21 सूरए अंबिया -पाँचवाँ रूकू

21 सूरए अंबिया -पाँचवाँ  रूकू


और बेशक हमने इब्राहीम को(1)
(1) उनकी शुरू की उम्र में बालिग़ होने के.

पहले ही से उसकी नेक राह अता कर दी और हम उससे ख़बरदार थे(2){51}
(2) कि वह हिदायत और नबुव्वत के पात्र हैं.

जब उसने अपने बाप और क़ौम से कहा ये मूरतें क्या हैं,(3)
(3) यानी बुत जो दरिन्दों, परिन्दों और इन्सानों की सूरत में बने हुए हैं.

जिनके आगे तुम आसन मारे (पूजा के लिये) हो (4){52}
(4) और उनकी इबादत में लगे हो.

बाले हमने अपने बाप दादा को उनकी पूजा करते पाया(5){53}
(5) तो हम भी उनके अनुकरण में वैसा ही करने लगे.

कहा बेशक तुम और तुम्हारे बाप दादा सब खुली गुमराही में हो{54} बोले क्या तुम हमारे पास हक़ लाए हो या यूंही खेलते हो(6){55}
(6) चूंकि उन्हें अपने तरीक़े का गुमराही होना बहुत ही असंभव लगता था और  उसका इन्कार करना वो बहुत बड़ी बात जानते थे, इसलिये उन्होंने हज़रत इब्रराहीम अलैहिस्सलाम से यह कहा कि क्या आप यह बात सही तौर पर हमें बता रहे है या खेल के तौर पर फ़रमा रहे हैं. इसके जवाब में आपने अल्लाह तआला के रब होने की ताईद करके ज़ाहिर कर दिया कि आप मज़ाक के तौर पर कलाम फ़रमाने वाले नहीं हैं बल्कि सच्चाई का इज़हार फ़रमाते हैं. चुनांचे आपने—-

कहा बल्कि तुम्हारा रब वह है जो रब है आसमानों और ज़मीन का जिसने उन्हें पैदा किया और मैं इस पर गवाहों में से हूँ{56} और मुझे अल्लाह की क़सम है मैं तुम्हारे बुतों का बुरा चाहूंगा बाद इसके कि तुम फिर जाओ पीठ देकर(7){57}
(7) अपने मेलों को. वाक़िआ यह है कि उस क़ौम का सालाना मेला लगता था. जंगल में जाते और  शाम तक वहाँ खेलकूद नाच गानों में लगे रहते. वापसी के समय बुतख़ाने आते और बुतों की पूजा करते. इसके बाद अपने मकानों को चले जाते. जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने उनकी एक जमाअत से बुतों के बारे में तर्क वितर्क किया तो उन लोगों ने कहा कि कल को हमारी ईद है आप वहाँ चले, देखें कि हमारे दीन और तरीक़ें में क्या बहार है और  कैसा मज़ा आता है जब वह मेले का दिन आया और आपसे मेले चलने को कहा गया तो आप बहाना बनाकर रूक गए. वो लोग चले गए. जब उनके बाक़ी लोग और कमज़ोर व्यक्ति जो आहिस्ता आहिस्ता जा रहे थे, गुज़रे तो आपने फ़रमाया कि मैं तुम्हारे बुतों का बुरा चाहुंगा. इसको कुछ लोगों ने सुना और हज़रत इब्रराहीम अलैहिस्सलाम बुत ख़ाने की तरफ़ लौटै.

तो उन सब को(8)
(8) यानी बुतों को तोड़ कर.

चूरा कर दिया मगर एक को जो उन सबका बड़ा था(9)
(9) छोड़ दिया और बसूला उसके कन्धे पर रख दिया.

कि शायद वो उससे कुछ पूछें (10){58}
(10) यानी बड़े बुत से कि इन छोटे बुतों का क्या हाल हे ये क्यों टूटे और बसूला तेरी गर्दन पर कैसा रखा है और उन्हें इसकी बेबसी ज़ाहिर हो और होश आए कि ऐसे लाचार ख़ुदा नहीं हो सकते. या ये मानी हैं कि वो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम से पूछें और आपको तर्क क़ायम करने का मौक़ा मिले. चूनांचे जब क़ौम के लोग शाम को वापस हुए और बुत ख़ाने में पहुंचे और उन्होंने देखा कि बुत टूटे पड़े हैं तो—

बोले किस ने हमारे ख़ुदाओ के साथ यह काम किया बेशक वह ज़ालिम है{59} उनमें के कुछ बोले हमने एक जवान को उन्हें बुरा कहते सुना जिसे इब्राहीम कहते हैं(11){60}
(11) यह ख़बर नमरूद जब्बार और उसके सरदारों को पहुंची तो—-

बोले तो उसे लोगों के सामने लाओ शायद वो गवाही दें(12){61}
(12) कि यह हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ही का काम है या उनसे बुतों की निस्बत ऐसा कलाम सुना गया. मतलब यह था कि शहादत या गवाही क़ायम हो तो वो आपके पीछे पड़ें. चुनांचे हज़रत बुलाए गए और वो लोग.

बोले क्या तुमने हमारे ख़ुदाओं के साथ यह काम किया, ऐ इब्राहीम (13){62}
(13) आपने इसका तो कुछ जवाब नहीं दिया और तर्क वितर्क की शान से जवाब में एक अनोखी हुज्जत क़ायम की.

फ़रमाया बल्कि उनके उस बड़े ने किया होगा(14)
(14) इस ग़ुस्से से कि उसके होते तुम छोटों को पूजते हो. उसके कन्धे पर बसूला होने से ऐसा ही अन्दाज़ा लगाया जा सकता है. मुझ से क्या पूछना, पूछना हो—

तो उनसे पूछो अगर बोलते हों(15) {63}
(15)  वो ख़ुद बताएं कि उनके साथ यह किसने किया. मतलब यह था कि क़ौम ग़ौर करे कि जो बोल नहीं सकता, जो कुछ कर नहीं सकता, वह ख़ुदा नहीं हो सकता. उसकी ख़ुदाई का अक़ीदा झूटा है. चुनांचे जब आपने यह फ़रमाया.

तो अपने जी की तरफ़ पलटे (16)
(16) और समझे कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम हक़ पर हैं.

और बोले बेशक तुम्हीं सितमगर हो(17){64}
(17) जो ऐसे मजबूरों और बे इख़्तियारों को पूजते हो. जो अपने कन्धे पर बे बसूला न हटा सके, वह अपने पुजारी को मुसीबत से क्या बचा सकेगा और उसके क्या काम आ सकेगा.

फिर अपने सरों के बल औंधाए गए(18)
(18) और सच्ची बात कहने के बाद फिर उनकी बदबख़्ती उनके सरों पर सवार हुई और वो कुफ़्र की तरफ़ पलटे और झूटी बहस शुरू कर दी और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम से कहने लगे.

कि तुम्हें ख़ूब मालूम है ये बोलते नहीं (19){65}
(19)  तो हम उनसे कैसे पूछे और ऐ इब्राहीम, तुम हमें उनसे पूछने का कैसे हुक्म देते हो.

कहा तो क्या अल्लाह के सिवा ऐसे को पूजते हो जो न तुम्हें नफ़ा दे(20)
(20) अगर उसे पूजा.

और न नुक़सान पहुंचाए(21){66}
(21) अगर  उसका पूजना बन्द कर दो.

तुफ़्र है तुम पर और उन बुतों पर जिन को अल्लाह के सिवा पूजते हो तो क्या तुम्हें अक़्ल नहीं(22){67}
(22)  कि इतना भी समझ सकते कि ये बुत पूजने के क़ाबिल नहीं. जब हुज़्जत पूरी हो गई और वो लोग जवाब देने से लाचार हुए तो….

बोले उनको जला दो और अपने ख़ुदाओं की मदद करो अगर तुम्हें करना है(23){68}
(23) नमरूद और उसकी क़ौम हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को जला डालने पर सहमत हो गई और उन्होंने आपको एक मकान में क़ैद कर दिया और कौसा गाँव में एक ईमारत बनाई और एक महीने तक पूरी कोशिशों से क़िस्म क़िस्म की लकड़ियाँ जमा की और एक बड़ी आग जलाई जिसकी तपन से हवा में उड़ने वाले पक्षी जल जाते थे. और एक गोफन खड़ी की और आपको बांधकर उसमें रखकर आग में फैंका. उस वक़्त आपकी ज़बाने मुबारक पर “हस्बीयल्लाहो व नेअमल वकील” जारी था. जिब्रईले अमीन ने आपसे अर्ज़ किया कि क्या कुछ काम है. आपने फ़रमाया, तुम से नहीं. जिब्रईल ने अर्ज़ किया, तो अपने रब से सवाल कीजिये. फ़रमाया, सवाल करने से उसका मेरे हाल को जानना मेरे लिये काफ़ी है.

हमने फ़रमाया ऐ आग ठण्डी होजा और सलामती इब्राहीम पर(24){69}
(24) तो आग ने आपके बन्धनों के सिवा और कुछ न जलाया और आग की गर्मी ख़त्म हो गई और रौशनी बाक़ी रही.

और उन्होंने उसका बुरा चाहा तो हमने उन्हें सब से बढकर ज़ियांकार (घाटे वाला) कर दिया(25){70}
(25) कि उनकी मुराद पूरी न हुई और कोशिश विफल हुई और अल्लाह तआला ने उस क़ौम पर मच्छर भेजे जो उनके गोश्त खा गए और ख़ून पी गए और एक मच्छर नमरूद के दिमाग़ में घुस गया और उसकी हलाकत का कारण हुआ.

और हमने उसे और लूत को(26)
(26) जो उनके भतीजे, उनके भाई हारान के बेटे थे, नमरूद और उसकी क़ौम से.

निजात बख़्शी (27)
(27) और इराक़ से.

उस ज़मीन की तरफ़(28)
(28) रवाना किया.

जिसमें हमने दुनिया वालों के लिये बरकत रखी(29){71}
(29) इस ज़मीन से शाम प्रदेश मुराद है. उसकी बरकत यह है कि यहाँ काफ़ी नबी हुए और सारे जगत में उनकी दीनी बरकतें पहुंचीं और हरियाली के ऐतिबार से भी यह क्षेत्र दूसरे क्षेत्रों से श्रेष्ठ है. यहाँ कसरत से नेहरें हैं, पानी पाक़ीज़ा और ख़ुशगवार है, दरख़्तों और फलों की बहुतात है. हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम फ़लस्तीन स्थान पर तशरीफ़ लाए और हज़रत लूत अलैहिस्सलाम मौतफ़िकह में.

और हमने उसे इस्हाक़ अता फ़रमाया,(30)
(30) और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अल्लाह तआला से बेटे की दुआ की थी.

और यअक़ूब पोता और हमने उन सबको अपने ख़ास क़ुर्ब का अधिकारी किया {72} और हमने उन्हें इमाम किया कि(31)
(31) लोगों को हमारे दीन की तरफ.

हमारे हुक्म से बुलाते हैं और हमने उन्हें वही (देववाणी) भेजी अच्छे काम करने और नमाज़ क़ायम रखने और ज़कात देने की, और वो हमारी बन्दगी करते थे{73} और लूत को हमने हुक़ूमत और इल्म दिया और उसे उस बस्ती से निजात बख़्शी जो गन्दे काम करती थी,(32)
(32) उस बस्ती का नाम सदूम था.

बेशक वो बुरे लोग बेहुक्म थे. और हमने उसे (33){74}
(33) यानी हज़रत लूत अलैहिस्सलाम को.
अपनी रहमत में दाख़िल किया, बेशक वह हमारे ख़ास क़ुर्ब (नज़दीकी) के अधिकारियों में हैं{75}

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