21 सूरए अंबिया -सातवाँ रूकू

21 सूरए  अंबिया -सातवाँ रूकू


तो जो कुछ भले काम करे और हो ईमान वाला तो उसकी कोशिश की बेक़दरी नहीं, और हम उसे लिख रहे हैं{94} और हराम है उस बस्ती पर जिसे हमने हलाक किया कि फिर लौट कर आएं(1){95}
(1) दुनिया की तरफ़, कर्मों के प्रायश्चित और हाल को बदलने के लिये, यानी इसलिये कि उनका वापस आना असंभव है. मुफ़स्सिरों ने इसके ये मानी भी बयान किये है कि जिस बस्ती वालों को हमने हलाक किया उनका शिर्क और कुफ़्र से वापस आना असंभव है यह मानी उस सूरत में जबकि शब्द “फिर” को अतिरिक्त क़रार दिया जाए और अगर अतिरिक्त न हो तो मानी ये होंगे कि आख़िरत में उनका ज़िन्दगी की तरफ़ न लौटना असंभव है. इसमें दोबारा ज़िन्दा किये जाने का इन्कार करने वालों का रद है और ऊपर जो “सब को हमारी तरफ़ फिरना है” और “इसकी कोशिश बेक़दरी नहीं” फ़रमाया गया, उसकी ताकीद है. ( तफ़सीरे कबीर वग़ैरह)

यहां तक कि जब खोले जाएंगे याज़ूज व माजूज(2)
(2) क़यामत के क़रीब, और याजूज माजूज दो क़बीलों के नाम हैं.

और वो हर बलन्दी से ढूलकते होंगे{96} और क़रीब आया सच्चा वादा(3)
(3) यानी क़यामत.

तो जभी आँखे फट कर रह जाएंगी काफ़िरों की(4)
(4) इस दिन की हौल और दहशत से, और कहेंगे.

हाय हमारी खराबी बेशक हम(5)
(5) दुनिया के अन्दर.

इससे गफ़लत में थे बल्कि हम ज़ालिम थे(6){97}
(6) कि रसूलों की बात न मानते थे और उन्हें झुटलाते थे.

बेशक तुम(7)
(7) ऐ मुश्रिक लोगो !

और जो कुछ अल्लाह के सिवा तुम पूजते हो (8)
(8) यानी तुम्हारे देवी देवता.

सब जहन्नम के ईंधन हो, तुम्हें उसमें जाना{98} अगर ये(9)
(9) देवी देवता जैसा कि तुम्हारा गुमान है.

ख़ुदा होते जहन्नम में न जाते और इन सबको हमेशा उसमें रहना(10){99}
(10) बुतों को भी और उनके पूजने वालों को भी.

वो उसमें रेंकेंगे(11)
(11) और अज़ाब की तीव्रता से चीख़ेंगे और दहाड़ेंगे.

और वो उसमें कुछ न सुनेंगे(12){100}
(12) जहन्नम के उबाल की सख़्ती से. हज़रत इब्ने मसऊद रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया जब जहन्नम में वो लोग रह जाएंगे जिन्हे उसमें हमेशा रहना है तो वो आग के ताबूतों में बन्द किये जाएंगे. वह ताबूत और ताबूतों में, फिर वह ताबूत और ताबूतों में. उन ताबूतों पर आग की मेख़ें जड़ दी जाएंगी तो वो कुछ न सुनेंगे और न कोई उन में किसी को देखेगा.

बेशक वो जिनके लिये हमारा वादा भलाई का हो चुका वो जहन्नम से दूर रखे गए हैं(13){101}
(13) इसमें ईमान वालों के लिये बशारत है. हज़रत अली मुरर्तज़ा रदियल्लाहो अन्हो ने यह आयत पढ़कर फ़रमाया कि मैं उन्हीं में हूँ और अबू बक्र और उमर और उस्मान और तलहा और ज़ुबैर और सअद और अब्दुर्रहमान बिन औफ़ (रदियल्लाहो अन्हुम). रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम एक दिन काबए मुअज़्ज़मा में दाख़िल हुए. उस वक्त क़ुरैश के सरदार हतीम में मौजूद थे और काबा शरीफ़ के चारो तरफ़ तीन सौ साठ बुत थे. नज़र बिन हारिस सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सामने आया और आपसे कलाम करने लगा. हुज़ूर ने उसको जवाब देकर खामोश कर दिया और यह आयत तिलावत फ़रमाई : “इन्नकुम वमा तअबुदूना मिन दूनिल्लाहो हसबो जहन्नमा” यानी तुम और जो कुछ अल्लाह के सिवा पूजते हो सब जहन्नम के ईधन है. यह फ़रमाकर हुज़ूर तशरीफ़ ले आए. फिर अब्दुल्लाह बिन ज़बअरी सहमी आया और उसको वलीद बिन मुग़ीरा ने इस गुफ़तगू की ख़बर दी. कहने लगा कि ख़ुदा की क़सम, मैं होता तो उनसे तर्क वितर्क करता. इस पर लोगों ने रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को बुलाया. इब्ने ज़बअरी कहने लगा कि आप ने यह फ़रमाया है कि और जो कुछ तुम अल्लाह के सिवा पूजते हो सब जहन्नम के ईधन हैं. हुज़ूर ने फ़रमाया, हाँ. कहने लगा,

यहूदी तो हज़रत उज़ैर को पूजते हैं, और ईसाई हज़रत ईसा को और बनी मलीह फ़रिश्तों को पूजते हैं. इस पर अल्लाह तआला ने यह आयत उतारी और बयान फ़रमाया कि हज़रत उज़ैर और मसीह और फ़रिश्ते वो हैं जिनके लिये भलाई का वादा हो चुका और वो जहन्नम से दूर रखे गए हैं और हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि वास्तव में यहूदी और ईसाई वग़ैरह शैतान की पूजा करते हैं. इन जवाबों के बाद उस को दम मारने की हिम्मत न रही और वह ख़मोश रह गया और दर हकीक़त उसका ऐतिराज़ भरपूर दुश्मनी से था क्योंकि जिस आयत पर उसने ऐतिराज़ किया था उसमें “मा तअबुदूना” है और मा अरबी ज़बान में निर्जीव के लिये बोला जाता है. यह जानते हुए उसने अंधा बनकर ऐतिराज़ किया. यह ऐतिराज़ तो ज़बान जानने वालों के लिये ख़ुला हुआ बातिल था. मगर ज़्यादा बयान के लिये इस आयत में व्याख्या फ़रमा दी गई.

वो उसकी भनक (हल्की सी आवाज़ भी) न सुनेंगे(14)
(14) और उसके जोश की आवाज़ भी उन तक न पहुंचेगी. वो जन्नत की मंज़िलों में आराम फ़रमा होंगे.

और वो अपनी मन मानती ख़्वाहिशों में(15)
(15) अल्लाह तआला की नेअमतों और करामतों में.

हमेशा रहेंगे {102} उन्हें ग़म में न डालेगी वह सबसे बड़ी घबराहट(16)
(16) यानी सूर का आख़िरी बार फूंका जाना.

और फ़रिश्ते उनकी पेशवाई को आएंगे(17)
(17) क़ब्रों से निकलते वक़्त मुबारकबाद देते, और यह कहते…….

कि यह है तुम्हारा वह दिन जिसका तुम से वादा था {103} जिस दिन हम आसमान को लपेटेंगे जैसे सिजिल फ़रिश्ता(18)
(18) जो आदमी के मरते समय कर्म लिखता है उसके….

अअमाल नामे को लपेटता है, जैसे पहले उसे बनाया था वैस ही फिर कर देंगे(19)
(19) यानी हमने जैसे पहले अदम यानी शून्य से बनाया था वैसे ही फिर शून्य करने के बाद पैदा कर देंगे या ये मानी हैं कि जैसा माँ के पेट से नंगा बिना ख़त्ना किया हुआ पैदा किया था ऐसा ही मरने के बाद उठाएंगे.

यह वादा है हमारे ज़िम्मे हमको इसका ज़रूर करना{104} और बेशक हमने ज़ुबूर में नसीहत के बाद लिख् दिया कि इस ज़मीन के वारिस मेरे नेक बन्दे होंगे(20){105}
(20) इस ज़मीन से मुराद जन्नत की ज़मीन है और हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि काफ़िरों की ज़मीनें मुराद हैं जिनको मुसलमान फ़त्ह करेंगे और एक क़ौल यह है कि शाम की ज़मीन मुराद है.

बेशक यह क़ुरआन काफ़ी है इबादत वालों को(21){106}
(21) कि जो इसका अनुकरण करे और इसके अनुसार कर्म करे, वह जन्नत पाए और मुराद हासिल करे और इबादत वालों से मूमिन मुराद हैं और एक क़ौल यह है कि उम्मते मुहम्मदिया मुराद है जो पाँचों वक़्त नमाज़ें पढ़ते हैं, रमज़ान के रोज़े रखते हैं, हज करते हैं.

और हमने तुम्हें न भेजा मगर रहमत सारे जगत के लिये (22){107}
(22) कोई हो, जिन्न हो या इन्सान, ईमानदार हो या काफ़िर, हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि हुज़ूर का रहमत होना आम है, ईमान वाले के लिये भी और उसके लिये भी जो ईमान न लाया. मूमिन के लिये तो आप दुनिया और आख़िरत दोनो में रहमत हैं. और जो ईमान न लाया उसके लिये आप दुनिया में रहमत हैं कि आपकी वजह से अज़ाब में विलम्ब हुआ और धंसाने, सूरतें बिगाड़ने और इसी तरह के दूसरे अज़ाब उठा दिये गए. तफ़सीरे रूहुल बयान में बुज़ुर्गों का यह क़ौल नक़ल किया है कि आयत के मानी यह हैं कि हमने आपको नहीं भेजा मगर सबके लिये भरपूर रहमत बनाकर, सारे जगत के लिये रहमत, चाहे आलमे अर्वाह हों या आलमें अजसाम, सबोध हों या अबोध. और जो तमाम जगत के लिये रहमत हों, उसके लिये लाज़िम है कि वह सारे जगत से अफ़ज़ल हो.

तुम फ़रमाओ मुझे तो यही वही (देववाणी) होती है कि तुम्हारा ख़ुदा नहीं मगर एक अल्लाह, तो क्या तुम मुसलमान होते हो{108} फिर अगर वो मुंह फेरे (23)
(23) और इस्लाम न लाएं.

तो फ़रमा दो, मैं ने तुम्हें लड़ाई का ऐलान कर दिया बराबरी पर और मैं क्या जानूं(24)
(24) ख़ुदा के बताए बिना, यानी यह बात अक़्ल और अन्दाज़े से जानने की नहीं है. यहाँ दरायत की नफ़ी फ़रमाई गई. दरायत कहते हैं अन्दाज़े और अनुमान से जानने को. इसीलिये अल्लाह तआला के वास्ते शब्द दरायत इस्तेमाल नहीं किया जाता और क़ुरआन शरीफ़ के इतलाक़ात इसपर दलील हें. जैसा कि फ़रमाया “मा कुन्ता तदरी मल किताबो वलल ईमानो” यानी इससे पहले न तुम किताब जानते थे न शरीअत के अहकाम की तफ़सील (सूरए शूररा, आयत 52). लिहाज़ा यहाँ  अल्लाह की तालीम के बिना केवल अपनी अक़्ल और अनुमान से जानने की नफ़ी है न कि मुतलक़ इल्म की. और मुतलक़ इल्म की नफ़ी कैसे हो सकती है जब कि इसी रूकू के शुरू में आ चुका है “वक़तरबल वअदुल हक्क़ो” यानी क़रीब आया सच्चा वादा (सूरए अंबिया, आयत 97). तो कैसे कहा जा सकता है कि वादे का क़ुर्ब और दूरी किसी तरह मालूम नहीं. खुलासा यह है कि अपनी अक़्ल और अन्दाज़े से जानने की नफ़ी है, न कि अल्लाह के बताए से जानने की.

कि पास है या दूर है वह जो तुम्हें वादा दिया जाता है(25){109}
(25) अज़ाब का या क़यामत का.

बेशक अल्लाह जानता हैं आवाज़ की बात(26)
(26) जो ऐ काफ़िरों! तुम ऐलान के साथ इस्लाम पर तअने के तौर से कहते हो.

और जानता है जो तुम छुपाते हो(27){110}
(27) अपने दिलों में यानी नबी की दुश्मनी और मुसलमानों से हसद जो तुम्हारे दिलों में छुपा हुआ है, अल्लाह उसको भी  जानता है, सब का बदला देगा.

और मैं क्या जानूं शायद वह (28)
(28) यानी दुनिया में अज़ाब में ताख़ीर या विलम्ब करना.

तुम्हारी जांच हो(29)
(29) जिससे तुम्हारा हाल जाहिर हो जाए.

और एक वक़्त तक बरतवाना(30){111}
(30) यानी मौत के वक़्त तक.

नबी ने अर्ज़ की कि ऐ मेरे रब हक़ फै़सला फ़रमा दे(31)
(31) मेरे और उनके बीच, जो मुझे झुटलाते हैं, इस तरह कि मेरी मदद कर और उनपर अज़ाब नाज़िल फ़रमा. यह दुआ क़ुबूल हुई और बद्र और अहज़ाब और हुनैन वग़ैरह के काफ़िर अज़ाब में गिरफ़्तार हुए.

और हमारे रब रहमान ही की मदद दरकार है उन बातों पर जो तुम बताते हो(32){112}
(32) शिर्क और कुफ़्र और बे ईमानी की.

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