22 सूरए हज -पांचवाँ रूकू

22 सूरए  हज -पांचवाँ रूकू

और हर उम्मत के लिये(1)
(1) पिछली ईमानदार उम्मतों में से.

हमने एक क़ुरबानी मुक़र्रर फ़रमाई कि अल्लाह का नाम लें उसके दिये हुए बेज़बान चोपायों पर(2)
(2) उनके ज़िब्ह के वक़्त.

तो तुम्हारा मअबूद एक मअबूद है(3)
(3) तो ज़िब्ह के वक़्त सिर्फ़ उसी का नाम लो. इस आयत में दलील है इसपर कि ख़ुदा के नाम का ज़िक्र करना      ज़िब्ह के लिये शर्त है. अल्लाह तआला ने हर उम्मत के लिये मुक़र्रर फ़रमा दिया था कि उसके लिये तक़र्रूब के तरीक़े पर क़ुरबानी करें और तमाम क़ुरबानियों पर उसी का नाम लिया जाए.

तो उसी के हुज़ूर गर्दन रखो(4)
(4) और सच्चे दिल से उसकी आज्ञा का पालन करो.

और ऐ मेहबूब ख़ुशी सुना दो उन तवाज़ों वालों को {34} कि जब अल्लाह का ज़िक्र होता है उनके दिल डरने लगते हैं  (5)
(5) उसके हैबत और जलाल से.

और जो मुसीबत पड़े उसके सहने वाले और नमाज़ क़ायम रखने वाले और हमारे दिये से ख़र्च करते हैं(6){35}
(6) यानी सदक़ा देते हैं.

और क़ुरबानी के डीलदार जानवर ऊंट और गाय हमने तुम्हारे लिये अल्लाह की निशानियों से किये(7)
(7) यानी उसके दीन के ऐलाम से.

तुम्हारे लिये उनमें भलाई है, (8)
(8) दुनिया में नफ़ा और आख़िरत में अज्र और सवाब.

तो उनपर अल्लाह का नाम लो(9)
(9) उनके ज़िब्ह के वक़्त जिस हाल में कि वो हों.

एक पांव बंधे तीन पाँव से खड़े(10){}
(10) ऊंट के ज़िब्ह का यही मस्नून तरीक़ा है.

फिर जब उनकी कर्वटें गिर जाएं(11)
(11) यानी ज़िब्ह के बाद उनके पहलू ज़मीन पर गिरें और उनकी हरकत ठहर जाए.

तो उनमें से ख़ुद खाओ(12)
(12) अगर तुम चाहो.

और सब्र से बैठने वाले और भीख मांगने वाले को खिलाओ, हमने यूही उनको तुम्हारे बस में दे दिया कि तुम एहसान मानो{36} अल्लाह को हरगिज़ न उनके गोश्त पहुचँते हैं न उनके ख़ून, हाँ तुम्हारी परहेज़गारी उस तक पहुँचती हे(13)
(13) यानी क़ुरबानी करने वाले सिर्फ़ नियत की सच्चाई और तक़वा की शर्तों  की रिआयत से अल्लाह तआला को राज़ी कर सकते हैं. जिहालत के ज़माने के काफ़िर अपनी क़ुरबानियों के ख़ून से काबे की दीवारों को गन्दा करते थे और इसको तक़र्रूब का साधन मानत थे. इसपर यह आयत उतरी.

यूंही उनको तुम्हारे बस में कर दिया कि तुम अल्लाह की बड़ाई बोलो इस पर कि तुम को हिदायत फ़रमाई, और ऐ मेहबूब ख़ुश ख़बरी सुनाओ नेकी वालों को (14){37}
(14) सवाब की.

बेशक अल्लाह बलाएं टालता है मुसलमानों की(15)
(15) और उनकी मदद फ़रमाता है.

बेशक अल्लाह दोस्त नहीं रखता हर बड़े दग़ाबाज़ नाशुक्रे को(16){38}
(16) यानी काफ़िरों को, जो अल्लाह और उसके रसूल की ख़ियानत और ख़ुदा की नेअमतों की नाशुक्री करते हैं.

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