22 सूरए हज -सातवाँ रूकू

22 सूरए   हज -सातवाँ रूकू


तुम फ़रमा दो कि ऐ लोगो मैं तो यही तुम्हारे लिये खुला डर सुनाने वाला हूँ {49} तो जो ईमान लाए और अच्छे काम किये उनके लिये बख़्शिश है और इज़्ज़त की रोज़ी(1) {50}
(1)  जो कभी टूटे नहीं, वह जन्नत है.

और वो जो कोशिश करते हैं हमारी आयतों में हार जीत के इरादों से(2)
(2) कि कभी इन आयतों को जादू कहते हैं, कभी कविता, कभी पिछलों के क़िस्से और वो यह ख़याल करते हैं कि इस्लाम के साथ उनका यह छल चल जाएगा.

वो जहन्नमी हैं{51} और हमने तुमसे पहले जितने रसूल या नबी भेजे(3)
(3) नबी और रसूल में फर्क़ है. नबी आम है और रसूल ख़ास. कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि रसूल शरीअत की व्याख्या करने वाले होते हैं और नबी उसके सरक्षंक और निगहबान. जब सूरए नज्म उतरी तो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने मस्जिदे हराम में उसकी तिलावत फ़रमाई और बहुत आहिस्ता आहिस्ता आयतों के बीच रूक रूक कर जिससे सुनने वाले ग़ौर भी कर सके और याद करने वालों को याद करने में मदद भी मिलें. जब आपने आयत “व मनातस सालिसतल उख़रा” पढ़कर दस्तूर के मुताबिक़ वक़्फ़ा फ़रमाया तो शैतान ने मुश्रिकों के कान में इस से मिलाकर दो कलिमें ऐसे कह दिये जिन से बुतों की तारीफ़ निकलती थी.जिब्रईले अमीन ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर होकर यह हाल अर्ज़ किया. इससे हुज़ूर को दुख हुआ. अल्लाह तआला ने आप की तसल्ली के लिये यह आयत उतारी.

सब पर कभी यह घटना घटी कि जब उन्होंने पढ़ा तो शैतान ने उनके पढ़ने में लोगों पर कुछ अपनी तरफ़ से मिला दिया तो मिटा देता है अल्लाह उस शैतान के डाले हुए को फिर अल्लाह अपनी आयतें पक्की कर देता है(4)
(4)  जो पैग़म्बर पढ़ते हैं और उन्हें शैतानी कलिमों की मिलावट से मेहफ़ूज़ फ़रमाता है.

और अल्लाह इल्म व हिकमत वाला है {52} ताकि शैतान के डाले हुए को फ़ित्ना कर दे (5)
(5) और मुसीबत और आज़माइश बना दे.

उनके लिये जिनके दिलों में बीमारी है(6)
(6)  शक और दोहरी प्रवृत्ति की.

और जिनके दिल सख़्त हैं(7)
(7) हक़ को क़ुबूल नहीं करते और ये मुश्रिक हैं.

और बेशक सितमगार हैं(8)
(8) यानी मुश्रिक और दोहरी प्रवृत्ति वाले लोग.

धुर के झगड़ालू हैं {53} और इसलिये कि जान लें वो जिनको इल्म मिला है(9)
(9) अल्लाह के दीन का और उसकी आयतों का.

कि वह (10)
(10) यानी क़ुरआन शरीफ़.

तुम्हारे रब के पास से हक़ (सत्य) है तो उस पर ईमान लाएं तो झुक जाएं उस के लिये उनके दिल, और बेशक अल्लाह ईमान वालों को सीधी राह चलाने वाला है{54}और काफ़िर उससे(11)
(11) यानी क़ुरआन से या दीने इस्लाम से.

हमेशा शक में रहेंगे यहां तक कि उनपर क़यामत आ जाए अचानक(12)
(12) या मौत, कि वह भी छोटी क़यामत है.

या उनपर ऐसे दिन का अज़ाब आए जिस का फल उनके लिशे कुछ अच्छा न हो(13){55}
(13) इससे बद्र का दिन मुराद है. जिससे काफ़िरों के लिये कुछ आसानी और राहत न थी और कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा कि इस रोज़ से क़यामत मुराद है.

बादशाही उस दिन(14)
(14) यानी क़यामत के दिन.

अल्लाह ही की है वह उनमें फ़ैसला कर देगा तो जो ईमान लाए और (15)
(15) उन्होंने.
अच्छे काम किये वो चैन के बाग़ों में हैं{56} और जिन्होंने कुफ़्र किया और हमारी आयतें झुटलाई उनके लिये ज़िल्लत का अज़ाब है{57}

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