22 सूरए हज -छटा रूकू

22 सूरए   हज -छटा रूकू


परवानगी (आज्ञा) अता  हुई उन्हें जो काफ़िर से लड़ते है (1)
(1) जिहाद की.

इस बिना पर कि उनपर ज़ुल्म हुआ(2)
(2) मक्के के काफ़िर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथियों को रोज़मर्रा हाथ और ज़बान से सख़्त यातनाएं देते थे और कष्ट पहुंचाते रहते थे और सहाबा हुज़ूर के पास इस हाल में पहुंचते थे कि किसी का सर फटा है, किसी का हाथ टूटा है, किसी का पाँव बंधा हुआ है. रोज़ाना इस क़िस्म की शिकायतें हुज़ूर की बारगाह में पहुंचती थीं और सहाबए किराम काफ़िरों के अत्याचारों और यातनाओ की हुज़ूर के दरबार में फ़रियाद करते थे. हुज़ूर यह फ़रमा दिया करते कि सब्र करो, मुझे अभी जिहाद का हुक्म नहीं दिया गया. जब हुज़ूर ने मदीनए तैय्यिबह को हिजरत फ़रमाई तब यह आयत उतरी और यह वह पहली आयत है जिसमें काफ़िरों के साथ जंग करने की इजाज़त दी गई है.

और बेशक अल्लाह उनकी मदद करने पर ज़रूर क़ादिर (सक्षम) है{39} वो जो अपने घरों से नाहक़ निकाले गए(3)
(3) और बेवतन किये गए.

सिर्फ़ इतनी बात पर कि उन्होंने कहा हमारा रब अल्लाह है(4)
(4) और यह सच्चा कलाम है और सच्चाई पर घरों से निकालना और बेवतन करना बिल्कुल नाहक़.

और अल्लाह अगर आदमियों में एक को दूसरे से दफ़ा न फ़रमाता(5)
(5) जिहाद की इजाज़त दे कर और सीमाएं निर्धारित फ़रमाकर, तो नतीजा यह होता कि मुश्रिकों का ग़लबा हो जाता और कोई दीनों मिल्लत वाला उनके ज़ालिम हाथों से न बचता.

तो ज़रूर ढा  दी जातीं ख़ानक़ाहें (आश्रम) (6)
(6) पादरियों की.

और गिरजा,(7)
(7) ईसाइयो के.

और कलीसे(8)
(8) यहूदियो के.

और मस्जिदें(9)
(9) मुसलमानों की.

जिनमें अल्लाह का बहुत नाम लिया जाता है,और बेशक अल्लाह ज़रूर मदद फ़रमाएगा उसकी जो उसके दीन की मदद करेगा, बेशक ज़रूर अल्लाह क़ुदरत वाला ग़ालिब है{40} वो लोग कि अगर हम उन्हें ज़मीन में क़ाबू दें(10)
(10) और उनके दुश्मनों के मुक़ाबिल उनकी मदद फ़रमाएं.

तो नमाज़ क़ायम रखें और ज़कात दें और भलाई का हुक्म करें और बुराई से रोकें(11)
(11) इसमें ख़बर दी गई है कि आयन्दा मुहाजिरों को ज़मीन में क़ब्ज़ा अता फ़रमाने के बाद उनकी सीरतें ऐसी पवित्र रहेंगी और वो दीन के मामलों में सच्चे दिल से लगे रहेंगे, इसमें ख़ुलफ़ाए राशिदीन के न्याय और उनके तक़वा और परेज़गारी की दलील है जिन्हें अल्लाह तआला ने शौकत, प्रतिष्ठा और हुकूमत अता फ़रमाई और न्याय करने वाली सीरत अता की.

और अल्लाह ही के लिये सब कामों का अंजाम {41} और अगर ये तुम्हें झुटलाते हैं(12)
(12) ऐ हबीबे अकरम सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम।

तो बेशक उन से पहले झुटला चुकी है नूह की क़ौम और आद (13)
(13) हज़रत हूद की क़ौम.

और समूद (14){42}
(14) हज़रत सालेह की क़ौम.

और इब्राहीम की क़ौम और लूत की क़ौम {43} और मदयन वाले(15)
(15) यानी हज़रत शुऐब की क़ौम.

और मूसा को झुटलाया गया(16)
(16) यहाँ मूसा की क़ौम न फ़रमाया, क्योंकि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की क़ौम बनी इस्राईल ने आपको झुटलाया न था बल्कि फ़िरऔन की क़ौम क़िब्तियों ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को झुटलाया था. इन क़ौमों का बयान और हर एक के अपने रसूलों को झुटलाने का बयान सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तसल्ली के लिये है कि काफ़िरों का यह पुराना तरीक़ा है. पिछले नबियों के साथ भी यही तरीक़ा रहा है.

तो मैं ने काफ़िरों को ढील दी(17)
(17) और उनके अज़ाब में विलम्ब किया और उन्हें मोहलत दी.

फिर उन्हें पकड़ा (18)
(18) और उनके कुफ़्र और सरकशी की सज़ा दी.

तो कैसा हुआ मेरा अज़ाब  (19){44}
(19) आप को झुटलाने वालों को चाहिये कि अपना परिणाम सोचें और सबक़ पकड़ें.

और कितनी ही बस्तियां हमने खपा दीं (हलाक कर दीं)(20)
(20) और वहाँ के रहने वालों को हलाक कर दिया.

कि वो सितमगार थीं (21)
(21)  यानी वहाँ के रहने वाले काफ़िर थे.

तो अब वो अपनी छतों पर ढै पड़ी हैं और कितनू कुंवें बेकार पड़े(22)
(22) कि उनसे कोई पानी भरने वाला नहीं.

और कितने महल गच किये हुए(23){45}
(23) वीरान पड़े हैं

तो क्या ज़मीन में न चले (24)
(24) काफ़िर कि इन हालात का अवलोकन करें, देखें.

कि उनके दिल हों जिन से समझें(25)
(25) कि नबियों को झुटलाने का क्या परिणाम हुआ और सबक़ पकड़े.

या कान हों जिन से सुनें(26){}
(26)पिछली उम्मतों के हालात और उनका हलाक होना और उनकी बस्तियों की वीरानी कि उससे नसीहत मिले.

तो यह कि आंखें अन्धी नहीं होतीं(27)
(27) यानी काफ़िरों की ज़ाहिरी हिस यानी दृष्टि बातिल नहीं हुई है वो इन आँखों से देखने की चीज़ें देखते हैं.

बल्कि वो दिल अंधे होते हैं जो सीनों में हैं(28){46}
(28) और दिलों ही का अन्धा होना बहुत बुरा है. इसी लिये आदमी दीन की राह पाने से मेहरूम रहता है.

और ये तुम से अज़ाब मांगने में जल्दी करते हैं (29)
(29) यानी मक्के के काफ़िरों जैसे नज़र बिन हारिस वग़ैरह. और यह जल्दी करना उनका हंसी बनाने के तौर से था.

और अल्लाह हरगिज़ अपना वादा झूटा न करेगा(30)
(30) और ज़रूर वादे के मुताबि क़ अज़ाब उतरेगा. चुनांचे यह वादा बद्र में पूरा हुआ.

और बेशक तुम्हारे रब के यहाँ (31){}
(31) आख़िरत में अज़ाब का.

एक दिन ऐसा है जैसे तुम लोगों की गिनती में हज़ार बरस(32){47}
(32) तो ये कुफ़्फ़ार क्या समझ कर अज़ाब की जल्दी करते हैं.

और कितनी बस्तियाँ कि हमने उनको ढील दी इस हाल पर वो सितमगार थीं फिर मैं ने उन्हें पकड़ा (33)
(33) और दुनिया में उन पर अज़ाब उतारा.

और मेरी ही तरफ़ पलट कर आता है(34){48}
(34) आख़िरत में.

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