हारी नस्ल की अस्ल यानी तुम्हारे सबसे बड़े दादा हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को उससे पैदा करके.

फिर पानी की बूंद से(11)
(11)  यानी विर्य की बूंद से उनकी तमाम सन्तान को.

फिर ख़ून की फुटक से(12)
(12)  कि नुत्फ़ा गन्दा ख़ून हो जाता है.

फिर गोश्त की बोटी से नक़शा बनी और बे बनी(13)
(13) यानी सूरत वाली और बग़ैर सूरत वाली. बुखारी और मुस्लिम की हदीस में है, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया तुम लोगों की पैदायश का माद्दा माँ के पेट में चालीस रोज़ तक नुत्फ़ा रहता है फिर इतनी ही मुद्दत में बन्धा हुआ ख़ून हो जाता है, फिर इतनी ही मुद्दत गोश्त की बोटी की तरह रहता है. फिर अल्लाह तआला फ़रिश्ता भेजता है जो उसका रिज़्क़, उसकी उम्र, उसके कर्म, उसके बुरे या अच्छे होने की लिखता है, फिर उसमें रूह फूंकता है, (हदीस) अल्लाह तआला इन्सान की पैदाइश इस तरह फ़रमाता है और उसको एक हाल से दूसरे हाल की तरफ़ मुन्तक़िल करता है, यह इसलिये बयान फ़रमाया गया है.

ताकि हम तुम्हारे लिये निशानियां ज़ाहिर फ़रमाएं(14)
(14) और तुम अल्लाह की भरपूर क़ुदरत और हिकमत को जानो और अपनी पैदाइश की शुरूआत के हालात पर नज़र करके समझ लो कि जो सच्ची क़ुदरत वाला बेजान मिट्टी में इतने इन्क़लाब करके जानदार आदमी बना देता है, वह मरे हुए इन्सान को ज़िन्दा करे तो उसकी क़ुदरत से क्या दूर है.

और हम ठहराए रखते हैं माओ के पेट में जिसे चाहें एक निश्चित मीआद तक(15)
(15) यानी पैदायश के वक़्त तक.

फिर तुम्हें निकालते हैं बच्चा फिर(16)
(16) तुम्हें उम्र देते हैं.

इसलिये कि तुम अपनी जवानी को पहुंचो(17)
(17) और तुम्हारी अक़्ल और क़ुव्वत कामिल हो.

और तुम में कोई पहले मर जाता है और कोई सबसे निकम्मी उम्र तक डाला जाता है (18)
(18) और उसको इतना बुढापा आ जाता है कि अक़्ल और हवास अपनी जगह नहीं रहते और ऐसा हो जाता है.

कि जानने के बाद कुछ न जाने(19)
(19) और जो जानता हो वह भूल जाए. अकरमह ने कहा कि जो क़ुरआन को हमेशा पढ़ता रहेगा, इस हालत को न पहुंचेगा. इसके बाद अल्लाह तआला मरने के बाद उठने पर दूसरी दलील बयान फ़रमाता है.

और तू ज़मीन को देखे मुरझाई हुई(20)
(20) ख़ुश्क और बिना हरियाली का.

फिर जब हमने उसपर पानी उतारा तरो ताज़ा हुई और उभर आई और हर रौनक़दार जोड़ा(21)
(21) यानी हर क़िस्म का ख़ुशनुमा सब्ज़ा.

उगा लाई (22){5}
(22) ये दलीलें बयान फ़रमाने के बाद निष्कर्ष बयान फ़रमाया जाता है.

यह इसलिये है कि अल्लाह ही हक़ है(23)
(23) और यह जो कुछ ज़िक्र किया गया. आदमी की पैदायश और सूखी बंजर ज़मीन को हरा भरा कर देना. उसके अस्तित्व और हिकमत की दलीलें हैं, इन से उसका वुजूद भी साबित होता है.

और यह कि वह मुर्दे जिलाएगा और यह कि वह सब कुछ कर सकता है{6} और इसलिये कि क़यामत आने वाली उसमें कुछ शक नहीं और यह कि अल्लाह उठाएगा उन्हें जो कब्रों में है{7} और कोई आदमी वह है कि अल्लाह के बारे में यूं झगड़ता है कि न तो इल्म न कोई दलील और न कोई रौशन नविश्ता (लेखा) (24){8}
(24) यह आयत अबू जहल वग़ैरह काफ़िरों की एक जमाअत के बारे में उतरी जो अल्लाह तआला की सिफ़ात में झगड़ा करते थे और उसकी तरफ़ ऐसे गुण जोड़ा करते थे जो उसकी शान के लायक़ नहीं. इस आयत में बताया गया कि आदमी को कोई बात बग़ैर जानकारी और बिना प्रमाण और तर्क के नहीं कहनी चाहिये. ख़ासकर शाने इलाही में. और जो बात इल्म वाले के खिलाफ़ बेइल्मी से कही जाएगी, वह झूट होगी फिर उसपर यह अन्दाज़ कि ज़ोर दे और घमण्ड के तौर पर.

हक़ से अपनी गर्दन मोड़े हुए ताकि अल्लाह की राह से बहका दे(25)
(25) और उसके दीन से फेर दे.

उसके लिये दुनिया में रूसवाई है(26)
(26) चुनांचे बद्र में वह ज़िल्लत और ख़्वारी के साथ मारा गया.े

और क़यामत के दिन हम उसे आग का अज़ाब चखाएंगे(27) {9}
(27) और उससे कहा जाएगा.

यह उसका बदला है जो तेरे हाथों ने आगे भेजा(28)
(28) यानी जो तूने दुनिया में किया, कुफ़्र और झुटलाया.

और अल्लाह बन्दों पर ज़ुल्म नहीं करता(29){10}
(29) और किसी को बे जुर्म नहीं पकड़ता.

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